भगवान् श्रीरामके विभिन्न स्वरूपोंका ध्यान

(१)

अयोध्यापुरीमें महाराज दशरथजीका सुन्दर महल है, जो सोनेका बना हुआ है और बहुमूल्य मणियों तथा रत्नोंसे जड़ा है। उसके मनोहर चमकते हुए आँगनमें घुटनोंके बल चलनेवाले सच्चिदानन्दघन बालरूप श्रीरामजी विराजमान हैं। उनका नील कमल, नील मेघ और नीलकान्तमणिके समान सुन्दर कोमल सरस और प्रकाशमय श्यामवर्ण है, भगवान‍्का स्वरूप ऐसा सुन्दर है कि उनके एक-एक अंगपर करोड़ों कामदेवकी शोभा निछावर है। भगवान‍्के नेत्र नील कमलके समान सुन्दर हैं, भगवान‍्की ठोड़ी और नासिका परम मनोहर हैं। लाल-लाल अधरोंके बीच सुन्दर दाँतोंकी पाँती अनुपम छवि दे रही है। मानो अरुणकमलके बीच अत्यन्त शुभ्रवर्ण कुन्दकलीकी दो-दो पंक्तियाँ हों। हरित आभायुक्त नीलवर्णमें अरुण आभायुक्त भगवान‍्के प्रकाशमय कपोल बड़े ही सुन्दर लगते हैं। सुन्दर कानोंमें स्वर्ण और रत्नोंके कुण्डल सुशोभित हैं, मस्तकपर सुन्दर तिलक है, काली घुँघराली अलकावली है। विशाल वक्ष:स्थलपर मनोहर वनमाला और बघनखा सुशोभित हैं। शंखके समान तीन रेखावाले गलेमें रत्नोंके तथा मोतियोंके हार शोभा पा रहे हैं। सुन्दर करकमलोंमें कंकण धारण किये हुए हैं। पीली झगुली पहने हुए हैं। भगवान‍्के लाल-लाल चरणोंमें अंकुश, ध्वजा, कमल और वज्रके मनोहर चिह्न हैं तथा अत्यन्त मनोहर ध्वनि करनेवाले नूपुर शोभायमान हैं। भगवान‍्की कमरमें सुन्दर करधनी है, भगवान् शोभाके समुद्र हैं। भाइयोंके साथ खेल रहे हैं और दर्पणमें अपने प्रतिबिम्बको देख-देखकर प्रसन्न होते और किलकारी मारते हैं।

(२)

अयोध्यापुरीके परम सुन्दर राजदरबारमें सुन्दर स्वर्ण-सिंहासनपर भगवान् श्रीरामचन्द्रजी विराजमान हैं। उनका नीलमणि और तमाल-वृक्षके समान नेत्रोंको आनन्द देनेवाला सुन्दर श्यामवर्ण है। सुन्दरताकी सीमा हैं। करोड़ों कामदेवकी उपमा उनके सौन्दर्यसे नहीं दी जा सकती। भगवान् वाम चरणको सिंहासनपर मोड़े बैठे हैं और दाहिना चरण नीचे लटकता हुआ बहुत ही कोमल दिव्य गहरे लाल रंगके मखमली तकियेपर टिका है। भगवान‍्के अरुणाभ चरणतलके साथ मखमलके लाल रंगका अद्‍भुत मिश्रण हो रहा है। उसपर हरिताभ नीलवर्णकी मनहरनी प्रभा पड़ रही है। भगवान‍्के चरणतलमें वज्र, ध्वजा, अंकुश, कमल आदिके स्पष्ट चिह्न हैं। भगवान‍्के चरणोंमें रत्नजटित दिव्य नूपुर हैं। भगवान‍्के घुटने और जंघाएँ परम सुन्दर हैं। भगवान् कटितटपर सुन्दर दिव्य पीताम्बर धारण किये हैं, जो ऐसा मालूम होता है मानो मरकतमणिके ढेरपर बिजली अपने चंचल स्वभावको छोड़कर छा रही हो। पीत धोतीपर कटिमें पीत रंगका एक दुपट्टा कसा है, उसमें सुन्दर तरकस बँधा है। सुन्दर स्वर्णरत्नमयी करधनी है। भगवान‍्का उदार उदर तीन रेखाओंसे युक्त परम सुन्दर है। गम्भीर नाभि है। चौड़ी छातीपर भगवान् रत्नोंके और गजमुक्ताओंके हार धारण किये हुए हैं। शंखके जैसा सुन्दर गला है। गलेमें मणियोंकी, दिव्य वन-पुष्पोंकी और नवीन तुलसीदलकी लम्बी मालाएँ सुशोभित हैं। भगवान‍्के सिंहके-से विशाल और ऊँचे कंधे हैं। अतुलित बलवाली भुजाओंमें भाँति-भाँतिके ज्योतिर्मय कंकण पहने हैं। हाथोंमें मनोहर धनुष-बाण लिये हैं। जनेऊकी अपूर्व शोभा है, जरीकी किनारी और छोरोंसे सुशोभित दुपट्टा भगवान‍्के अंगपर फहरा रहा है। भगवान‍्के मुखमण्डलकी अपूर्व छटा है। परम सुन्दर ठुड्डी है। लाल-लाल अधर-ओष्ठ हैं। भगवान् जब मुसकराते हैं, तब उनके शुभ्र सुन्दर दाँत ऐसे शोभित होते हैं मानो किसी अरुण-वर्ण कमलकोशके भीतर बिजलीके रंगमें डुबोये हुए अति सुन्दर पद्मरागके शिखर विराजते हों। भगवान‍्के अरुणाभ गोल कपोल परम सुन्दर हैं, नासिकाकी नोक चित्तको चुरानेवाली है, नासाके बीचमें गजमुक्ताकी लटकन है। विशाल मनोहर कानोंमें स्वर्ण-रत्नमय मकराकृति कुण्डल हैं। भगवान‍्की बाँकी भ्रुकुटि है; शोभाशील, प्रेम और आनन्दके भंडार, अरुण कमलदलके समान उनके मनोहर नेत्र हैं, जिनसे कृपा और सुन्दरताकी आह्लादकारिणी और मोहिनी प्रकाशधारा बह रही है। भगवान‍्के विशाल प्रकाशमय मस्तकपर ऊर्ध्वपुण्ड्र-तिलक सुशोभित है। सिरपर अत्यन्त रमणीय स्वर्ण-रत्नोंसे निर्मित तेज:पुंज परम सुन्दर मुकुट है। उसके नीचे काले घुँघराले घने केश हैं, जो कानोंतक विचित्र ढंगसे सँवारे हुए हैं। भगवान‍्के सारे शरीरपर चन्दनकी खोरी लगी है। भगवान‍्के अंग-प्रत्यंगोंमें करोड़ों कामदेवोंकी छवि छा रही है। अंगसे दिव्य सुगन्ध निकल रही है। भगवान‍्के वामभागमें जगज्जननी सीताजी विराजमान हैं, जो नीलवस्त्र तथा सब अंगोंमें परम उज्ज्वल आभूषण धारण किये हैं। श्रीलक्ष्मणजी, भरतजी और शत्रुघ्नजी चँवर, व्यजन और छत्रको लिये भगवान‍्की सेवामें खड़े हैं। श्रीचरणोंमें बैठे हुए महावीर हनुमान‍्जी भगवान‍्के नेत्रोंकी ओर अनिमेष दृष्टिसे देख रहे हैं और भगवान‍्के दाहिने चरणको दबा रहे हैं तथा मुनिमण्डली स्तुति कर रही है।

(३)

प्रात:कालका सुहावना समय है, वन और उपवनोंमें रंग-बिरंगे पुष्प खिल रहे हैं, बड़ा अच्छा मौसम है। अयोध्यापुरीमें सरयूजीके पवित्र तटपर भगवान् श्रीरामजी अपने भाइयों तथा मित्रोंके साथ फाग खेल रहे हैं। भगवान् रामकी अनुपम छवि देखकर सबके हृदयमें प्रेम उमड़ रहा है। भगवान‍्का शरीर श्याम तमाल या नीलमेघके समान श्यामवर्ण है। भगवान‍्के चरणतल अरुणवर्ण हैं। उनका ऊपरका हिस्सा श्यामवर्ण है। नखोंकी कान्ति करोड़ों चन्द्रमाओंके प्रकाशके समान है। भगवान‍्के चरणतलमें कमल, वज्र, ध्वजा और अंकुशादिकी रेखाएँ सुशोभित हैं। चरणोंमें मनोहर नूपुर हैं जो अपनी सुमधुर ध्वनिसे मुनियोंका मन मोह लेते हैं। सुन्दर जानु हैं; उनकी जंघाएँ मरकतमणिके खंभोंके समान सुन्दर और चिकनी हैं। कटिप्रदेशमें अति निर्मल पीताम्बर है। उसपर सोनेकी बनी हुई मणिजटित करधनी मनोहर शब्द कर रही है। प्रभुके उदर-देशमें मनोहर त्रिवली और अति सुन्दर गम्भीर नाभि है। भगवान् मनोहर रत्नोंके हार धारण किये हुए हैं; वक्ष:स्थलमें भृगुलताका चिह्न उनकी ब्रह्मण्यता और क्षमाशीलताका परिचय दे रहा है। गलेमें सुगन्धित सुन्दर वनमाला है। विशाल भुजाओंमें कंकण और बाजूबंद सुशोभित हैं। भुजाएँ स्थूल, जानुपर्यन्त लम्बी और अपार बलशालिनी हैं, जो सदा भक्तोंका भय-भंजन करनेके लिये तैयार रहती हैं। भगवान‍्की ठुड्डी बड़ी ही मनोहर है। मनोहर अरुण-वर्ण होठोंके बीचमें दाँतोंकी पंक्ति ऐसी जगमगा रही है मानो अरुण कमलके बीचमें गज-मुक्ताओंकी दो मनोहर पंक्तियाँ हों। भगवान‍्के कपोल बड़े सुन्दर हैं, कानोंमें रत्नजटित कुण्डल, मनोहर मस्तकपर तिलक और सिरपर किरीट सुशोभित है। भगवान‍्के कंधेपर पीत जनेऊ शोभित हो रहा है। भगवान‍्की भ्रुकुटि बाँकी है और चितवन भक्तोंपर कृपा करनेवाली और मुनियोंके भी मनको हरनेवाली है। भगवान‍्के समस्त शरीरसे तेजकी धाराएँ निकल रही हैं। मस्तकके चारों ओर शुभ्र-वर्ण तेजोमण्डल है। भगवान‍्के अंग-अंगमें अतुलित शोभा छा रही है। भगवान् हाथोंमें पिचकारी लिये फाग खेल रहे हैं; नगरनिवासीगण करताल, मृदंग, झाँझ, ढोल, डफ और नगाड़े बजा रहे हैं, सुन्दर और सुहावनी शहनाइयाँ बज रही हैं। मनोहर गान गाये जा रहे हैं। वीणा और बाँसुरीकी सुमधुर ध्वनि हो रही है। आकाशमें देवताओंके विमान छाये हैं और सब बड़े हर्षसे दिव्य पुष्पोंकी वर्षा कर रहे हैं।

(४)

परम रमणीय अयोध्या नगरीमें रत्नोंका बना हुआ एक बहुत ही सुन्दर विशाल मण्डप है। उसके चारों ओर सुन्दर सुगन्धित पुष्पोंकी बंदनवार बँधी है। दिव्य पुष्पोंका बहुत सुन्दर विशाल चँदोवा है। उसमें पुष्पक विमान है और उस विमानपर एक दिव्य मनोहर सिंहासन है। सिंहासनपर भगवान् श्रीराम आदिशक्ति श्रीजानकीजीके साथ विराजमान हैं। देवता, असुर, वानर और मुनिगण सब अलग-अलग दल बनाये विमानमें खड़े भगवान‍्की स्तुति कर रहे हैं। लक्ष्मणसहित तीनों भाई और श्रीहनुमान‍्जी भगवान् श्रीरामजी और श्रीजानकीजीकी सेवामें लगे हैं। भगवान‍्का नीलमेघके समान श्याम-शरीर है, जिसपर हरे प्रकाशकी आभा पड़ रही है। भगवान‍्के सारे शरीरपर शुभ्र चन्दन लगा है। मंजुल श्याम-शरीरपर दिव्य पीताम्बर बड़ा ही सुन्दर जान पड़ता है, मानो नीलमेघपर चन्द्रमाकी चाँदनी देखकर बिजली छिपना छोड़कर स्थिररूपसे दमक रही हो। भगवान‍्का समस्त शरीर सुचिक्‍कण, सुगन्धमय और प्रकाशका पुंज है। भगवान‍्के पद्मरागमणिके समान मनोहर और कोमल चरणतलोंमें ध्वजा, अंकुश, वज्र और कमल आदिके शुभ चिह्न हैं। भगवान‍्के चरणोंके अँगूठे और अँगुलियाँ परम सुन्दर हैं, उनपर अरुण वर्णके नखोंकी ज्योति जगमगा रही है। चरणोंमें मनोहर नूपुर हैं। जंघाएँ कदली-खम्भको भी मात करनेवाली चिकनी, कोमल और स्थूल हैं, जो हाथीके बच्चेकी सूँड़का मान-मर्दन करती हैं। घुटने ऐसे सुन्दर हैं मानो कामदेवके तरकसका निचला भाग हो। कटितटमें सुवर्ण और मणियोंकी बनी हुई करधनी है और पीताम्बर कसा है, उसीमें तरकस बँधा है। उदरकी तीन रेखाएँ और गम्भीर नाभि परम सुन्दर हैं। हृदयमें मोतियोंकी मनोहर माला है। गलेमें वनमाला और पवित्र यज्ञोपवीत शोभायमान है। कंधे सिंहोंके-से स्थूल हैं। शंख-सदृश तीव्ररेखावाले गलेकी छवि बड़ी ही प्यारी लगती है। मुखकी मनोहरता अवर्णनीय है। उसे देखते ही अनुपम आनन्द होता है। वह छवि करोड़ों कामदेवोंकी छविको भी हरनेवाली है। प्रभुके लाल-लाल होठोंके बीचमें अनुपम दन्तावली सुशोभित है। मनोहर मुसकान मनको बरजोरीसे हर लेती है। सुन्दर ठोड़ी, मनोहर गोल कपोल और तोतेकी चोंच-सी सुन्दर नासिका बड़े ही मनोहर हैं। भगवान‍्के नेत्र कमलका मान-मर्दन करनेवाले हैं तथा चितवन अति मनोहर अमृतकी वृष्टि करती है। कानोंमें सुन्दर कुण्डल हैं। सिरपर काले घुँघराले केश हैं। भगवान‍्की बाँकी भ्रुकुटि है। मस्तकपर कुंकुमके तिलक हैं। सिरपर हीरे और मणियोंके जड़े हुए सुवर्ण-मुकुटकी कान्ति सम्पूर्ण लोकोंको प्रकाशित कर रही है। भगवान‍्का कोटि-कोटि सूर्योंका-सा प्रकाश है और उनमें करोड़ों चन्द्रमाओंकी-सी सुशीतलता है।

(५)

मन्दाकिनीजीके तीरपर मनोहर चित्रकूट पर्वतपर कल्पवृक्षके नीचे सुन्दर स्फटिक-शिलापर भगवान् श्रीरामजी और श्रीसीताजी विराजमान हैं। श्रीलक्ष्मणजी दूर खड़े पहरा दे रहे हैं। भगवान् नखसे शिखातक परम सुन्दर और दर्शनीय हैं। सुन्दर श्याम-शरीर है। वक्ष:स्थल और कंधे विशाल हैं। गलेमें वनमाला है। वल्कल-वस्त्र पहने हैं, मुनियोंका-सा वेश है, नेत्र बड़े ही मनोहर और कृपाके समुद्र हैं। जटाओंका मुकुट अत्यन्त सुन्दर है। मनोहर मुख-मण्डल करोड़ों चन्द्रमाओंकी छविको भी मलिन कर रहा है। कर-कमलोंमें सुन्दर धनुष-बाण और कटिप्रदेशमें तरकस बँधा है! गौरवर्ण परमतेजस्वी श्रीलक्ष्मणजी भी इसी भाँति सुशोभित हैं।

और भी अनेकों प्रकारके भगवान् श्रीरामजीके ध्यान करनेयोग्य स्वरूप हैं। उपर्युक्त पाँचोंमेंसे अपनी-अपनी रुचिके अनुसार साधक किसी भी स्वरूपका ध्यान कर सकते हैं।

श्रीसीतारामका ध्यान

कालाम्भोधरकान्तिकान्तमनिशं

वीरासनाध्यासिनं

मुद्रां ज्ञानमयीं दधानमपरं

हस्ताम्बुजं जानुनि।

सीतां पार्श्वगतां सरोरुहकरां

विद्युन्निभां राघवं

पश्यन्तं मुकुटांगदादिविविधा-

कल्पोज्ज्वलांगं भजे॥

भगवान् श्रीरामकी देहकान्ति मेघके समान श्यामवर्ण है, वे बड़े ही कोमलांग हैं और वीरासनसे बैठे हुए हैं, उनके एक हाथमें ज्ञानमुद्रा है और दूसरा हाथ जानुपर रखा हुआ है, उनके वाम पार्श्वमें पद्महस्ता विद्युत् की भाँति तेजोमयी सीतादेवी विराजिता हैं और श्रीराम उनकी ओर देख रहे हैं। श्रीरामचन्द्रके मस्तकपर रत्नमुकुट है और बाजूबंद आदि विविध रत्नमण्डित आभूषणोंसे शरीर प्रकाशित हो रहा है; ऐसे श्रीराघवका हम ध्यान करते हैं।

श्रीरामके बालरूपका ध्यान

काम कोटि छबि स्याम सरीरा।

नील कंज बारिद गंभीरा॥

अरुन चरन पंकज नख जोती।

कमल दलन्हि बैठे जनु मोती॥

रेख कुलिस ध्वज अंकुस सोहे।

नूपुर धुनि सुनि मुनि मन मोहे॥

कटि किंकिनी उदर त्रय रेखा।

नाभि गभीर जान जेहिं देखा॥

भुज बिसाल भूषन जुत भूरी।

हियँ हरि नख अति सोभा रूरी॥

उर मनिहार पदिक की सोभा।

बिप्र चरन देखत मन लोभा॥

कंबु कंठ अति चिबुक सुहाई।

आनन अमित मदन छबि छाई॥

दुइ दुइ दसन अधर अरुनारे।

नासा तिलक को बरनै पारे॥

सुंदर श्रवन सुचारु कपोला।

अति प्रिय मधुर तोतरे बोला॥

चिक्‍कन कच कुंचित गभुआरे।

बहु प्रकार रचि मातु सँवारे॥

पीत झगुलिआ तनु पहिराई।

जानु पानि बिचरनि मोहि भाई॥

(श्रीरामचरितमानस)

उनके नील कमल और गम्भीर (जलसे भरे हुए) मेघके समान श्यामशरीरमें करोड़ों कामदेवोंकी शोभा है। लाल-लाल चरणकमलोंके नखोंकी [शुभ्र] ज्योति ऐसी मालूम होती है जैसे [लाल] कमलके पत्तोंपर मोती स्थिर हो गये हों। [चरणतलोंमें] वज्र, ध्वजा और अंकुशके चिह्न शोभित हैं। नूपुर (पैंजनी)-की ध्वनि सुनकर मुनियोंका भी मन मोहित हो जाता है। कमरमें करधनी और पेटपर तीन रेखाएँ (त्रिवली) हैं। नाभिकी गम्भीरताको तो वही जानते हैं जिन्होंने उसे देखा है। बहुत-से आभूषणोंसे सुशोभित विशाल भुजाएँ हैं। हृदयपर बाघके नखकी बहुत ही निराली छटा है। छातीपर रत्नोंसे युक्त मणियोंके हारकी शोभा और ब्राह्मण (भृगु)-के चरण-चिह्नोंको देखते ही मन लुभा जाता है। कण्ठ शंखके समान (उतार-चढ़ाववाला, तीन रेखाओंसे सुशोभित) है और ठोड़ी बहुत ही सुन्दर है। मुखपर असंख्य कामदेवोंकी छटा छा रही है। दो-दो सुन्दर दँतुलियाँ हैं, लाल-लाल होठ हैं। नासिका और तिलक-[के सौन्दर्य]-का तो वर्णन ही कौन कर सकता है। सुन्दर कान और बहुत ही सुन्दर गाल हैं, मधुर तोतले शब्द बहुत ही प्यारे लगते हैं। जन्मके समयसे रखे हुए चिकने और घुँघराले बाल हैं, जिनको माताने बहुत प्रकारसे बनाकर सँवार दिया है। शरीरपर पीली झँगुली पहनायी हुई है। उनका घुटना और हाथोंके बल चलना मुझे बहुत ही प्यारा लगता है।

श्रीराम-लक्ष्मणके किशोररूपका ध्यान

पीत बसन परिकर कटि भाथा।

चारु चाप सर सोहत हाथा॥

तन अनुहरत सुचंदन खोरी।

स्यामल गौर मनोहर जोरी॥

केहरि कंधर बाहु बिसाला।

उर अति रुचिर नागमनि माला॥

सुभग सोन सरसीरुह लोचन।

बदन मयंक तापत्रय मोचन॥

कानन्हि कनक फूल छबि देहीं।

चितवत चितहि चोरि जनु लेहीं॥

चितवनि चारु भृकुटि बर बाँकी।

तिलक रेख सोभा जनु चाँकी॥

रुचिर चौतनीं सुभग सिर मेचक कुंचित केस।

नख सिख सुंदर बंधु दोउ सोभा सकल सुदेस॥

(श्रीरामचरितमानस)

[दोनों भाइयोंके] पीले रंगके वस्त्र हैं, कमरके [पीले] दुपट्टोंमें तरकस बँधे हैं। हाथोंमें सुन्दर धनुष-बाण सुशोभित है। [श्याम और गौरवर्णके] शरीरोंके अनुकूल (अर्थात् जिसपर जिस रंगका चन्दन अधिक फबे उसपर उसी रंगके) सुन्दर चन्दनकी खौर लगी है। साँवरे और गोरे [रंग]-की मनोहर जोड़ी है। सिंहके समान (पुष्ट) गर्दन (गलेका पिछला भाग) है; विशाल भुजाएँ हैं। [चौड़ी] छातीपर अत्यन्त सुन्दर गजमुक्ताकी माला है। सुन्दर लाल कमलके समान नेत्र हैं। तीनों पापोंसे छुड़ानेवाला चन्द्रमाके समान मुख है। कानोंमें सोनेके कर्णफूल [अत्यन्त] शोभा दे रहे हैं और देखते ही [देखनेवालेके] चित्तको मानो चुरा लेते हैं। उनकी चितवन (दृष्टि) बड़ी मनोहर है और भौंहें तिरछी एवं सुन्दर हैं। [माथेपर] तिलककी रेखाएँ ऐसी सुन्दर हैं मानो [मूर्तिमती] शोभापर मुहर लगा दी गयी है। सिरपर सुन्दर चौकोनी टोपियाँ [दिये] हैं, काले और घुँघराले बाल हैं। दोनों भाई नखसे लेकर शिखातक (एड़ीसे चोटीतक) सुन्दर हैं और सारी शोभा जहाँ जैसी चाहिये, वैसी ही है।

जनकपुरकी फुलवारीमें श्रीराम-लक्ष्मणका ध्यान

सोभा सीवँ सुभग दोउ बीरा।

नील पीत जलजाभ सरीरा॥

मोरपंख सिर सोहत नीके।

गुच्छ बीच बिच कुसुम कली के॥

भाल तिलक श्रमबिंदु सुहाए।

श्रवन सुभग भूषन छबि छाए॥

बिकट भृकुटि कच घूघरवारे।

नव सरोज लोचन रतनारे॥

चारु चिबुक नासिका कपोला।

हास बिलास लेत मनु मोला॥

मुखछबि कहि न जाइ मोहि पाहीं।

जो बिलोकि बहु काम लजाहीं॥

उर मनि माल कंबु कल गीवा।

काम कलभ कर भुज बलसींवा॥

सुमन समेत बाम कर दोना।

सावँर कुअँर सखी सुठि लोना॥

केहरि कटि पट पीत धर सुषमा सील निधान।

देखि भानुकुलभूषनहि बिसरा सखिन्ह अपान॥

(श्रीरामचरितमानस)

दोनों सुन्दर भाई शोभाकी सीमा हैं। उनके शरीरकी आभा नीले और पीले कमलकी-सी है। सिरपर सुन्दर मोरपंख सुशोभित हैं। उनके बीच-बीचमें फूलोंकी कलियोंके गुच्छे लगे हैं। माथेपर तिलक और पसीनेकी बूँदें शोभायमान हैं। कानोंमें सुन्दर भूषणोंकी छवि छायी है। टेढ़ी भौंहें और घुँघराले बाल हैं। नये लाल कमलके समान रतनारे (लाल) नेत्र हैं। ठोड़ी, नाक और गाल बड़े सुन्दर हैं और हँसीकी शोभा मनको मोल लिये लेती है। मुखकी छवि तो मुझसे कही ही नहीं जाती, जिसे देखकर बहुत-से कामदेव लजा जाते हैं। वक्ष:स्थलपर मणियोंकी माला है, शंखके सदृश सुन्दर गला है। कामदेवके हाथीके बच्चेकी सूँड़के समान (उतार-चढ़ाववाली एवं कोमल) भुजाएँ हैं, जो बलकी सीमा हैं। जिसके बायें हाथमें फूलोंसहित दोना है, हे सखि! वह साँवला कुँवर तो बहुत ही सलोना है। सिंहकी-सी (पतली-लचीली) कमरवाले, पीताम्बर धारण किये हुए, शोभा और शीलके भण्डार, सूर्यकुलके भूषण श्रीरामचन्द्रजीको देखकर सखियाँ अपने-आपको भूल गयीं।

धनुषयज्ञमें श्रीराम-लक्ष्मणका ध्यान

राजत राज समाज महुँ कोसलराज किसोर।

सुंदर स्यामल गौर तन बिस्व बिलोचन चोर॥

सहज मनोहर मूरति दोऊ।

कोटि काम उपमा लघु सोऊ॥

सरद चंद निंदक मुख नीके।

नीरज नयन भावते जी के॥

चितवनि चारु मार मनु हरनी।

भावति हृदय जाति नहिं बरनी॥

कल कपोल श्रुति कुंडल लोला।

चिबुक अधर सुंदर मृदु बोला॥

कुमुदबंधु कर निंदक हाँसा।

भृकुटी बिकट मनोहर नासा॥

भाल बिसाल तिलक झलकाहीं।

कच बिलोकि अलि अवलि लजाहीं॥

पीत चौतनीं सिरन्हि सुहाईं।

कुसुम कलीं बिच बीच बनाईं॥

रेखें रुचिर कंबु कल गीवाँ।

जनु त्रिभुवन सुषमा की सीवाँ॥

कुंजर मनि कंठा कलित उरन्हि तुलसिका माल।

बृषभ कंध केहरि ठवनि बल निधि बाहु बिसाल॥

कटि तूनीर पीत पट बाँधें।

कर सर धनुष बाम बर काँधें॥

पीत जग्य उपबीत सुहाए।

नख सिख मंजु महाछबि छाए॥

(श्रीरामचरितमानस)

सुन्दर साँवले और गौर शरीरवाले तथा विश्वभरके नेत्रोंको चुरानेवाले कोसलाधीशके कुमार राजसमाजमें [इस प्रकार] सुशोभित हो रहे हैं। दोनों मूर्तियाँ स्वभावसे ही (बिना किसी बनाव-शृंगारके) मनको हरनेवाली हैं। करोड़ों कामदेवोंकी उपमा भी उनके लिये तुच्छ है। उनके सुन्दर मुख शरद्[पूर्णिमा]-के चन्द्रमाकी भी निन्दा करनेवाले (उसे नीचा दिखानेवाले) हैं और कमलके समान नेत्र मनको बहुत ही भाते हैं। सुन्दर चितवन [सारे संसारके मनको हरनेवाले] कामदेवके मनको भी हरनेवाली है। वह हृदयको बहुत ही प्यारी लगती है पर उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। सुन्दर गाल हैं, कानोंमें चंचल (झूमते हुए) कुण्डल हैं। ठोड़ी और अधर (ओठ) सुन्दर हैं, कोमल वाणी है। हँसी चन्द्रमाकी किरणोंका तिरस्कार करनेवाली है। भौंहें टेढ़ी और नासिका मनोहर है। [ऊँचे] चौड़े ललाटपर तिलक झलक रहे हैं (दीप्तिमान् हो रहे हैं)। [काले घुँघराले] बालोंको देखकर भौंरोंकी पंक्तियाँ भी लजा जाती हैं। पीली चौकोनी टोपियाँ सिरोंपर सुशोभित हैं, जिनके बीच-बीचमें फूलोंकी कलियाँ बनायी (काढ़ी) हुई हैं। शंखके समान सुन्दर (गोल) गलेमें मनोहर तीन रेखाएँ हैं, जो मानो तीनों लोकोंकी सुन्दरताकी सीमा [को बता रही] हैं। हृदयोंपर गजमुक्ताओंके सुन्दर कंठे और तुलसीकी मालाएँ सुशोभित हैं। उनके कंधे बैलोंके कंधेकी तरह [ऊँचे तथा पुष्ट] हैं, ऐंड़ (खड़े होनेकी शान) सिंहकी-सी है और भुजाएँ विशाल एवं बलकी भण्डार हैं। कमरमें तरकस और पीताम्बर बाँधे हैं। [दाहिने] हाथोंमें बाण और बायें सुन्दर कंधोंपर धनुष तथा पीले यज्ञोपवीत (जनेऊ) सुशोभित हैं। नखसे लेकर शिखातक सब अंग सुन्दर हैं, उनपर महान् शोभा छायी हुई है।

श्रीरामका वरवेशमें ध्यान

स्याम सरीरु सुभायँ सुहावन।

सोभा कोटि मनोज लजावन॥

जावक जुत पद कमल सुहाए।

मुनि मन मधुप रहत जिन्ह छाए॥

पीत पुनीत मनोहर धोती।

हरति बाल रबि दामिनि जोती॥

कल किंकिनि कटि सूत्र मनोहर।

बाहु बिसाल बिभूषन सुंदर॥

पीत जनेउ महाछबि देई।

कर मुद्रिका चोरि चितु लेई॥

सोहत ब्याह साज सब साजे।

उर आयत उरभूषन राजे॥

पिअर उपरना काखासोती।

दुहुँ आँचरन्हि लगे मनि मोती॥

नयन कमल कल कुंडल काना।

बदनु सकल सौंदर्ज निधाना॥

सुंदर भृकुटि मनोहर नासा।

भाल तिलकु रुचिरता निवासा॥

सोहत मौरु मनोहर माथे।

मंगलमय मुकुता मनि गाथे॥

(श्रीरामचरितमानस)

श्रीरामचन्द्रजीका साँवला शरीर स्वभावसे ही सुन्दर है। उसकी शोभा करोड़ों कामदेवोंको लजानेवाली है। महावरसे युक्त चरणकमल बड़े सुहावने लगते हैं, जिनपर मुनियोंके मनरूपी भौंरे सदा छाये रहते हैं। पवित्र और मनोहर पीली धोती प्रात:कालके सूर्य और बिजलीकी ज्योतिको हरे लेती है। कमरमें सुन्दर किंकिणी और कटिसूत्र हैं। विशाल भुजाओंमें सुन्दर आभूषण सुशोभित हैं। पीला जनेऊ महान् शोभा दे रहा है। हाथकी अँगूठी चित्तको चुरा लेती है। ब्याहके सब साज सजे हुए वे शोभा पा रहे हैं। चौड़ी छातीपर हृदयपर पहननेके सुन्दर आभूषण सुशोभित हैं। पीला दुपट्टा काँखासोती (जनेऊकी तरह) शोभित है, जिसके दोनों छोरोंपर मणि और मोती लगे हैं। कमलके समान सुन्दर नेत्र हैं। कानोंमें सुन्दर कुण्डल हैं और मुख तो सारी सुन्दरताका खजाना ही है। सुन्दर भौंहें और मनोहर नासिका है। ललाटपर तिलक तो सुन्दरताका घर ही है। जिसमें मंगलमय मोती और मणि गुँथे हुए हैं, ऐसा मनोहर मौर माथेपर सोह रहा है।

वनवेशमें श्रीराम-लक्ष्मणका ध्यान

मुदित नारि नर देखहिं सोभा।

रूप अनूप नयन मनु लोभा॥

एकटक सब सोहहिं चहुँ ओरा।

रामचंद्र मुख चंद चकोरा॥

तरुन तमाल बरन तनु सोहा।

देखत कोटि मदन मनु मोहा॥

दामिनि बरन लखन सुठि नीके।

नख सिख सुभग भावते जी के॥

मुनिपट कटिन्ह कसें तूनीरा।

सोहहिं कर कमलनि धनु तीरा॥

जटा मुकुट सीसनि सुभग उर भुज नयन बिसाल।

सरद परब बिधु बदन बर लसत स्वेद कन जाल॥

(श्रीरामचरितमानस)

स्त्री-पुरुष आनन्दित होकर शोभा देखते हैं। अनुपम रूपने उनके नेत्र और मनोंको लुभा लिया है। सब लोग टकटकी लगाये श्रीरामचन्द्रजीके मुखचन्द्रको चकोरकी तरह (तन्मय होकर) देखते हुए चारों ओर सुशोभित हो रहे हैं। श्रीरामचन्द्रजीका नवीन तमालके वृक्षके रंगका (श्याम) शरीर अत्यन्त शोभा दे रहा है, जिसे देखते ही करोड़ों कामदेवोंके मन मोहित हो जाते हैं। बिजलीके-से रंगके लक्ष्मणजी बहुत ही भले मालूम होते हैं। वे नखसे शिखातक सुन्दर हैं और मनको बहुत भाते हैं। दोनों मुनियोंके (वल्कल आदि) वस्त्र पहने हैं और कमरमें तरकस कसे हुए हैं। कमलके समान हाथोंमें धनुष-बाण शोभित हो रहे हैं। उनके सिरोंपर सुन्दर जटाओंके मुकुट हैं; वक्ष:स्थल, भुजा और नेत्र विशाल हैं और शरत्पूर्णिमाके चन्द्रमाके समान सुन्दर मुखोंपर पसीनेकी बूँदोंका समूह शोभित हो रहा है।

वनवेशमें श्रीसीता-राम-लक्ष्मणका ध्यान

सजनी! हैं कोउ राजकुमार।

पंथ चलत मृदु पद-कमलनि दोउ

सील-रूप-आगार॥१॥

आगे राजिवनैन स्याम-तनु,

सोभा अमित अपार।

डारौं वारि अंग-अंगनिपर,

कोटि-कोटि सत मार॥२॥

पाछैं गौर किसोर मनोहर,

लोचन-बदन उदार।

कटि तूनीर कसे, कर सर-धनु,

चले हरन छिति-भार॥३॥

जुगुल बीच सुकुमारि नारि इक

राजति बिनहि सिंगार।

इन्द्रनील, हाटक, मुकुतामनि

जनु पहिरे महि हार॥४॥

अवलोकहु भरि नैन, बिकल जनि

होहु, करहु सुबिचार।

पुनि कहँ यह सोभा, कहँ लोचन,

देह-गेह संसार?॥५॥

सुनि प्रिय-बचन चितै हित कै

रघुनाथ कृपा-सुखसार।

तुलसिदास प्रभु हरे सबन्हिके

मन, तन रही न सँभार॥६॥

(गीतावली)

‘अरी सजनी! ये कोई राजकुमार हैं। ये दोनों ही शील और रूपके भण्डार हैं तथा मार्गमें अपने मृदुल चरणकमलोंसे पैदल ही चल रहे हैं। आगे तो कमलनयन और श्याम शरीरवाले कुँवर हैं, जिनकी शोभा अतुलित और अपार है। उनके एक-एक अंगपर मैं सैकड़ों करोड़ कामदेव निछावर करती हूँ और पीछे गौर वर्ण, मनोहर किशोरावस्थावाले लाल हैं। उनके नेत्र और मुख भी बड़े ही सुन्दर हैं। वे कमरमें तरकस कसकर और हाथोंमें धनुष-बाण लेकर मानो पृथ्वीका भार उतारनेके लिये ही जा रहे हैं। दोनोंके बीचमें एक सुकुमारी नारी बिना ही शृंगार किये सुशोभित हो रही है। ये तीनों मिलकर ऐसे जान पड़ते हैं मानो पृथ्वी इन्द्रनील, सुवर्ण और मुक्तामणिका हार पहने हुए हो। इन्हें तनिक नेत्र भरकर देख लो, व्याकुल मत होओ, तनिक विचार लो, फिर कहाँ यह शोभा मिलेगी? कहाँ हमारे नेत्र होंगे और कहाँ इस संसारमें ये घर और शरीर रहेंगे। ये प्रिय वचन सुनकर कृपा और सुखके सारस्वरूप भगवान् रामने उनकी ओर प्रीतिपूर्वक देखा।’ तुलसीदास कहते हैं, ऐसा करके प्रभुने उन सबके चित्त चुरा लिये और उन्हें अपने शरीरकी भी सुधि न रही।

सुबेल पर्वतपर श्रीरामका ध्यान

सिखर एक उतंग अति देखी।

परम रम्य सम सुभ्र बिसेषी॥

तहँ तरु किसलय सुमन सुहाए।

लछिमन रचि निज हाथ डसाए॥

ता पर रुचिर मृदुल मृगछाला।

तेहि आसन आसीन कृपाला॥

प्रभु कृत सीस कपीस उछंगा।

बाम दहिन दिसि चाप निषंगा॥

दुहुँ कर कमल सुधारत बाना।

कह लंकेस मंत्र लगि काना॥

बड़भागी अंगद हनुमाना।

चरन कमल चापत बिधि नाना॥

प्रभु पाछें लछिमन बीरासन।

कटि निषंग कर बान सरासन॥

(श्रीरामचरितमानस)

पर्वतका एक बहुत ऊँचा, परम रमणीय, समतल और विशेषरूपसे उज्ज्वल शिखर देखकर—वहाँ लक्ष्मणजीने वृक्षोंके कोमल पत्ते और सुन्दर फूल अपने हाथोंसे सजाकर बिछा दिये। उसपर सुन्दर और कोमल मृगछाला बिछा दी। उसी आसनपर कृपालु श्रीरामजी विराजमान थे। प्रभु श्रीरामजी वानरराज सुग्रीवकी गोदमें अपना सिर रखे हैं। उनके बायीं ओर धनुष तथा दाहिनी ओर तरकस [रखा] है। वे अपने दोनों कर-कमलोंसे बाण सुधार रहे हैं। विभीषणजी कानोंसे लगकर सलाह कर रहे हैं। परम भाग्यशाली अंगद और हनुमान् अनेकों प्रकारसे प्रभुके चरणकमलोंको दबा रहे हैं। लक्ष्मणजी कमरमें तरकस कसे और हाथोंमें धनुष-बाण लिये वीरासनसे प्रभुके पीछे सुशोभित हैं।

रणविजयी श्रीरामका ध्यान

राजत राम काम-सत-सुंदर।

रिपु रन जीति अनुज सँग सोभित,

फेरत चाप-बिसिष बनरुह-कर॥१॥

स्याम सरीर रुचिर श्रम-सीकर,

सोनित-कन बिच बीच मनोहर।

जनु खद्योत-निकर, हरिहित-गन,

भ्राजत मरकत-सैल-सिखरपर॥२॥

घायल बीर बिराजत चहुँ दिसि,

हरषित सकल रिच्छ अरु बनचर।

कुसुमित किंसुक-तरु-समूह महँ,

तरुन तमाल बिसाल बिटप बर॥३॥

राजिव-नयन बिलोकि कृपा करि,

किए अभय मुनि-नाग, बिबुध-नर।

‘तुलसिदास’ यह रूप अनूपम,

हिय-सरोज बसि दुसह बिपतिहर॥४॥

(गीतावली)

अपने शत्रु रावणको युद्धस्थलमें जीतकर भगवान् राम भाईके साथ विराजमान हैं। इस समय वे सैकड़ों कामदेवोंसे भी सुन्दर जान पड़ते हैं और अपना करकमल धनुष और बाणपर फेर रहे हैं। उनके श्याम शरीरपर पसीनेकी सुन्दर बूँदें और बीच-बीचमें मनोहर रुधिरकण शोभायमान हैं; मानो किसी मरकतमणिके पर्वतशिखरपर पटबीजनोंके समूहमें बीरबहूटियाँ शोभा पा रही हों। उनके चारों ओर घायल वीर बैठे हुए हैं। वे सम्पूर्ण रीछ-वानर बड़े ही प्रसन्न हैं। उस समय प्रभु ऐसे जान पड़ते हैं मानो फूले हुए किंशुक वृक्षोंके बीचमें एक अति विशाल और तरुण तमाल वृक्ष हो। उस समय कमलनयन भगवान् रामने कृपादृष्टिसे देखकर सब मुनि, नाग, देवता और मनुष्योंको निर्भय कर दिया। तुलसीदासजी कहते हैं, यह दु:सह विपत्तिको दूर करनेवाला अनुपम रूप हमारे हृदय-कमलमें विराजमान रहे।

सिंहासनारूढ श्रीरामका ध्यान

नवदूर्वादलश्यामं पद्मपत्रायतेक्षणम्।

रविकोटिप्रभायुक्तं किरीटेन विराजितम्॥

कोटिकन्दर्पलावण्यं पीताम्बरसमावृतम्।

दिव्याभरणसम्पन्नं दिव्यचन्दनलेपनम्॥

अयुतादित्यसंकाशं द्विभुजं रघुनन्दनम्।

वामभागे समासीनां सीतां कांचनसन्निभाम्॥

सर्वाभरणसम्पन्नां वामांके समुपस्थिताम्॥

रक्तोत्पलकराम्भोजां वामेनालिङ्गॺ संस्थितम्।

सर्वातिशयशोभाढ्यं दृष्ट्वा भक्तिसमन्वित:॥

(अ० रामायण)

पार्वतीसहित श्रीशिवजीने देखा कि ‘नवीन दूर्वादलके समान श्यामवर्ण, कमलदलके समान विशाल नेत्र, करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाशयुक्त मुकुटसे सुशोभित, करोड़ों कामदेवोंके समान लावण्ययुक्त पीताम्बरसे समावृत, दिव्याभूषणोंसे समन्वित, दिव्य चन्दनचर्चित, हजारों सूर्योंके समान तेजसम्पन्न, सबसे अधिक शोभायमान द्विभुज भगवान् श्रीरघुनाथजी अपनी बायीं ओर, करकमलमें रक्तकमल धारण किये विराजिता सब प्रकारके आभूषणोंसे विभूषिता सुवर्णवर्णा श्रीसीताजीके गलेमें अपनी बायीं भुजा रखे हुए सुशोभित हो रहे हैं।’

सिंहासनासीन श्रीरामका ध्यान

आजु रघुबीर-छबि जात नहिं कछु कही।

सुभग सिंहासनासीन सीतारवन,

भुवन-अभिराम, बहु काम सोभा सही॥ १॥

चारु चामर-व्यजन, छत्र-मनिगन बिपुल

दाम-मुकुतावली-जोति जगमगि रही।

मनहुँ राकेस सँग हंस-उडुगन-बरहि

मिलन आए हृदय जानि निज नाथ ही॥ २॥

मुकुट सुंदर सिरसि, भालबर, तिलक-भ्रू,

कुटिल कच, कुंडलनि परम आभा लही।

मनहुँ हर-डर जुगल मारध्वजके मकर

लागि स्रवननि करत मेरुकी बतकही॥ ३॥

अरुन-राजीव-दल-नयन करुना-अयन,

बदन सुषमासदन, हास त्रय-तापही।

बिबिध कंकन हार, उरसि गजमनि-माल,

मनहुँ बग-पाँति जुग मिलि चली जलदही॥ ४॥

पीत निरमल चैल, मनहुँ मरकत सैल,

पृथुल दामिनि रही छाइ तजि सहजही।

ललित सायक-चाप, पीन भुज बल अतुल,

मनुजतनु दनुजबन-दहन, मंडन-मही॥ ५॥

जासु गुन-रूप नहिं कलित, निरगुन सगुन,

संभु, सनकादि, सुक भगति दृढ़ करि गही।

दास तुलसी राम-चरन-पंकज सदा

बचन मन करम चहै प्रीति नित निरबही॥ ६॥

(गीतावली)

आज रघुनाथजीकी छविका कुछ वर्णन नहीं किया जाता। आज त्रिभुवन-सुन्दर सीतारमण भगवान् राम सुन्दर सिंहासनपर विराजमान हैं। वे सचमुच अनेकों कामदेवोंके समान शोभासम्पन्न हैं। सुन्दर चँवर, व्यजन, छत्र, अनेकों मणिगण तथा मुक्तामालाओंकी लड़ियोंकी ज्योति जगमगा रही है, मानो अपने प्रभुको हृदयमें पहचानकर [छत्ररूप] चन्द्रमाके सहित [चँवररूप] हंस, [मणिगणरूप] तारे और [व्यजनरूप] मोर श्रीरघुनाथजीसे मिलनेके लिये आये हैं। प्रभुके सिरपर सुन्दर मुकुट है, ललित ललाटपर तिलक और भ्रुकुटियाँ शोभायमान हैं तथा घुँघराली अलकोंके पास कुण्डलोंकी बड़ी शोभा हो रही है। वे ऐसे जान पड़ते हैं मानो कामदेवकी भुजाके दो मकर भगवान् शंकरके भयसे [प्रभुको उनके स्वामी जान] कानोंसे लगकर मेलकी बातचीत कर रहे हैं। भगवान‍्के अरुण कमलदलके समान नेत्र करुणाके भण्डार हैं। उनका मुख सुषमाका आश्रय तथा हास तीनों तापोंको नष्ट करनेवाला है। वे हाथोंमें तरह-तरहके कंकण तथा हृदयमें हार तथा गजमुक्ताओंकी माला धारण किये हैं। मानो दो बगुलोंकी पंक्तियाँ मिलकर मेघकी ओर जा रही हों। वे अति स्वच्छ पीताम्बर धारण किये हैं, मानो मरकतमणिके पर्वतपर बहुत-सी बिजली अपने स्वभावको छोड़कर छायी हुई हो। उनके हाथोंमें सुन्दर धनुष-बाण हैं तथा पुष्ट भुजाओंमें अतुलित बल है। उनका यह मनुष्य-शरीर दैत्यवनको जलानेवाला तथा पृथ्वीका आभूषण है। जो निर्गुण होते हुए भी सगुण हैं तथा जिनके गुण और रूपोंकी कोई गणना नहीं कर सकता, अत: शिव, सनकादि तथा शुकदेवजीने भी जिनके भक्तिभावको ही दृढ़ करके पकड़ा है, उन भगवान् रामके चरणकमलोंमें तुलसीदास मन, वचन और कर्मसे सदा प्रीतिका ही निर्वाह चाहता है।