भगवान् श्रीसीतारामजीका ध्यान

कोसलेन्द्रपदकञ्जमञ्जुलौ

कोमलावजमहेशवन्दितौ।

जानकीकरसरोजलालितौ

चिन्तकस्य मनभृङ्गसङ्गिनौ॥

सब लोग सावधानीके साथ एक चित्तसे श्रीअवधमें चले चलिये। बड़ा सुन्दर रमणीय श्रीअवधधाम है। चक्रवर्ती महाराज अखिल भुवनमण्डलके एकच्छत्र सम्राट् भगवान् श्रीराघवेन्द्रजीकी बड़ी रमणीय पुरी है। रामराज्यकी सब प्रकारकी शोभा, रामराज्यकी आदर्श समाज-व्यवस्था श्रीअवधमें वर्तमान है। सभी ओर सब कुछ सुशोभन है। कलुष-नाशिनी श्रीसरयूजी मन्द-मन्द वेगसे बह रही हैं। श्रीसरयूजीके तटपर श्रीराघवेन्द्रका विहार-उद्यान है। फलों और पुष्पोंसे सुसज्जित बड़ा सुन्दर बगीचा है। बगीचेमें चारों ओर बड़े सुन्दर और मनोहर पुष्पोंसे सुशोभित वृक्ष हैं। उनमें भाँति-भाँतिके पुष्प खिले हुए हैं। उनके विविध प्रकारके सौरभसे सारा उद्यान सुरभित हो रहा है। पुष्पोंपर भौंरे मँडरा रहे हैं। पुष्पोंकी रंग-बिरंगी शोभासे सभी ओर सुषमा छा रही है। फलोंके वृक्ष विविध फलोंके भारसे लदे हैं। बीचमें एक बड़ा मनोहर सरोवर है। सरोवरमें कमल खिले हुए हैं। सरोवरके भीतर जलपक्षी केलि कर रहे हैं। चारों ओर सुन्दर-सुन्दर घाट हैं। सरोवरके उत्तर ओर एक बड़ा सुन्दर कल्पवृक्ष है। सघन और फैला हुआ है। कल्पवृक्षके नीचे बहुत बढ़िया स्फटिकमणिका सिंहासन बना हुआ है। चारों ओर विविध पुष्पोंकी लताएँ बिखरी हुई हैं। उनमें विविध भाँतिके सुन्दर-सुरभित फूल खिले हुए हैं। संध्याका समय है। बड़ा सुन्दर और सुगन्धित मन्द-मन्द समीर बह रहा है। इस मनोहर पुष्पोद्यानमें श्रीराघवेन्द्र भगवान् श्रीरामचन्द्रजी और अखिल जगत‍्की जननी श्रीजानकीजी नित्य संध्याके समय पधारा करते हैं। उस समय उनके साथ कोई सेवक नहीं रहता है, केवल श्रीहनुमान‍्जी साथ रहते हैं।

आज भी भगवान् श्रीरामचन्द्रजी अपनी सारी सुषमाके साथ—समस्त शोभाओंसे सुशोभित, सौन्दर्य-माधुर्यमण्डित विश्वजननी श्रीजनकनन्दिनीके साथ पधारे हैं। भगवान् बड़ी मन्द गतिसे धीरे-धीरे सरोवरके निकट चले आते हैं। पीछे-पीछे श्रीहनुमान‍्जी हैं। श्रीभगवान् उत्तर तटकी ओर पधारे हैं। सुन्दर वितानवाले कल्पवृक्षके नीचे स्फटिकमणिकी मनोहर एक पीठिका है। उस स्फटिकमणिके सुन्दर सिंहासनपर बहुत ही बढ़िया और सुकोमल दूर्वाके रंगका एक गलीचा बिछा हुआ है, उसके पीछे दो तकिये लगे हुए हैं, दोनों ओर दो सुन्दर मसनद हैं। चौकीके सामने नीचेकी ओर चरण रखनेके लिये दो पादपीठ सुसज्जित हैं। उनपर दो सुन्दर कोमल गद्दी बिछी हुई हैं। सामने बायीं ओर थोड़ी दूरपर मरकतमणिकी नीची चौकीपर श्रीहनुमान‍्जीके लिये आसन है। भगवान् श्रीरामचन्द्रजी श्रीजनकनन्दिनीजीके साथ गलीचेवाले स्फटिकमणिके सिंहासनपर विराजमान हो गये हैं। श्रीहनुमान‍्जी सामने बैठ गये हैं। भगवान् श्रीरामके नेत्रोंकी ओर किसी आज्ञाकी प्रतीक्षामें टकटकी लगाकर देखने लगते हैं। भगवान् श्रीरामका बड़ा सुन्दर स्वरूप है। भगवान‍्के श्रीअंगका वर्ण नील-हरिताभ-उज्ज्वल है—‘नीला, नीलेमें कुछ हरी आभा, उसपर उज्ज्वल प्रकाश।........केकीकण्ठाभनीलम्’ जैसा मयूरके कण्ठकी नीलिमामें हरित आभा होती है...... चमकता रंग होता है। इस प्रकार श्रीभगवान‍्के अंगका रंग नील-हरिताभ-उज्ज्वल है। बड़ी ही सुन्दर आभा है—दिव्य चमकता प्रकाश। भगवान‍्के श्रीअंगका वर्णन आता है—

‘नील सरोरुह नील मनि नील नीरधर स्याम।’

नीले सुन्दर कमलके समान भगवान‍्के कोमल अंग हैं, नीलमणिके समान अत्यन्त चिकने और चमकते हुए अंग हैं, नवनीलनीरद—जलवाले बादलोंके समान सरस अंग हैं। सरसता, सुकोमलता और सुचिक्‍कणता बड़े प्रकाशके साथ सुशोभित हैं। एक-एक अंग इतने मनोहर, मधुर और आकर्षक हैं कि करोड़ों कामदेव एक-एक अंगपर निछावर हो रहे हैं। इनकी उपमा कही नहीं जा सकती है। शोभा अतुलनीय और निरुपम है। श्रीभगवान‍्के अंग-अंगसे मनोहर सुस्निग्ध ज्योति निकल रही है। सहस्रों, लक्षों, कोटि-कोटि सूर्यका प्रकाश है ......पर उसमें तनिक भी उत्ताप नहीं है, दाहकता नहीं है। करोड़ों चन्द्रमाकी शीतलता साथ लिये हुए है। सूर्यकी तीव्र प्रकाशमयी उष्णता और चन्द्रमाकी सुधावर्षिणी ज्योत्स्नामयी शीतलताका समन्वय—दोनोंका एक ही समय, एक ही साथ रहना कैसा होता है, इसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता। श्रीभगवान‍्के रोम-रोमसे एक प्रकारकी दिव्य ज्योति निकल रही है, जो अपनी आभासे समस्त प्रदेशको ज्योतिर्मय बनाये हुए है। भगवान‍्ने ज्योतिर्मय पीतोज्ज्वल रंगका दिव्य वस्त्र परिधान किया है, उसमें लाल पाड़ है। पाड़की लालिमा भी उज्ज्वल प्रकाशमयी है। उस वस्त्रके सुन्दर स्वर्णमय प्रकाशके भीतरसे नील-हरिताभ-अंग-ज्योति निकल-निकलकर एक विचित्र-विलक्षण रंगवाली आभा बन गयी है। नील-हरिताभ-उज्ज्वल ज्योतिके साथ-साथ भगवान‍्के स्वर्णवर्ण पीताम्बरकी पीताभ ज्योति मिलकर एक विचित्र वर्णवाली ज्योति बन गयी है, जिसे देखकर चित्त मुग्ध हो जाता है। उसको देखते ही बनता है। भगवान‍्की पीठपर गलेसे आता हुआ एक दुपट्टा लहरा रहा है, उसका स्वर्ण-अरुण वर्ण है। भगवान‍्के श्रीचरण बड़े सुन्दर, सुकोमल और अत्यन्त मनोहर हैं। श्रीभगवान‍्का वाम श्रीचरण नीचेकी पादपीठपर टिका है। दक्षिण श्रीचरणको भगवान् श्रीराघवेन्द्रने अपनी वाम जंघापर रखा है, जिसका तल जगज्जननी जानकीजीकी ओर है। भगवान‍्के श्रीचरण-तल बड़े मनोहर और सुन्दर हैं, उनमें ध्वजा, वज्र, कमल आदिकी अति सुन्दर रेखाएँ स्पष्ट हैं। चरण-तल सुकोमल अरुणाभ हैं, उनमें लाल-लाल ज्योति निकल रही है। भगवान‍्के श्रीचरणोंकी अंगुलियाँ, जो एक-से-एक छोटी अंगुलीसे अंगूठेतक उत्तरोत्तर वृद्धिको प्राप्त हो रही हैं, परम सुशोभित हैं। भगवान‍्के श्रीचरणोंसे एक ज्योति निकल रही है, चरणतलसे ज्योति निकल रही है, चरण-नखसे विद्युत् की तरह सुस्निग्ध मनोहर ज्योति निकल रही है, बड़ी सुन्दर प्रकाशमयी है; उसकी ज्योति-किरण जिस-जिसके समीप जाती है, उसी-उसीमें ब्रह्मज्ञानका उदय हो जाता है। यह उनकी चरण-कमल-प्रभाका सहज प्रसाद है। भगवान‍्के श्रीचरणोंमें नूपुर हैं। जाँघ और घुटने बड़े सुन्दर हैं। जाँघ बड़ी सुकोमल, बड़ी स्निग्ध, सुचिक्‍कण और अत्यन्त शोभामयी है। भगवान‍्की कटि अति सुन्दर है, भगवान‍्ने उसमें रत्नोंकी—दिव्य रत्नोंकी—दिव्य स्वर्णकी करधनी पहनी है, उस करधनीमें नवीन-नवीन प्रकारके छोटे-बड़े मुक्ता लटक रहे हैं, बीच-बीचमें—मुक्ताओंके बीचमें मधुर ध्वनि करनेवाली घुँघुरियाँ लगी हैं। भगवान‍्का उदरदेश बड़ा सुन्दर है; गम्भीर नाभि है, उदरमें तीन रेखाएँ हैं। भगवान‍्का वक्ष:स्थल बड़ा चौड़ा है, विशाल है। वक्ष:स्थलमें बायीं ओर भृगुलताका चिह्न है, दाहिनी ओर पीत-केशर-वर्णकी मनोहर रेखा है—श्रीवत्सका चिह्न है। भगवान‍्के विशाल वक्ष:स्थलपर अनेक प्रकारके आभूषण सुशोभित हैं, गलेमें पहनी हुई रत्नमाला है, मुक्तामणिके हार हैं, कौस्तुभमणि है। राजोद्यानके सुन्दर-सुन्दर विचित्र पुष्पोंकी माला है, पुष्पोंका हार है, जो सारे वक्ष:स्थलको आच्छादित करते हुए नाभिदेशतक लटक रहा है। कटितटतक नीचे पुष्पहारसे सुगन्ध निकल रही है, उस पुष्पहारपर भ्रमर मँडराते हैं, मधुर गुंजार कर रहे हैं। भगवान‍्के कंधे बड़े मजबूत......सुदृढ़ बड़े ऊँचे हैं—केहरिकंध—सिंहके समान कंधे हैं। भगवान‍्की विशाल बाहु हैं, आजानुबाहु हैं, भुजाएँ घुटनोंतक लम्बी हैं। ऊपर मोटी—हाथीकी सूँडकी तरह, नीचे पतली हैं। इतनी सुडौल और सुन्दर हैं कि देखते ही चित्त मुग्ध हो जाता है। वे भुजाएँ सारे जगत‍्की रक्षाके लिये, साधु-रक्षा और असाधुके विनाशके लिये नित्य प्रस्तुत हैं। विशाल बाहुमें बाजूबंद हैं, उनमें नीलम, पन्ना और हीरे जड़े हुए हैं। उन दोनों बाजूबंदोंके बीचमें एक-एक लड़ लटक रही हैं, लड़में बड़े सुन्दर महामूल्यवान् रत्न जड़े हुए हैं। भगवान‍्के पहुँचोंमें रत्नोंके कड़े हैं, उनसे ज्योति निकल रही है। भगवान‍्के करकमलोंकी अंगुलियोंमें रत्नोंकी अंगूठियाँ सुशोभित हैं, जो एक-से विचित्र हैं। भगवान‍्के श्रीअंगका वर्ण नील-हरिताभ-उज्ज्वल है, पीताम्बरका वर्ण स्वर्ण-शुभ्र-उज्ज्वल है। भगवान‍्के विविध आभूषणोंके भाँति-भाँतिके रत्न अलग-अलग वर्णोंकी आभा बिखेर रहे हैं, भगवान‍्के चारों ओर मिलकर विचित्र ज्योति छिटक रही है, विलक्षण शोभा हो रही है, मनुष्य न तो कुछ कह सकता है, न वर्णन कर सकता है। कम्बुकण्ठ है—गलेमें रेखाएँ हैं। भगवान‍्की बड़ी सुन्दर ठोड़ी है। अधरोष्ठ अरुण वर्णके हैं, मनोहर स्वाभाविक मन्द-मन्द उनकी मुसकान है। मन्द हास्य सबको विमोहित कर रहा है। दन्तपंक्ति बड़ी ही सुन्दर है, मानो हीरे चमक रहे हैं, उज्ज्वलता है, ज्योति निकल रही है और अरुण अधरोष्ठपर पड़कर विचित्र शोभा उत्पन्न कर रही है। भगवान‍्के सुन्दर सुचिक्‍कण कपोल हैं। उनकी नुकीली नासिका है। भगवान‍्के दोनों कान बड़े मनोहर हैं, उनमें मछलीकी आकृतिके बड़े सुन्दर रत्नोंके कुण्डल चमचमा रहे हैं। भगवान‍्के नेत्र बहुत बड़े हैं, बहुत विशाल हैं। भगवान‍्के नेत्रोंसे कृपा, शान्ति और आनन्दकी धारा अनवरत निकल रही है। भगवान‍्की सुन्दर नेत्र-ज्योति है। मनोहर टेढ़ी भृकुटि है, जो मुनियोंके मनको हर लेती है। जिन्होंने एक बार दर्शन किया, वे सारे साधन भूलकर, जीवन भूलकर भगवान‍्के श्रीचरण-प्रान्तमें निरन्तर निवास करनेका मनोरथ करते हैं। भगवान‍्का विशाल ललाट है, उसपर तिलक सुशोभित है, दोनों ओर श्वेत रेखा है और बीचमें लाल रेखा है, इस प्रकार भगवान‍्के ललाटपर तिलक है। उनका विशाल भाल है, मस्तकपर काले-काले घुँघराले केश हैं, मानो अगणित भ्रमर मँडरा रहे हैं। भगवान‍्की मनोहर अलकावली मुनियोंके मनको हरनेवाली है। उनके मस्तकपर सुन्दर रत्नोज्ज्वल किरीट है, इतना चमकता है, इतना बढ़िया है, उसमें इतने रत्न जड़े हैं कि उसकी शोभाका वर्णन नहीं किया जा सकता, इतना हलका और पुष्प-सा कोमल है कि कुछ कहा नहीं जा सकता। भगवान‍्के वस्त्र-आभूषण—सब-के-सब दिव्य हैं, चेतन हैं। भगवान् श्रीराघवेन्द्रके दाहिने कंधेपर धनुष है, बायें हाथमें बाण सुशोभित है, पीछे कटिमें बाणोंका भाथा बँधा हुआ है। भगवान् दाहिने हाथमें सुन्दर पुष्प लिये हुए हैं, रक्त-कमलका सुन्दर सुशोभित पुष्प है—बड़ा मधुर सुगन्धयुक्त, छोटा-सा अनेक दलोंका कमल है, उसकी नालको पकड़े घुमा रहे हैं। इस प्रकार श्रीराघवेन्द्र कल्पवृक्षके नीचे स्फटिकमणिके सिंहासनपर हरिताभ गलीचेपर विराजमान हैं।

वाम-पार्श्वमें श्रीजनकनन्दिनीजी विराजमान हैं। उनके दोनों अति कोमल श्रीचरणकमल नीचेकी पादपीठपर विराजित हैं। उनका पवित्र सुन्दर स्वर्णोज्ज्वल वर्ण है, सोनेके समान वदनकी आभा है पर सोनेकी भाँति कठोर नहीं है। सोनेकी भाँति चमचमाते हुए माताजीके समस्त अंग अत्यन्त सुकोमल और तेजसे युक्त हैं। करोड़ों सूर्य-चन्द्रकी शीतल प्रकाशमयी उज्ज्वल ज्योतिधारा उनके श्रीअंगसे वैसे ही निकल रही है, जैसे भगवान् श्रीरामके श्रीअंगसे। श्रीसीताजी विविध भूषणोंसे सज्जित हैं, नीलवर्णके वस्त्र हैं, वक्ष:स्थलपर आभूषण हैं, बायें हाथमें पुष्प है, दाहिने हाथसे कर्णकुण्डलको सुधार रही हैं, जंघापर रखे भगवान‍्के श्रीचरणतलकी ओर जनकनन्दिनीके दिव्य नेत्र लगे हैं—पलक नहीं पड़ती है, वे श्रीरामके चरणतलके दर्शनानन्दमें विभोर हैं, दूसरी ओर उनका दृष्टिपात ही नहीं है। भगवान‍्की नील-हरिताभ-उज्ज्वल आभावाली ज्योति नित्य नयी छटा दिखा रही है। उसके साथ श्रीजनकनन्दिनीजीकी स्वर्णिम अंग-ज्योति, उनके नीलवस्त्रकी ज्योति, आभूषणोंकी ज्योति—सब मिलकर एक विचित्र वर्णवाली ज्योति चारों ओर छिटक रही है। उसकी शोभा अवर्णनीय है।

सामने बायीं ओर थोड़ी दूरपर नीचे मरकतमणिके आसनपर श्रीमारुतिजी विराजमान हैं। उनके श्रीअंगका पिंगल वर्ण है, जो उज्ज्वल आभासे युक्त है। लाल वस्त्र पहने हुए हैं, सब अंगोंपर श्रीरामनाम अंकित हैं, हृदयदेश मानो दर्पण है, उसमें स्फटिकमणिके सिंहासनपर विराजमान श्रीराम-जानकी प्रतिबिम्बित हैं। उनके नेत्रोंसे अविरत प्रेमाश्रुधारा बह रही है, टकटकी लगाये हुए हैं। श्रीरामके नेत्रकी कृपाधारामें नहाते अपने-आपको कृतकृत्य मान रहे हैं। शरीर रोमांचित है। मुखमण्डल ज्योतिसे झलमला रहा है। शरीर आनन्दसे पुलकित है, आनन्दका अनुभव करते हुए विशेष आज्ञाकी प्रतीक्षामें वे निर्निमेष नेत्रोंसे श्रीराघवेन्द्रकी ओर निहार रहे हैं।

इस प्रकार भगवान् श्रीराम-जानकी श्रीहनुमान‍्के साथ विहार-उद्यानमें विराजमान हैं। मन्द-मन्द समीर बह रहा है, समीप ही सरयूकी मन्द धारा है, अनेक प्रकारके पक्षी चहचहा रहे हैं, वनकी शोभा अत्यन्त मनोहर हो रही है। भगवान‍्का वह स्वरूप अत्यन्त मनोहर सुन्दर है, सुषमा वर्णनातीत है। कोई भी किसी कालमें वर्णन नहीं कर सकता, देखनेसे मन मुग्ध हो जाता है। यों जब हृदयमें श्रीराम आते हैं, तब मारुतिकी तरह शीतल अश्रुधारा बहती है, शरीर रोमांचित हो जाता है। इस मनोहर ध्यानमें मग्न हो जाना चाहिये।

इस प्रकार भगवान् सामने हैं, उन्हें मनके द्वारा आप देख सकते हैं। तन्मयता होनेपर ध्यान हो सकता है। बड़ा सुन्दर ध्यान है। इसमें मन लग जाय तो क्या कहना है।