श्रीरामचरितमानस सच्चा इतिहास है
कहा तो जाता है कि वर्तमान युग बुद्धिप्रधान और उन्नतिसम्पन्न है, परंतु गम्भीरताके साथ विचार करनेपर पता लगता है कि बुद्धिकी जगह अश्रद्धा और अविश्वासने ले ली है और उन्नतिका स्थान कलह और द्वेषने! जहाँ अश्रद्धा और अविश्वासका विस्तार है, वहाँ हम यह कहते हैं कि यहाँ बुद्धिसे काम लिया जाता है, अविवेक या अन्धपरम्परासे नहीं; और जहाँ द्वेष और कलह है, वहाँ हम समाजमें जागृति और उन्नतिका आरोप करते हैं। इसी कारण आज हमारी वास्तविकता नष्ट हो रही है और क्रमश: हमारा जीवन कृत्रिम होता चला जा रहा है। श्रद्धा-विश्वासका तिरस्कार करके हम अपने घरमें रखे हुए पारससे लाभ नहीं उठा रहे हैं, यही विधिकी विडम्बना है। इसी कारण आज अपनी सनातन सभ्यता और इतिहासपरसे हमारी आस्था उठती चली जा रही है। अच्छे-अच्छे विद्वान् और समझदार पुरुष भी आज प्रत्येक सत्यको—यहाँतक कि ईश्वरतकको कवि-कल्पनाका स्वरूप देनेमें ही अपनी शान समझने लगे हैं। यह मानव-जातिका दुर्भाग्य है!
रामायण और महाभारतको सनातनसे हिंदूजाति अपना गौरवपूर्ण इतिहास मानती चली आ रही है, परंतु आधुनिक विद्वान् उन्हें इतिहास स्वीकार करनेमें हिचकते हैं। अवश्य ही इसमें उनकी नीयत बुरी नहीं है, परंतु कालप्रभाव और अविश्वासपूर्ण वायुमण्डलका उनकी बुद्धिपर इतना गहरा असर हुआ है कि उनका लक्ष्य और उनकी विचारधाराकी गति ही पलट गयी है। इसीसे प्रत्येक बातको वे अपनी काल्पनिक कसौटीपर कसकर क्षणोंमें ही काल्पनिक करार दे डालते हैं। रामायणके सम्बन्धमें कुछ विद्वान् स्पष्टरूपसे ऐसा कहते हैं कि ‘यह इतिहास नहीं है, काव्य-मात्र है। इसमें जिन पात्रोंका वर्णन है; वे या तो हुए ही नहीं, यदि हुए हैं तो इस काव्यमें उनका सर्वथा अतिरंजित रूप है। उनको केवल आधार बनाकर काव्य लिखा गया है, इतिहासके रूपमें उनके जीवनकी सत्य घटनाओंका संकलन इसमें नहीं है।’ इस प्रकारके विचार रखनेवाले सज्जनोंसे यही प्रार्थना है कि वे इस विषयपर पुन: विचार करें। यदि गम्भीरताके साथ विचार करेंगे और भ्रान्त विचारधाराको शुद्ध कर सकेंगे तो उन्हें अवश्य ही अपनी भूल प्रतीत होगी।
दूसरी श्रेणीमें कुछ सज्जन ऐसे हैं, जो वाल्मीकीय रामायणको तो इतिहास स्वीकार करते हैं, परंतु गोसाईं तुलसीदासजी महाराजके रामचरितमानसको इतिहास नहीं मानते। वे उसे केवल भक्तिपूर्ण सुन्दर काव्य ही मानते हैं, परंतु यथार्थमें ऐसी बात नहीं है। जिस प्रकार वाल्मीकीय रामायण सच्चा इतिहास है, उसी प्रकार तुलसीकृत रामचरितमानस भी है। इसपर कहा जा सकता है कि यदि ऐसी ही बात है तो जगह-जगह दोनोंके वर्णनोंमें इतना भेद क्यों है। इसका उत्तर गोस्वामी तुलसीदासजीने स्वयं ही दे दिया है—
जेहिं यह कथा सुनी नहिं होई।
जनि आचरजु करै सुनि सोई॥
कथा अलौकिक सुनहिं जे ग्यानी।
नहिं आचरजु करहिं अस जानी॥
रामकथा कै मिति जग नाहीं।
असि प्रतीति तिन्ह के मन माहीं॥
नाना भाँति राम अवतारा।
रामायन सत कोटि अपारा॥
कलपभेद हरिचरित सुहाए।
भाँति अनेक मुनीसन्ह गाए॥
करिअ न संसय अस उर आनी।
सुनिअ कथा सादर रति मानी॥
राम अनंत अनंत गुन अमित कथा बिस्तार।
सुनि आचरजु न मानिहहिं जिन्ह कें बिमल बिचार॥
‘मैं जो यह नयी कथा कहता हूँ, इसको पहले (किसी भी रामायणमें) न सुना हो तो इसे सुनकर आश्चर्य न करें। जो ज्ञानी पुरुष इस विचित्र (पहले कहीं न सुनी हुई) कथाको सुनते हैं, वे यह जानकर आश्चर्य नहीं करते कि संसारमें रामकथाकी कोई सीमा नहीं है। उनके मनमें ऐसा विश्वास रहता है। नाना प्रकारसे श्रीरामचन्द्रजीके अवतार हुए और करोड़ों अपार रामायण हैं। कल्पभेदके अनुसार श्रीहरिके सुन्दर चरित्रोंको मुनीश्वरोंने अनेकों प्रकारसे गाया है। हृदयमें ऐसा विचारकर सन्देह न कीजिये और आदरसहित प्रेमसे इस कथाको सुनिये। श्रीरामचन्द्रजी अनन्त हैं, उनके गुण भी अनन्त हैं और उनकी कथाओंका विस्तार भी असीम है। अतएव जिनके निर्मल विचार हैं, वे इस कथाको सुनकर आश्चर्य नहीं मानेंगे।’
यह जान रखना चाहिये कि महामुनि वाल्मीकिने जिन रामकी कथाका वर्णन किया है, वे भगवान् विष्णुके अवतार हैं और गोसाईंजीके राम समग्र ब्रह्मरूप परात्पर भगवान् हैं। उन दोनों अवतारोंकी लीलाओंमें अन्तर है और उसीके अनुसार दोनों सत्यवादी महर्षि कवियोंने उनका यथार्थ वर्णन किया है। वाल्मीकि और तुलसीदासजी कवि पीछे हैं, भगवद्भक्त महर्षि पहले। इसलिये वे मिथ्या कल्पनाको इतिहासका स्वरूप दें, ऐसा मानना भूल है। तुलसीदासजीने स्वयं अपने रामचरितमानसको ‘इतिहास’ कहा है—
कहेउँ परम पुनीत इतिहासा।
सुनत श्रवन छूटहिं भव पासा॥
प्रनत कल्पतरु करुना पुंजा।
उपजइ प्रीति राम पद कंजा॥
शिवजी कहते हैं—मैंने यह परम पुनीत इतिहास कहा है, इसके सुननेसे भवबन्धन छूट जाता है और प्रणतकल्पतरु करुणामय श्रीरामजीके चरणकमलोंमें प्रेम उत्पन्न होता है।
आधुनिक इतिहासोंसे हमारे इन इतिहासोंकी यही विशेषता है। आधुनिक इतिहासोंके पढ़नेसे केवल घटनाओंका और तारीख-सनोंका ही पता लगता है और प्राय: वे इतिहास किसी-न-किसी सम्पर्कयुक्त व्यक्तिके लिखे होनेसे सर्वथा सत्य भी नहीं होते, परंतु हमारे रामायण-महाभारतादि इतिहास ब्रह्मज्ञानी, भगवद्भक्त, स्वाभाविक ही सदाचार-परायण, सत्यवादी ऋषियोंके लिखे होनेके साथ ही वे धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष चारों पुरुषार्थोंके उपदेशोंसे समन्वित होनेके कारण पढ़नेवालोंको भवपाशसे मुक्तकर उन्हें भगवान्का परम प्रेम प्रदान करनेमें समर्थ होते हैं। काव्यकलाका विशेष आनन्द तो घलुएमें मिल जाता है। इसीसे हमारे इतिहासका लक्षण है—
धर्मार्थकाममोक्षाणामुपदेशसमन्वितम्।
पूर्ववृत्तकथायुक्तमितिहासं प्रचक्षते॥
‘जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्षके उपदेशोंसे समन्वित और प्राचीन (सत्य) घटनाओंसे युक्त हो उसे इतिहास कहते हैं।’
श्रीरामचरितमानस भी ऐसा सत्य घटनाओंसे पूर्ण इतिहास है। इसमें महाकाव्यका रस भरा है, यह इसकी विशेषता है और तमाम दु:खोंका नाश करके परमानन्द और परम शान्तिकी प्राप्तिके साथ ही परात्पर श्रीभगवान्के ज्ञान, दर्शन और प्रेमको अनायास ही प्राप्त करा देना इसका सुन्दर फल है।