भगवान् श्रीशिव और भगवान् श्रीराम
परात्पर, परब्रह्म लीलामय भगवान् श्रीरामने लंका-विजयके अनन्तर अयोध्याको लौटकर राज्याभिषेक हो जानेपर मुनि अगस्त्यके आदेशसे मानवलीलाकी मर्यादारक्षाके लिये रावणादि-वधजनित ब्रह्महत्यादोषकी निवृत्तिके उद्देश्यसे अश्वमेधयज्ञका समारम्भ किया। यज्ञका घोड़ा देश-देशान्तरोंमें घूमता हुआ देवपुर नामक नगरमें पहुँचा। वहाँके राजा वीरमणिने घोड़ेको पकड़ लिया और दोनों सेनाओंमें युद्ध छिड़ गया। राजा वीरमणि शिवके अनन्य भक्त थे और परम दयालु शंकर अपने भक्तकी रक्षाके लिये सदा उसके नगरमें निवास करते थे। जब उन्होंने देखा कि वीरमणिकी सेना राघवी सेनाके चमूपति शत्रुघ्नके द्वारा पराभूत हो रही है और सैनिकोंका क्रमश: ह्रास हो रहा है, तब उन्होंने स्वयं रणांगणमें उपस्थित होकर शत्रुघ्नकी सेनाके साथ युद्ध प्रारम्भ कर दिया। जब संहारमूर्ति भगवान् रुद्र क्रुद्ध होकर समरमें आ डटे, तब भला किसकी मजाल जो उनके अस्त्र-शस्त्रोंके प्रहारको सह सके। बात-की-बातमें राघवी सेना छिन्न-भिन्न हो गयी और सैनिकोंमें हाहाकार मच गया। जब शत्रुघ्नने देखा कि भगवान् शंकरके बाणोंसे किसी प्रकार रक्षा नहीं है, तब उन्होंने कातर होकर श्रीकोशलाधीशका स्मरण किया और भगवान् उसी क्षण भक्तकी पुकार सुनकर यज्ञ-दीक्षाके वेषमें ही युद्धभूमिमें उपस्थित हो गये। भगवान्के भक्तभयहारी, सस्मित, वदनारविन्दका दर्शन कर राघवी सेनामें प्राण आ गये और सैनिकोंने जयघोषपूर्वक भगवान्का अभिनन्दन किया।
शंकरजीने अपने इष्टदेवको जब सामने आते देखा, तब तुरंत युद्ध बंद करके सम्मुख आये और प्रेमविह्वल होकर चरणोंमें गिर पड़े। भगवान्ने उन्हें उठाकर छातीसे लगा लिया। भक्त और भगवान्के इस अपूर्व प्रेम-मिलनको देखकर सारी सेना मुग्ध हो गयी और लगी जय-जयकार करने। शंकरजी कुछ स्वस्थ होनेपर बोले—‘प्रभो! आप प्रकृतिसे पर, साक्षात् परमेश्वर हैं, आप ही अपनी अंश-कलासे अखिल विश्वका सृजन, पालन और संहार करते हैं और स्वयं अरूप होते हुए भी मायासंवलित होकर ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर—इन तीन रूपोंको धारण करते हैं। आपके लिये ब्रह्महत्यादोषके परिमार्जनके लिये अश्वमेधयज्ञका उपक्रम करना विडम्बनामात्र है। जिनके चरणोंसे निकली हुईं श्रीगंगाजी लोकमें पतितपावनी नामसे प्रसिद्ध हैं और मेरे सिरका भूषण हो रही हैं, जिनके नामके उच्चारणमात्रसे अजामिल-जैसे अनेकों महापातकी तर गये, उन्हें कभी ब्रह्महत्याका पाप लग सकता है? आपकी सारी क्रियाएँ संसारमें मर्यादा-स्थापनके लिये ही हैं, इसीलिये तो आपको ‘मर्यादा-पुरुषोत्तम’ कहते हैं। नाथ! आपके कार्यमें विघ्न डालकर मैंने वास्तवमें महान् अपराध किया है, उसके लिये क्षमा चाहता हूँ। बात यह है कि मुझे सत्यके पाशमें बँधकर इच्छा न रहते हुए भी यह सब कुछ करना पड़ा। इसीलिये आपके प्रभावको जानते हुए भी आपकी सेनाके विरुद्ध खड़े होनेका अनुचित कार्य मैंने किया। इस राजाने प्राचीन कालमें उज्जयिनीमें महाकालके स्थानपर बड़ी उग्र तपस्या की थी, जिससे प्रसन्न होकर मैंने उसे एक वरदान दिया था। वह यह था कि जबतक अश्वमेधके प्रसंगमें मेरे इष्टदेव यहाँ न पधारें, तबतक मैं तुम्हारे नगरकी रक्षा करूँगा। बस, आज मेरा व्रत समाप्त हुआ। मैं वास्तवमें अपनी कृतिपर लज्जित हूँ। अब आप कृपया मेरे इस भक्तको अपना दासानुदास समझकर अपनाइये और घोड़ेसहित इसके राज्य एवं सर्वस्वको अपनी सेवामें अंगीकार कीजिये।’ यह कहकर भगवान् त्रिलोचनने राजा वीरमणिको पुत्र-पौत्रोंके सहित भगवान्के सम्मुख ला उपस्थित किया, उनके भवभयहारी चरणोंमें डाल दिया। देवतालोग जो विमानोंमें बैठे हुए यह अपूर्व दृश्य देख रहे थे, धन्य-धन्य, कहकर राजा वीरमणिके भाग्यकी सराहना करने और पुष्प बरसाने लगे।
भगवान् हँसकर बोले—‘प्राणाधिक शंकर! भक्तकी रक्षा करके आपने भक्तकी मर्यादाकी ही रक्षा की है, इसमें अनुचित कौन-सी बात हुई, जिसके लिये आप इस प्रकार दीनभावसे क्षमा-याचना करते हैं? फिर आपसे तो अपराधकी शंका ही नहीं हो सकती, आप तो सदा मेरे हृदय-मन्दिरमें निवास करते हैं और मैं आपके हृदयमें रहता हूँ। वास्तवमें हम दोनोंमें कोई अन्तर ही नहीं है। जो मैं हूँ सो आप हैं और जो आप हैं सो मैं हूँ। हम दोनोंमें जो भेद समझता है वह मूर्ख और जडबुद्धि है। वह हजार कल्पपर्यन्त कुम्भीपाक नरकमें घोर यातनाओंको सहता है। जो आपके भक्त हैं उन्हें सदासे ही मैं अपना भक्त समझता रहा हूँ और जो मेरे भक्त हैं वे अवश्य ही आपके भी दास हैं।’*
इस प्रकार दोनों सेनाओंके विरोधको शान्त कर और शंकरके साथ अपना अभेद बताकर भगवान् अन्तर्धान हो गये और श्रीशंकर भी अपने भक्तका कल्याण कर कैलासको चले गये (पद्मपुराण, पातालखण्डसे)।
‘भगवान् श्रीकृष्ण और भगवान् शिव,’ ‘भगवान् विष्णुका स्वप्न’, ‘शिव-विष्णुका अलौकिक प्रेम’ और ‘भगवान् शिव और भगवान् श्रीराम’—इन लेखोंको पढ़नेसे यह निश्चय हो जाना चाहिये कि एक ही परम तत्त्वके ये सब लीला-भेदसे विभिन्न नाम-रूप हैं। इनमें स्वरूपत: भेद-कल्पना कभी नहीं करनी चाहिये।