श्रीरामका राजधर्मोपदेश
त्यागमूर्ति धर्मात्मा भरतजी चित्रकूटमें श्रीरामजीके चरणोंपर पड़े हैं, आँसुओंसे उनके चरण धो रहे हैं, भरतका वेष तपस्वियोंका-सा है, अत्यन्त शोकके कारण थोड़े ही दिनोंमें उनका शरीर सूखकर काँटा हो गया है। श्रीरामने प्रेमसे उठाकर भरतको हृदयसे लगा उनका मस्तक सूँघा और गोदमें बैठाकर बड़े प्यारसे उनकी इस दशाका कारण पूछा। पहले तो पिताजीके सम्बन्धमें प्रश्न किये, फिर वे राजधर्मके विषयमें पूछने लगे। श्रीरामजीके प्रश्नोंसे ही यह स्पष्ट हो जाता है कि राजधर्मका क्या स्वरूप है और उस समय राजधर्म कैसा था? श्रीरामजीने भरतको विषादमय देखकर कहा—
‘हे सौम्य! तुम अभी बालकके समान हो, तुम्हारे हाथसे कहीं राज्य तो नष्ट नहीं हो गया? हे सत्यपराक्रम! तुम पिताजीकी सेवा तो करते हो न? भाई! इक्ष्वाकु-कुलके आचार्य, धर्मप्रेमी, विद्वान्, महातेजस्वी महर्षि वसिष्ठजीकी पूजा तो करते हो न? माता कौसल्या, सुपुत्र उत्पन्न करनेवाली सुमित्रा और आर्या देवी कैकेयी तो तुमसे प्रसन्न हैं न? विनयी, सर्वशास्त्रज्ञ, कर्मकाण्ड-निपुण, असूयारहित, कुलगुरु वसिष्ठजीके पुत्र, जो तुम्हारे पुरोहित हैं, उनका भलीभाँति सत्कार तो करते हो न? बड़े बुद्धिमान्, वेदविधिके ज्ञाता, अत्यन्त विनयी, गुरुपुत्र सुयज्ञ, जिनकी तुमने अग्निकार्यके लिये नियुक्ति की है, हवनके पूर्व और हवनके पश्चात् तुम्हें उसकी सूचना तो देते हैं न? तुम देवता, गुरुजन, पितर, पिताके समान पूज्य बड़े-बूढ़ेलोग, वैद्य, ब्राह्मण और नौकरोंका यथायोग्य सत्कार तो करते हो न? इसी प्रकार शस्त्रास्त्रके प्रयोग जाननेवाले, अर्थशास्त्रके विद्वान्, राजनीतिविशारद, धनुर्वेदके ज्ञाता सुधन्वा, पण्डित आदि सत्पुरुष तुम्हारे द्वारा आदर तो पाते हैं न? तुमने अपने समान विश्वासी, शूर, विद्वान्, जितेन्द्रिय, कुलीन और ऊपरकी चेष्टासे ही मनके भावको समझ जानेवाले लोगोंको तो अपना मन्त्री बनाया है न? क्योंकि शास्त्रज्ञ और मन्त्रकी रक्षा कर सकनेवाले मन्त्रियोंके द्वारा सुरक्षित मन्त्र ही राजाओंकी विजयका मूल कारण है।
‘तुम जागनेके समय सोते तो नहीं हो? रातके पिछले पहर उठकर अपने कार्योंकी सिद्धिका उपाय तो सोचते हो न? अकेले ही तो किसी बातका मनमाना निश्चय नहीं कर लेते? अथवा बहुत-से अयोग्य आदमियोंके साथ मिलकर तो निश्चय नहीं करना चाहते? तुम्हारे स्थिर किये हुए विचारका काम पूरा होनेके पहले ही लोगोंको पता तो नहीं लग जाता? थोड़े प्रयत्नसे बड़ा फल उत्पन्न करनेवाला उपाय निश्चय कर लेनेपर फिर उसके अनुसार कार्य करनेमें विलम्ब तो नहीं करते? तुम्हारे सामन्त राजा तुम्हारे किसी विचारको कार्यके सिद्ध होने या सिद्धिके समीप पहुँचनेके पहले ही जान तो नहीं लेते? तुम्हारे निश्चित विषयोंको तुम्हारे द्वारा या मन्त्रियोंद्वारा कहे जानेसे पूर्व ही अनुमान, तर्क, युक्ति आदिके द्वारा कोई जान तो नहीं लेता? परंतु तुम और तुम्हारे मन्त्रीगण दूसरोंके निश्चय किये हुए विषयोंको अनुमान, युक्ति और तर्कके द्वारा जान तो लेते हो न? हजारों मूर्खोंकी अपेक्षा एक पण्डितको तुम अपने पास रखना अच्छा समझते हो न? क्योंकि संकटके समय पण्डित ही उत्तमोत्तम उपाय सोचकर राजाका महान् कल्याण करता है। राजा चाहे हजारों-लाखों मूर्खोंको अपने पास रखे, उनसे समयपर कोई सहायता नहीं मिलती; पक्षान्तरमें एक ही बुद्धिमान्, शूरवीर, दक्ष, विचक्षण मन्त्री राजा या राजपुत्रको विशाल समृद्धिकी प्राप्ति करवा सकता है। तुम उत्तम सेवकोंको उत्तम कार्यपर, मध्यमको मध्यम कार्यपर और छोटे सेवकोंको छोटे कार्यपर यानी जिसके योग्य जो कार्य हो, उसको उसी कार्यपर नियुक्त करके सबकी ठीक व्यवस्था तो रखते हो न? बड़े-बड़े कार्योंपर भलीभाँति परीक्षा किये हुए, बाप-दादोंके समयके मन्त्रियोंके वंशज, निष्पाप, ऊँचे विचारवाले लोगोंको ही नियुक्त करते हो न? तुम किसीको ऐसा उग्र दण्ड तो नहीं देते, जिससे दु:खी होकर प्रजा या मन्त्री तुम्हारा तिरस्कार करते हों? भाई! जैसे कुलीन स्त्री पर-स्त्रीमें आसक्त पुरुषका तिरस्कार करती है, वैसे ही यज्ञ करानेवाले ब्राह्मण तुमपर कोई अपराध लगाकर तुम्हें यज्ञके योग्य न समझकर तुम्हारा अपमान तो नहीं करते? धनके लोभसे राजाकी बीमारी बढ़ानेवाले वैद्यको, राजाके ऐश्वर्यको भ्रष्ट करनेके लिये विश्वासी सेवकोंको फोड़नेवाले सेवकको जो राजा प्राण-दण्ड नहीं देता वह स्वयं ही मारा जाता है। भरत! तुम्हारा सेनापति तुमसे सदा प्रेम करनेवाला, शूरवीर, धीर, बुद्धिमान्, पवित्र, कुलीन और चतुर तो है न? युद्धकलामें निपुण, बलवान् वीरतामें परीक्षा किये हुए प्रधान योद्धाओंको तुम सदा सम्मान-दानसे प्रसन्न तो रखते हो न? सेनाको अन्न और वेतन प्रतिमास ठीक समयपर मिल जाता है न? इस कार्यमें कुछ भी देर तो नहीं होती? क्योंकि सैनिकोंको अन्न और वेतन समयपर न मिलनेसे वे विद्रोही हो उठते हैं, जिससे बड़ा अनर्थ हो जाता है। तुम्हारे कुलके प्रधान लोग तुमपर प्रेम तो रखते हैं न? वे तुम्हारे हितके लिये समयपर स्वेच्छासे सदा प्राण देनेको तैयार तो रहते हैं न? भाई! अपने ही देशके विद्वान्, चतुर, प्रतिभाशाली, जैसा कहा हो वैसा ही करनेवाले पण्डितोंको ही तुमने दूत बनाया है न?
‘भरत! एक-दूसरेको न पहचाननेवाले तीन-तीन गुप्त दूतोंद्वारा तुम अपने राज्यके पन्द्रह और दूसरेके राज्यके अठारह तीर्थोंका पूरा पता तो रखते हो न? १-मन्त्री, २-पुरोहित, ३-युवराज, ४-सेनापति, ५-द्वारपाल, ६-रनिवासका रक्षक, ७-कारागृह-अध्यक्ष (जेल-सुपरिटेंडेंट), ८-खजांची, ९-राज्यकी आज्ञा सुनानेवाला, १०-वकील, ११-न्यायकर्ता (जज), १२-व्यवहार-निर्णायक (पंच या जूरी), १३-सेनाको वेतन चुकानेवाला, १४-कर-संग्रहकर्ता (तहसीलदार), १५-नगराध्यक्ष (म्युनिसिपालिटिका चेयरमैन), १६-राष्ट्रान्त:पाल (सीमारक्षक), १७-दुष्टोंको दण्ड देनेवाला और १८-जल, पर्वत और वनोंके किलोंकी रक्षा करनेवाला—ये अठारह तीर्थ हैं। इनमें मन्त्री, पुरोहित और युवराजको अलग कर देनेपर पन्द्रह बचते हैं। इन सबके कार्योंपर राजाको अवश्य निगरानी रखनी चाहिये। शत्रुदमन! देशका अहित करनेवाले जिन लोगोंको तुमने देशसे निकाल दिया है, वे यदि देशमें फिर आ बसते हैं तो तुम उनको दुर्बल समझकर उनकी उपेक्षा तो नहीं करते? तुम नास्तिक ब्राह्मणोंका संग तो नहीं करते? परलोक-ज्ञानसे शून्य अनर्थपरायण, पाण्डित्याभिमानी लोगोंसे बहुत बुराई होती है। ऐसे दुर्बुद्धि लोग प्रामाणिक धर्मशास्त्रोंके विद्यमान रहनेपर भी शुष्क तर्क-बुद्धिसे अर्थहीन उपदेश किया करते हैं। भाई! हमलोगोंके वीर पूर्वजोंके द्वारा सेवित यथार्थ अयोध्या (जहाँ युद्धार्थ कोई भी शत्रु नहीं आता) नामवाली और मजबूत दरवाजोंवाली, हाथी, रथ और घोड़ोंसे भरी हुई, अपने-अपने कर्ममें लगे हुए जितेन्द्रिय, उत्साही और उत्तम हजारों ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्योंसे युक्त, अनेक प्रकारके बड़े-बड़े सुन्दर महलोंवाली, अनेक प्रकारके विद्वान् और धन-ऐश्वर्यसे परिपूर्ण विशाल नगरीकी भलीभाँति रक्षा तो करते हो न? भाई! जिसमें अनेक देव-मन्दिर हैं, अश्वमेधादि यज्ञ करनेयोग्य अनेक स्थल हैं, जो बुद्धिमान् मनुष्योंसे पूर्ण है, नदी, तालाब आदि जलाशयोंसे युक्त है, जिसमें सभी स्त्री-पुरुष सुप्रसन्न हैं, जहाँ अनेक सभाएँ और उत्सव हुआ करते हैं, अच्छी खेती होती है, पर जो बादलोंपर निर्भर नहीं है, जो गौ आदि पशुओंसे भरा है, जहाँ पशुहिंसा बिलकुल नहीं होती, जहाँ हिंस्र पशु नहीं हैं अर्थात् हिंसक पशुओंने हिंसा छोड़ रखी है, किसीको किसी प्रकारका भय नहीं है, अनेक धातुओंकी खानें हैं, जहाँ पापी मनुष्य नहीं रहते, ऐसा अपने पूर्वजोंद्वारा सुरक्षित समृद्धिशाली देश तुम्हारे शासनमें सुखी तो है न? भाई! अपने देशमें रहनेवाले खेती और गोरक्षापर आजीविका चलानेवाले व्यापारियोंपर तुम प्रेम तो करते हो न? खेती और व्यापारमें लगे हुए वैश्योंकी सारी इच्छाओंको पूर्ण करके तुम उनका भलीभाँति संरक्षण तो करते हो न? देशमें बसनेवाली प्रजाका पालन करना राजाका धर्म है। तुम स्त्रियोंका किसी प्रकार अपमान तो नहीं होने देते हो? स्त्रियोंको भलीभाँति संतोष तो कराते हो न? वे तुमसे सुरक्षित तो रहती हैं न? तुम उनके वचनोंपर अतिविश्वास तो नहीं करते? और उन्हींको इष्ट मानकर अपनी गुप्त बात तो नहीं कह देते हो?
‘भरत! जहाँ बहुत-से हाथी उत्पन्न होते हैं ऐसा अपना हाथीवन तो सुरक्षित है न? तुम अच्छे हाथी, हथिनी और घोड़ोंके संग्रहमें तृप्त तो नहीं होते? तुम प्रतिदिन प्रात:काल राजमार्गोंपर जाकर प्रजाको अपने सुसज्जित शरीरसे दर्शन तो देते हो न? तुम्हारे कर्मचारी नि:शंक होकर तुम्हारे सामने बेअदबीसे तो नहीं आते? अथवा तुमसे डरकर या तुम्हें अभिमानी समझकर तुम्हारे सामने आनेमें संकोच तो नहीं करते? कर्मचारियोंको न तो बहुत पास रखना चाहिये और न बहुत दूर ही। बीचका मार्ग ही अच्छा है। भाई! तुम्हारे सब किले धन-धान्य, हथियार, जल, अनेक प्रकारके यत्न-शिल्पी और धनुर्धारी वीरोंसे तो भरे हैं न? तुम्हारी आमदनी खर्चसे ज्यादा तो है न? तुम्हारा धन नाचने-गाने और खुशामद करनेवाले अपात्रोंमें तो खर्च नहीं होता? राजाको आमदनीसे खर्च कम करना चाहिये और वह भी प्रजाको अन्न, जल, वायु आदि दैवी वस्तुओंसे यथायोग्य सुख पहुँचानेवाले देवों, प्रजाके सुखाकांक्षी पूज्य पितृगणों, विद्यादान देनेवाले ब्राह्मणों, पूज्य अतिथियों, राज्यरक्षक योद्धाओं, सम्बन्धी और प्रिय मित्रोंके पोषण करनेमें और प्रजाके सुखके कार्योंमें करना चाहिये।
‘भाई! तुम्हारे राज्यके न्यायाधीश, किसी सदाचारी साधुपर कोई झूठा अपराध लगनेपर धर्मके ज्ञाता पुरुषोंके द्वारा निर्णय कराये बिना ही धनके लोभसे उसे दण्ड तो नहीं दे देते? अथवा घरके मालिक या तुम्हारे सिपाहीद्वारा पकड़े हुए चोरको, उसके चोर सिद्ध हो जानेपर एवं चोरीका माल पकड़ा जानेपर भी लोभसे छोड़ तो नहीं देते? सारांश कि राजाको यह खयाल रखना चाहिये कि जिसमें उसके राज्यमें निरपराधी प्रजा दण्डित न हो और अपराधी छूट न जाय। भाई! तुम्हारे शास्त्रज्ञ मन्त्रीगण धनी और गरीबके मामलेमें लोभ छोड़कर निष्पक्ष यथार्थ न्याय तो करते हैं न? क्योंकि राजाके अन्यायके कारण बिना अपराध दण्डित हुए मनुष्योंकी आँखोंसे जो आँसू गिरते हैं, वे भोग-विलासके लिये राज्य करनेवाले राजाके पुत्र और पशुधनको नष्ट कर डालते हैं। हे प्रिय! तुम वृद्धों, बालकों और प्रधान वैद्योंका दान, स्नेह और मधुर वचनोंसे सत्कार तो करते हो न? इसी प्रकार देवताओं, गुरुजनों, वृद्धों, तपस्वियों, अतिथियों, देवमन्दिरों और तपस्या आदिद्वारा पवित्र हुए ब्राह्मण आदिको प्रणाम तो करते हो न?
‘भाई! प्रात:कालका समय धर्मोपार्जनका है, उस समय अर्थोपार्जनके कार्यमें लगकर धर्मका बाध तो नहीं करते? ऐसे ही मध्याह्नकाल राज-काज देखनेका यानी अर्थ-संग्रह करनेका है, उस समय धर्मकार्यमें लगकर अर्थका बाध तो नहीं करते? अथवा इन्द्रियभोगार्थ, कामके वश हो धर्म, अर्थ दोनोंको बाधित तो नहीं करते हो? समयका उचित विभाग करके ही धर्म, अर्थ और कामका यथायोग्य आचरण करते हो न? भाई! देशके विद्वान् ब्राह्मण और समस्त प्रजाजन तुम्हारा कल्याण तो चाहते हैं न?
‘नास्तिकता, असत्य, क्रोध, प्रमाद, दीर्घसूत्रता, ज्ञानियोंका संग न करना, आलस्य, इन्द्रियोंके वश होना, महत्त्वपूर्ण कार्यका अकेले ही विचार करना, विपरीत दृष्टिवाले अयोग्य पुरुषोंकी सलाह लेना, निश्चित किये हुए कार्यका आरम्भ न करना, गुप्त मन्त्रणाओंका भेद खोल देना, प्रतिदिन प्रात:काल नित्यकर्म न करना, सब ओरके शत्रुओंपर एक ही साथ चढ़ाई कर देना और महापुरुषोंको आते देख सिंहासनसे उठकर उसे प्रणाम न करना—ये चौदह राजदोष समझे जाते हैं, तुममें इनमेंसे एक भी दोष तो नहीं है न?
‘बुद्धिमान् भरत! दशवर्ग१, पंचवर्ग२, सप्तवर्ग३, चतुर्वर्ग४, अष्टवर्ग५ और त्रिवर्ग६को तो तुम तत्त्वसे जानते हो न? त्रिविध विद्या७की ओर तो तुम्हारा ध्यान है न? बुद्धिसे इन्द्रियोंको जीतनेका उपाय८, षड्गुण९, दैवी आपत्ति१०, मानुषी आपत्ति११, राज-कर्तव्य१२, बीसवर्ग१३, पाँच प्रकृति१४, राजमण्डल१५, पंचयात्रा१६, दण्डविधान, एवं सन्धि और विग्रह—ये सब नीतिशास्त्रके तत्त्व हैं। इनमें कुछ ग्रहण करनेयोग्य, कुछ त्याग करनेयोग्य और कुछ प्रतीकार करनेयोग्य हैं। तुम इन सबके भेदोंको समझते हुए यथायोग्य ग्रहण, त्याग और प्रतीकार तो करते हो न?
‘हे बुद्धिमान्! तुम शास्त्रानुसार तीन-चार निपुण मन्त्रियोंसे एक साथ या उनके मनकी बात जाननेके लिये अलग-अलग राय लेकर तो सारे कार्य करते हो न? वेदोक्त क्रियाओंको करके तुम वेदको सफल तो करते हो न? तुम्हारे सारे राज्यकार्य सफल तो होते हैं न? उत्तम आचरण करके तुम श्रवण किये शास्त्रोंको तो सफल कर रहे हो न? धर्मपरायणा और संतानवती होकर स्त्रियाँ तो सफल हैं न? भाई भरत! मेरे कथनानुसार ही तुमने आयु, यश, धर्म, अर्थ और कामको प्रदान करनेवाली सद्बुद्धिका आश्रय ले रखा है न? तुम अपने पिता-पितामहादिके व्यवहारके अनुकूल ही व्यवहार करते हो न? क्योंकि वही शुभ और सत्पथा वृत्ति है। तुम स्वादिष्ट भोजन अकेले तो नहीं खाते? अधिक प्रेम होनेके कारण भोजन चाहनेवाले मित्रोंको यथेच्छ भोजन तो देते हो न? इस प्रकार धर्मानुसार शासन करनेवाला राजा अपनी प्रजाका पालन करके समस्त पृथ्वीपर अपना आधिपत्य स्थापित करता है और मृत्युके अनन्तर स्वर्ग या परमधामको जाता है।’ यह वर्णन वाल्मीकिरामायणके आधारपर लिखा गया है।