भक्तिमयी सुमित्रा देवी
जो केवल इसीलिये गर्भ-धारण करती हैं और इसीलिये पुत्र-प्रसव करती हैं कि उनका पुत्र माता-पिता, सुख-सम्पत्ति, विलास-यौवन, घर-परिवार, नव-विवाहिता पत्नी—सभीके मोहको तृणवत् त्यागकर स्वेच्छासे ही विराग, तपस्या एवं संयमको स्वीकार करके केवल भगवान्की ही सेवा करे, भगवान्की सेवा ही जिसके जीवनका एकमात्र लक्ष्य हो और जो भगवान्की सेवामें ही अपनेको खपा दे—ऐसी परम सौभाग्यवती लक्ष्मण-शत्रुघ्न-जननी सुमित्रा-सरीखी माताएँ जगत्में बिरली ही होती हैं। भगवान् श्रीरामचन्द्र जब वन जाने लगे और जब श्रीरामजीके आदेशसे एकमात्र रामको परम वस्तु माननेवाले लक्ष्मणजी माता सुमित्रासे आज्ञा माँगने गये, उस समय उस विशालहृदया यथार्थजननी मंगलमयी माताने जो कुछ कहा उसमें भक्ति, प्रीति, त्याग, बलिदान, समर्पण, नारी-जीवनकी सफलता, पुत्रका स्वरूप—सभीका परम श्रेष्ठ सार आ गया है। माताका वह उपदेश यदि जगत्की सभी माताओंके लिये आदर्श बन जाय तो यही जगत् वैकुण्ठ बन सकता है। माता सुमित्रा कहती हैं—
तात तुम्हारि मातु बैदेही।
पिता रामु सब भाँति सनेही॥
अवध तहाँ जहँ राम निवासू।
तहँइँ दिवसु जहँ भानु प्रकासू॥
जौं पै सीय रामु बन जाहीं।
अवध तुम्हार काजु कछु नाहीं॥
गुर पितु मातु बंधु सुर साईं।
सेइअहिं सकल प्रान की नाईं॥
रामु प्रानप्रिय जीवन जी के।
स्वारथ रहित सखा सबही के॥
पूजनीय प्रिय परम जहाँ तें।
सब मानिअहिं राम के नातें॥
अस जियँ जानि संग बन जाहू।
लेहु तात जग जीवन लाहू॥
भूरि भाग भाजनु भयहु मोहि समेत बलि जाउँ।
जौं तुम्हरें मन छाड़ि छलु कीन्ह राम पद ठाउँ॥
पुत्रवती जुबती जग सोई।
रघुपति भगतु जासु सुतु होई॥
नतरु बाँझ भलि बादि बिआनी।
राम बिमुख सुत तें हित जानी॥
तुम्हरेहिं भाग रामु बन जाहीं।
दूसर हेतु तात कछु नाहीं॥
सकल सुकृत कर बड़ फलु एहू।
राम सीय पद सहज सनेहू॥
रागु रोषु इरिषा मदु मोहू।
जनि सपनेहुँ इन्ह के बस होहू॥
सकल प्रकार बिकार बिहाई।
मन क्रम बचन करेहु सेवकाई॥
तुम्ह कहुँ बन सब भाँति सुपासू।
सँग पितु मातु रामु सिय जासू॥
जेहिं न रामु बन लहहिं कलेसू।
सुत सोइ करेहु इहइ उपदेसू॥
‘बेटा! जानकीजी तुम्हारी माता हैं और सब प्रकारसे स्नेह करनेवाले श्रीरामचन्द्रजी तुम्हारे पिता हैं! जहाँ श्रीरामजीका निवास हो वहीं अयोध्या है। जहाँ सूर्यका प्रकाश हो वहीं दिन है। यदि निश्चय ही सीता-राम वनको जाते हैं तो अयोध्यामें तुम्हारा कुछ भी काम नहीं है। गुरु, पिता, माता, भाई, देवता, स्वामी—इन सबकी सेवा प्राणके समान करनी चाहिये। फिर श्रीरामचन्द्रजी तो प्राणोंके भी प्रिय हैं, हृदयके भी जीवन हैं और सभीके स्वार्थरहित सखा हैं। जगत्में जहाँतक पूजनीय और परम प्रिय लोग हैं, वे सब रामजीके नातेसे ही [पूजनीय और परमप्रिय] माननेयोग्य हैं। हृदयमें ऐसा जानकर, बेटा! उनके साथ वन जाओ और जगत्में जीनेका लाभ उठाओ! मैं बलिहारी जाती हूँ। [हे पुत्र!] मेरे समेत तुम बड़े ही सौभाग्यके पात्र हुए, जो तुम्हारे चित्तने छल छोड़कर श्रीरामके चरणोंमें स्थान प्राप्त किया है। संसारमें वही युवती स्त्री पुत्रवती है, जिसका पुत्र श्रीरघुनाथजीका भक्त हो। नहीं तो जो रामसे विमुख पुत्रसे अपना हित मानती है, वह तो बाँझ ही अच्छी। पशुकी भाँति उसका ब्याना (पुत्र प्रसव करना) व्यर्थ ही है। तुम्हारे ही भाग्यसे श्रीरामजी वनको जा रहे हैं। हे तात! दूसरा कोई कारण नहीं है। सम्पूर्ण पुण्योंका सबसे बड़ा फल यही है कि श्रीसीतारामजीके चरणोंमें स्वाभाविक प्रेम हो। राग, रोष, ईर्ष्या, मद और मोह—इनके वश स्वप्नमें भी मत होना। सब प्रकारके विकारोंका त्यागकर मन, वचन और कर्मसे श्रीसीतारामजीकी सेवा करना, तुमको वनमें सब प्रकारसे आराम है, जिसके साथ श्रीरामजी और सीताजीरूप पिता-माता हैं। पुत्र! तुम वही करना जिससे श्रीरामचन्द्रजी वनमें क्लेश न पावें, मेरा यही उपदेश है।’
सिद्धान्त तथा उपदेशका उपसंहार करती हुई माता अन्तमें आशीर्वाद देती हुई कहती हैं—
उपदेसु यहु जेहिं तात तुम्हरे
राम सिय सुख पावहीं।
पितु मातु प्रिय परिवार पुर सुख
सुरति बन बिसरावहीं॥
तुलसी प्रभुहि सिख देइ आयसु
दीन्ह पुनि आसिष दई।
रति होउ अबिरल अमल सिय
रघुबीर पद नित नित नई॥
‘बेटा! मेरा यही उपदेश है (अर्थात् तुम वही करना) जिससे वनमें तुम्हारे कारण श्रीरामजी और श्रीसीताजी सुख पावें और पिता, माता, प्रिय परिवार तथा नगरके सुखोंकी याद भूल जायँ। तुलसीदासजी कहते हैं कि सुमित्राजीने इस प्रकार हमारे प्रभु (श्रीलक्ष्मणजी)-को सीख देकर (वन जानेकी) आज्ञा दी और फिर यह आशीर्वाद दिया कि श्रीसीताजी और श्रीरघुवीरजीके चरणोंमें तुम्हारा निर्मल (निष्काम और अनन्य) एवं प्रगाढ़ प्रेम नित नया-नया हो।’ माताकी क्या सुन्दर आशीष है। धन्य है।
प्रिय पुत्र लक्ष्मणको रामकी सेवामें भेजकर ही माता निरस्त नहीं हो जाती, जब लक्ष्मणके शक्ति लगने और रणभूमिमें मूर्च्छित होकर गिर जानेका संवाद मिलता है, तब वे अपनी कोखको सफल हुई मानकर उनका रोम-रोम प्रसन्नतासे खिल उठता है। पर साथ ही यह चिन्ता आ सताती है कि मेरे राम शत्रुओंमें अकेले रह गये—और शत्रुघ्नको वहाँ भेजनेके लिये निश्चय करके कहती हैं—‘बेटा! हनुमान्के साथ जाओ।’ माताका आदेश सुनते ही शत्रुघ्नजी हाथ जोड़कर खड़े हो जाते हैं और शरीरसे पुलकित होकर ऐसे प्रसन्न होते हैं मानो विधाताके विधानसे उनके पूरे दाव पड़ गये हों।
‘तात! जाहु कपि सँग’, रिपुसूदन उठि कर जोरि खरे हैं।
प्रमुदित पुलकि पैंत पूरे जनु बिधिबस सुढर ढरे हैं॥
श्रीहनुमान्जीके विनय करने और आश्वासन देनेपर माता मानती हैं।
सचमुच ऐसी ही माता पुत्रवती हैं और ऐसी मातासे जन्म धारण करनेवाले ही वास्तवमें पुत्र हैं—इन माता-पुत्रोंके चरणोंमें कोटि-कोटि नमस्कार!