रामायणकी प्राचीनता
आजकल कुछ लोग ऐसा मानते हैं कि रामायणकी रचना महाभारतके बादकी है। यद्यपि निरपेक्षतापूर्वक ग्रन्थोंका अध्ययन करनेपर इस मान्यतामें हठके अतिरिक्त अन्य कोई भी आधार नहीं ठहरता। जिस प्रकार भगवान् रामका काल कौरव-कालसे लाखों वर्ष पहलेका है, उसी प्रकार रामायणकी रचना भी है। रामायणमें जिस मर्यादापूर्ण सत्त्वमयी सभ्यताका वर्णन है, महाभारतमें वैसा नहीं है, इसीसे पता लगता है कि रामायण-कालसे महाभारत-कालकी सभ्यताका आदर्श बहुत नीचा था। गुरुकुल-काँगड़ीके प्रसिद्ध अध्ययनशील श्रीयुत रामदेवजीने लिखा है—‘धर्ममय एवं आत्मिक तथा प्राकृतिक सब प्रकारकी उन्नतियोंसे परिपूर्ण रामायणके संक्षिप्त इतिहासको छोड़कर शोकमय हृदयके साथ महाभारतके समयका यत्किंचित् इतिहास लिखना पड़ता है। श्रीरामचन्द्रजीके पवित्र आचरणके प्रतिकूल युधिष्ठिरके जूआ खेलने आदि कर्मोंका, लक्ष्मण-भरतादिके भ्रातृ-स्नेहके प्रतिकूल युधिष्ठिरके प्रति भीमसेनके अपमानसूचक शब्दोंका, महाराज दशरथकी प्रजाके सम्मुख सीताको कैकेयीद्वारा तपस्विनीके वस्त्र देनेपर प्रजाका एक साथ चिल्ला उठना ‘धिक् त्वां दशरथम्’ तथा धृतराष्ट्रकी राजसभामें द्रौपदीकी दुर्दशा होनेपर भी भीष्म, द्रोणादि वीरोंका कुछ भी न कर सकना, कुटिला दासी मन्थराका भी अपमान भरतके लिये असह्य और महारानी द्रौपदीकी दुर्दशामें दुर्योधन-कर्णादिकी प्रसन्नता, सती-साध्वी सीताका पातिव्रत और श्रीरामचन्द्रजीका पत्नीव्रत, उसके प्रतिकूल सत्यवतीके और कुन्तीके कानीन पुत्रोंकी उत्पत्ति और पाण्डवादिके बहुविवाह, श्रीरामचन्द्रजीके वनकी ओर चलनेपर अयोध्यावासियोंका उनके साथ वनगमनके लिये प्रयत्न और युधिष्ठिरके दो बार हस्तिनापुरसे निकाले जानेपर सिवा थोड़े-से नगर-निवासियोंके पाण्डवोंके दु:खके साथ खुल्लमखुल्ला दु:ख प्रकट करनेमें अन्योंका कौरवोंके भयसे मौनावलम्बन, श्रीराम और भरतका महान् राज्य-जैसे पदार्थको धर्मपालनके सम्मुख तुच्छ समझना और उसे एकका दूसरेके हाथमें फेंकना और दुर्योधनका यह कहना कि ‘सूच्यग्रं नैव दास्यामि विना युद्धेन केशव’ युद्धक्षेत्रमें रावणके घायल हो जानेपर श्रीरामचन्द्रजीका यह कहना कि घायलका वध करना धर्मविरुद्ध है और शस्त्र छोड़े हुए भीष्म और द्रोणका वध, रथसे उतरे हुए कर्णका वध, सोते हुए धृष्टद्युम्न, शिखण्डी और द्रौपदीके पाँचों पुत्रोंका ब्राह्मणकुलोत्पन्न वीरताभिमानी अश्वत्थामाद्वारा वध, कहाँतक गिनायें। ये सब घटनाएँ हैं—जो स्पष्टरूपसे रामायण और महाभारतके समयकी अवस्थाओंको प्रकट करती हैं। यद्यपि महाभारतके समय रामायणके समयकी भाँति ही अथवा उससे भी अधिक आर्यावर्तमें सम्पत्ति भरी हुई थी और रामायणके समयके वीरोंकी भाँति भीष्म, द्रोण, अर्जुन आदि कतिपय योद्धा वायव्यास्त्र, पाशुपतास्त्र, वारुणास्त्र, अन्तर्धानास्त्र, ब्रह्मास्त्रादि आग्नेयास्त्रोंकी विद्या भी जानते थे। अश्वतरी नाम अग्नियान जलपर चलता था, आर्यावर्तका दबदबा सारी पृथ्वीपर जमा हुआ था; परंतु रामायणके रामकी अपेक्षा इस समय धर्मका बहुत ह्रास था.....।’
इस अवतरणसे यह सिद्ध हो जाता है कि श्रीरामका और रामायणका काल बहुत ही प्राचीन, शिक्षाप्रद तथा गौरवमय है।