भगवान् श्रीरामका श्रीलक्ष्मणको उपदेश
अपने पिता महाराज श्रीदशरथजीकी आज्ञा पाकर मर्यादापुरुषोत्तम परमात्मा श्रीरामचन्द्रजी श्रीजानकीजी तथा श्रीलक्ष्मणजीके साथ अयोध्यासे वनवासके लिये निकल पड़े। वे नाना प्रकारके तीर्थों, पर्वतों और ऋषि-मुनियोंके आश्रमोंको देखते हुए श्रीअगस्त्यजीके आश्रममें पहुँचे और उन्होंने ऋषिवरसे प्रश्न किया कि मुझे ऐसा स्थान बतलाइये जहाँ रहकर मैं अपने जीवनका कार्य सुचारुरूपसे पूरा कर सकूँ। परमज्ञानस्वरूप लीलातनुधारी भगवान्के प्रश्नको सुनकर ऋषिवरको बड़ा संकोच हुआ। भगवान्ने उन्हें जो यह मान दिया, उससे वे प्रेममग्न हो गये। उन्होंने श्रीसीताजी और अनुज लक्ष्मणके साथ अपने हृदयमें निवास करनेकी प्रार्थना करते हुए निवेदन किया कि पंचवटी नामक एक परम पवित्र और रमणीक स्थान है, जहाँपर गोदावरी नदी बहती है, वहींपर दण्डकवनमें आप निवास करें और सब मुनियोंपर दया करें।
दण्डकवन पहले एक प्रसिद्ध तपोवन था। वहाँ अनेक ऋषि-मुनि रहकर तपस्या किया करते थे, परंतु इधर ऋषिशापसे वह राक्षसोंका निवासस्थान बनकर अत्यन्त भयावह हो रहा था, आनन्दके स्थानमें वहाँ आतंकका राज्य छाया हुआ था। वहाँके लता-वृक्षतक राक्षसोंके कुकृत्य तथा ऋषि, मुनि और ब्राह्मणोंकी दुर्दशा देखकर निरन्तर आँसू बहाया करते थे। ऋषिकी आज्ञा पाकर भगवान् तुरंत दण्डकवनमें पधारे। उनके पधारते ही मानो वहाँसे भय, शोक, दु:ख एकदम विलीन हो गये और सर्वत्र आनन्दका राज्य छा गया। ऋषि-मुनि निर्भय हो गये; लता, वृक्ष, नदी, ताल आदितक श्रीराम, श्रीसीता और श्रीलक्ष्मणके चरणकमलोंके दर्शनकर अत्यन्त आनन्दित और शोभायमान हो गये। भगवान्ने गोदावरी-तटपर एक पर्णकुटी बनायी और वे उसमें श्रीसीताजी तथा श्रीलक्ष्मणजीके साथ सुखपूर्वक निवास करने लगे।
एक दिन भगवान् सुखपूर्वक आसनपर विराजमान थे; समीप ही श्रीजानकीजी तथा श्रीलक्ष्मणजी भी यथास्थान आसनपर बैठे हुए थे। एक सुन्दर अवसर जानकर श्रीलक्ष्मणजीने निष्कपट अन्त:करणसे दोनों हाथ जोड़कर बड़ी नम्रताके साथ भगवान्से निवेदन किया—
सुर नर मुनि सचराचर साईं।
मैं पूछउँ निज प्रभु की नाईं॥
मोहि समुझाइ कहहु सोइ देवा।
सब तजि करौं चरन रज सेवा॥
कहहु ग्यान बिराग अरु माया।
कहहु सो भगति करहु जेहिं दाया॥
ईस्वर जीव भेद प्रभु सकल कहौ समुझाइ।
जातें होइ चरन रति सोक मोह भ्रम जाइ॥
सारांश यह कि ‘हे सुर, नर, मुनि तथा समस्त जगत्के स्वामी! मैं आपको अपना प्रभु समझकर पूछ रहा हूँ। कृपाकर मुझे समझाकर कहिये कि ज्ञान, वैराग्य और माया किसे कहते हैं? वह कौन-सी भक्ति है, जिससे आप भक्तोंपर दया करते हैं और ईश्वर तथा जीवमें क्या भेद है, जिससे मेरा शोक, मोह, भ्रम इत्यादि दूर हो जाय और मैं सब कुछ छोड़कर आपकी चरण-रजकी सेवामें ही तल्लीन हो जाऊँ।’
भक्तवत्सल भगवान्ने सरलहृदय, परम श्रद्धालु, एकान्त प्रेमीके कल्याणके लिये संक्षेपमें इस प्रकार उत्तर दिया—
मैं अरु मोर तोर तैं माया।
जेहिं बस कीन्हे जीव निकाया॥
गो गोचर जहँ लगि मन जाई।
सो सब माया जानेहु भाई॥
तेहि कर भेद सुनहु तुम्ह सोऊ।
बिद्या अपर अबिद्या दोऊ॥
एक दुष्ट अतिसय दुखरूपा।
जा बस जीव परा भवकूपा॥
एक रचइ जग गुन बस जाकें।
प्रभु प्रेरित नहिं निज बल ताकें॥
ग्यान मान जहँ एकउ नाहीं।
देख ब्रह्म समान सब माहीं॥
कहिअ तात सो परम बिरागी।
तृन सम सिद्धि तीनि गुन त्यागी॥
माया ईस न आपु कहुँ जान कहिअ सो जीव।
बंध मोच्छ प्रद सर्बपर माया प्रेरक सीव॥
धर्म तें बिरति जोग तें ग्याना।
ग्यान मोच्छप्रद बेद बखाना॥
जातें बेगि द्रवउँ मैं भाई।
सो मम भगति भगत सुखदाई॥
सो सुतंत्र अवलंब न आना।
तेहि आधीन ग्यान बिग्याना॥
भगति तात अनुपम सुखमूला।
मिलइ जो संत होइँ अनुकूला॥
भगति कि साधन कहउँ बखानी।
सुगम पंथ मोहि पावहिं प्रानी॥
प्रथमहिं बिप्र चरन अति प्रीती।
निज निज कर्म निरत श्रुति रीती॥
एहि कर फल पुनि बिषय बिरागा।
तब मम धर्म उपज अनुरागा॥
श्रवनादिक नव भक्ति दृढ़ाहीं।
मम लीला रति अति मन माहीं॥
संत चरन पंकज अति प्रेमा।
मन क्रम बचन भजन दृढ़ नेमा॥
गुरु पितु मातु बंधु पति देवा।
सब मोहि कहँ जानै दृढ़ सेवा॥
मम गुन गावत पुलक सरीरा।
गदगद गिरा नयन बह नीरा॥
काम आदि मद दंभ न जाकें।
तात निरंतर बस मैं ताकें॥
बचन कर्म मन मोरि गति भजनु करहिं नि:काम।
तिन्ह के हृदय कमल महुँ करउँ सदा बिश्राम॥
सारांश यह कि ‘भाई! मैं और मेरा, तू और तेरा ही माया है, जिसने समस्त जीवोंको अपने वशमें कर रखा है। इन्द्रियाँ और उनके विषयोंमें जहाँतक मन जाता है, वहाँतक माया ही जानना चाहिये। इस मायाके दो भेद हैं—विद्या और अविद्या। इनमें एक अविद्या तो दुष्ट और अत्यन्त दु:खरूप है, जिसके वश होकर जीव भवकूपमें पड़ा हुआ है। दूसरी अर्थात् विद्या, जिसके वशमें समस्त गुण हैं, संसारकी रचना करती है; वह प्रभुकी प्रेरणासे सब कार्य करती है, उसका अपना कोई बल नहीं है।
‘तात! जिस मनुष्यमें ज्ञानाभिमान बिलकुल नहीं है, जो सबमें समानरूपसे ब्रह्मको व्याप्त देखता है, जिसने तृणके समान सिद्धियों और तीनों गुणोंको त्याग दिया है, उसीको परम वैराग्यवान् कहना चाहिये।
‘जो अपनेको मायाका स्वामी नहीं जानता, वही जीव है और जो बन्धन और मोक्षका दाता है, सबसे श्रेष्ठ है, मायाका प्रेरक है, वही ईश्वर है!
‘वेद कहते हैं कि धर्मसे वैराग्य, वैराग्यसे योग, योगसे ज्ञान होता है और ज्ञान ही मोक्षको देनेवाला है; परंतु मैं जिससे शीघ्र प्रसन्न होता हूँ, वह मेरी भक्ति है और वही भक्तोंको सुख देनेवाली है। वह भक्ति स्वतन्त्र है; वह किसी चीजपर अवलम्बित नहीं है; ज्ञान और विज्ञान सब उसके अधीन हैं। तात! भक्ति अनुपम सुखका मूल है और वह तभी प्राप्त होती है जब संतलोग अनुकूल होते हैं।
‘अब मैं भक्तिके साधनका वर्णन करता हूँ और वह सुगम मार्ग बतलाता हूँ जिससे प्राणी मुझे सहजमें ही पा सकें। पहले तो ब्राह्मणके चरणोंमें बहुत प्रीति होनी चाहिये और वेदविहित अपने-अपने धर्ममें प्रवृत्ति होनी चाहिये। इसका फल यह होगा कि मन विषयोंसे विरक्त हो जायगा और तब मेरे चरणोंमें अनुराग उत्पन्न हो जायगा। फिर श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन, वन्दन, दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन—यह नौ प्रकारकी भक्ति दृढ़ होनी चाहिये और मनमें मेरी लीलाओंके प्रति अत्यन्त प्रेम होना चाहिये। जिसे संतोंके चरण-कमलोंमें अत्यधिक प्रेम हो, जो मन-वचन-कर्मसे भजन करनेका दृढ़ नियम रखनेवाला हो, जो मुझे ही गुरु, पिता, माता, भाई, पति और देवता सब कुछ जानता हो और मेरी सेवा करनेमें डटा रहता हो, मेरा गुण गाते समय जिसके शरीरमें रोमांच हो आता हो, वाणी गद्गद हो जाती हो और नेत्रोंसे आँसू गिरते हों और जिसके अंदर काम, मद, दम्भ आदि न हों, मैं सदा उसके वशमें रहता हूँ। मन, वचन और कर्मसे जिनको मेरी ही गति है, जो निष्कामभावसे मेरा भजन करते हैं, मैं सदा उनके हृदय-कमलमें विश्राम करता हूँ।’