श्रीरामका स्वरूप और उनकी प्रसन्नताका साधन

राम सरूप तुम्हार बचन अगोचर बुद्धिपर।

अबिगत अकथ अपार नेति नेति नित निगम कह॥

× × ×

सब कर परम प्रकासक जोई।

राम अनादि अवधपति सोई॥

प्रश्न—भगवान् श्रीरामको कोई परात्पर ब्रह्म, कोई भगवान् विष्णुका अवतार, कोई महापुरुष, कोई आदर्श राजा और कोई काल्पनिक व्यक्ति मानते हैं; अतएव यह बताइये कि श्रीरामका वास्तविक स्वरूप क्या है?

उत्तर—भगवान् श्रीरामका प्रपंचातीत भगवत्स्वरूप कैसा है, इस बातको तो भगवान् ही जानते हैं। संसारमें ऐसा कोई भी नहीं, जो उनके स्वरूपकी यथार्थ और पूर्ण व्याख्या कर सके। भगवान‍्के सम्बन्धमें अबतक जो कुछ कहा गया है, वह सारा-का-सारा भगवान‍्का आंशिक वर्णन ही है, शाखाचन्द्र-न्यायसे संकेतमात्र है; तथापि वह मिथ्या नहीं है। समुद्रका प्रत्येक कण समुद्र है; इसी प्रकार भगवान‍्का जो कुछ भी वर्णन है, वह पूरा न होनेपर भी उन्हींका है और इस दृष्टिसे भगवान‍्के सम्बन्धमें जो जैसा कहते हैं, ठीक ही कहते हैं। भगवान् श्रीराम परात्पर ब्रह्म भी हैं, विष्णुके अवतार भी हैं, महापुरुष भी हैं, आदर्श राजा भी हैं और उनके काल्पनिक होनेकी कल्पना करनेवाला मन आत्मरूप भगवान‍्के ही आश्रित होनेके कारण वे काल्पनिक भी हैं। बात यह है कि भगवान‍्का स्वरूप ही ऐसा है, जिसमें सभीका समावेश है; क्योंकि सब कुछ उन्हींसे उत्पन्न है, उन्हींमें है, सबमें वे ही समाये हुए हैं—वे ही ‘सर्व’, ‘सर्वगत’, ‘सर्व-उरालय’ हैं। वस्तुत: भगवान‍्का स्वरूप, उनके गुण और भाव अकल, अचिन्त्य एवं अनिर्वचनीय हैं। उनकी उपमा कहीं मिलती ही नहीं। इसीसे कहा गया है—

निरुपम न उपमा आन राम

समान रामु निगम कहै।

जिमि कोटि सत खद्योत सम रबि

कहत अति लघुता लहै॥

एहि भाँति निज निज मति बिलास

मुनीस हरिहि बखानहीं।

प्रभु भाव गाहक अति कृपाल

सप्रेम सुनि सुख मानहीं॥

अर्थात् श्रीरामजी उपमारहित हैं, उनकी कोई दूसरी उपमा है ही नहीं। श्रीरामके समान श्रीराम ही हैं, ऐसा वेद कहते हैं। जैसे अरबों जुगनुओंके समान कहनेसे सूर्य प्रशंसाको नहीं, वरं अत्यन्त लघुताको ही प्राप्त होता है, उसी प्रकार अपनी बुद्धिके विकासके अनुसार मुनीश्वर श्रीहरिका वर्णन करते हैं; किंतु प्रभु भक्तोंके भावमात्रको ग्रहण करनेवाले और अत्यन्त कृपालु हैं। वे उस वर्णनको प्रेमसहित सुनकर सुख मानते हैं।

प्रश्न—मैं तो पूछता हूँ कि जिन भगवान‍्ने दशरथजीके यहाँ जन्म धारण किया था, वे कौन हैं?

उत्तर—वे साक्षात् भगवान् हैं। हाँ, कल्पभेदसे कभी भगवान् विष्णु रामरूपमें अवतीर्ण होते हैं तो कभी साक्षात् पूर्णब्रह्म परात्पर भगवान‍्का अवतार होता है। परंतु यह स्मरण रहे कि विष्णु भी भगवान‍्के ही स्वरूप हैं; इसलिये स्वरूपत: इनमें कोई तारतम्य नहीं है, लीलाभेदसे ही पृथक्त्व है।

प्रश्न—भगवान् अवतार क्यों लेते हैं?

उत्तर—अपनी इच्छासे। वस्तुत: भगवान‍्में कोई इच्छा भी नहीं है। भक्तोंकी इच्छा ही उनमें इच्छा पैदा कर देती है, इसीसे वे हमलोगोंमें उतर आते हैं। सच्ची बात तो यह है कि न उनमें जन्म है, न कर्म; क्योंकि उनके अदृष्ट ही नहीं है। जीव तो अपने पूर्वकृत कर्मोंके संस्कारवश पराधीन हो देह धारण करके अपना कर्म-फल भोगता है और संचितकी स्फुरणा तथा वातावरणके वशमें होकर नवीन कर्म करता है; परंतु भगवान् ऐसा नहीं करते। कारण, उनमें कर्म-संस्कारोंका सर्वथा अभाव है और वे भोगदेह नहीं ग्रहण करते तथा कर्तृत्वाभिमान न होनेसे उनके द्वारा फलोत्पादक नवीन कर्म भी नहीं होता। उनका अवतार तो जीवोंपर अनुग्रहकी वर्षा करनेके लिये ही होता है।

प्रश्न—रामायण तथा अन्य पुराणादि ग्रन्थोंमें ऐसा पाया जाता है कि भगवान् शाप या वरदानके वश होकर जन्म ग्रहण करते हैं—जैसे नारदजीने उन्हें मनुष्य होनेका शाप दिया, वृन्दाने शाप दिया, जय-विजयका उद्धार करनेके लिये सनकादि महर्षियोंने शापानुग्रह किया, रावण-कुम्भकर्णादिको ब्रह्माने वर दिया, स्वायम्भुव मनु और शतरूपाको उनके यहाँ पुत्ररूपमें प्रकट होनेके लिये श्रीरामजीने वरदान दिया—इस प्रकारकी और भी अनेकों कथाएँ प्रसिद्ध हैं; इनका क्या हेतु है? बल्कि कथाएँ तो यहाँतक आती हैं कि शूर्पणखाकी इच्छा पूरी करनेके लिये भगवान‍्ने कृष्णावतारमें उसे कुब्जारूपमें अंगीकार किया, दण्डकारण्यके ऋषियोंकी इच्छा-पूर्तिके लिये भगवान‍्ने उन्हें गोपिकाओंके रूपमें स्वीकार किया और बालिवधका बदला श्रीकृष्णावतारमें छिपे हुए व्याधके द्वारा अपने चरणमें बाण मरवाकर चुकाया गया। फिर इन सबका क्या अर्थ है? क्या ये कथाएँ असत्य हैं?

उत्तर—असत्य एक भी कथा नहीं है। परंतु विचारकर देखनेपर पता लगेगा कि भगवान् अपने भक्तोंपर अनुग्रह करने तथा अपनी धर्म-मर्यादाकी रक्षाके लिये लोकदृष्टिमें अपने ऊपर शाप-वरदानोंका एवं कर्म-फल-भोगका आरोप कर लेते हैं। यही लोकसंग्रहका आदर्श है। वस्तुत: भगवान् पर न तो किसी शाप-वरदानका कोई प्रभाव होता है और न उन्हें किसी कर्म-फलका ही भोग करना पड़ता है। जब मुक्त पुरुष भी किसी शाप-वरदानके वश नहीं होते एवं देहाभिमान और कर्तृत्वाभिमान न रहनेके कारण अदृष्टके अभावसे फलभोगार्थ जन्म ग्रहण नहीं करते, तब भगवान‍्की तो बात ही क्या है। इसी विलक्षणताको बतानेके लिये भगवान‍्के जन्म-कर्मको ‘लीला’ कहा गया है।

भगवान् वस्तुत: किसी शाप-वरदानके वश नहीं हो सकते, इसपर एक इतिहास सुनो—महाभारतयुद्धके समाप्त हो जानेपर भगवान् श्रीकृष्ण द्वारकाको लौट रहे थे। रास्तेमें उत्तंक मुनिका आश्रम था। श्रीकृष्ण उनके आश्रममें गये; उन्होंने मर्यादाकी रक्षाके लिये मुनिकी पूजा की, मुनिने भी उनका सत्कार किया। फिर बात होते-होते जब मुनिको यह पता लगा कि महाभारत-युद्ध हो गया और उसमें सब योद्धा मारे गये, तब वे श्रीकृष्णपर क्रोधित होकर बोले—‘श्रीकृष्ण! तुम चाहते तो युद्धको टाल सकते थे, तुम्हारी उपेक्षाके कारण ही इस महायुद्धमें सबका संहार हुआ; मुझे इस समय तुमपर बड़ा क्रोध आ रहा है, अत: मैं तुम्हें शाप दूँगा।’ श्रीकृष्णने कहा कि ‘मुनिवर! आप तपस्वी हैं, गुरुभक्त हैं; शान्ति रखिये, मेरे अध्यात्मतत्त्वको जानिये। याद रखिये, आप मेरा तिरस्कार नहीं कर सकते। आपका शाप मुझपर नहीं चलेगा; बल्कि आप शाप देंगे तो आपका तप ही नष्ट हो जायगा। आप जानते नहीं—लोग जिसको सत्-असत् , व्यक्त-अव्यक्त, क्षर-अक्षर कहते हैं, वह सब मेरा ही रूप है। सत् , असत् , सत्-असत् और सत्-असत् से परे जो कुछ है, मुझ सनातन देव-देवके सिवा और कुछ भी नहीं है।’ यह उत्तर सुनकर उत्तंक मुनिने श्रीकृष्णका स्तवन किया और उनसे ऐश्वर-रूप दिखलानेकी प्रार्थना की। भगवान् श्रीकृष्णने उनपर कृपा करके उन्हें अपना विराट्स्वरूप दिखलाया, जिसे देखकर मुनि आश्चर्यमें डूब गये। अस्तु,

भगवान‍्की लीलाओंमें ऐसे और भी बहुत-से उदाहरण एवं सिद्धान्तवाक्य हैं, जिनसे यह सिद्ध है कि उन्हें धर्माधर्मरूप अदृष्ट या कर्म-संस्कारवश जन्म ग्रहण नहीं करना पड़ता, वे अपनी इच्छासे ही अपने दिव्य विग्रहरूपमें प्रकट होते हैं। भगवान् शंकरजीने सतीदेवीसे कहा है—

मुनि धीर जोगी सिद्ध संतत

बिमल मन जेहि ध्यावहीं।

कहि नेति निगम पुरान आगम

जासु कीरति गावहीं॥

सोइ रामु ब्यापक ब्रह्म भुवन

निकाय पति माया धनी।

अवतरेउ अपने भगत हित

निजतंत्र नित रघुकुलमनी॥

अर्थात् ‘मुनि, धीर, योगी और सिद्ध पुरुष निर्मल मनसे निरन्तर जिनका ध्यान करते हैं; वेद, पुराण और शास्त्र नेति-नेति कहकर जिनकी कीर्ति गाते हैं, वे ही सर्वव्यापक, अखिल ब्रह्माण्डके स्वामी, मायापति, पूर्णब्रह्म, रघुकुलमणि श्रीराम अपने भक्तोंके हितके लिये अपनी इच्छासे अवतरित हुए हैं।’

भगवान‍्के अवतारका एक हेतु है जीवोंको सहज ही भवसागरसे पार उतार देना। भगवान् अवतार लेकर ऐसी लीलाएँ करते हैं, जिनको गा-गाकर, सुन-सुनकर लोग सहज ही भव-सागरसे तर जाते हैं। भगवान‍्की इस इच्छामें भी भक्तोंकी इच्छा ही कारण होती है।

सुद्ध सच्चिदानंदमय कंद भानुकुल केतु।

चरित करत नर अनुहरत संसृति सागर सेतु॥

अर्थात् शुद्ध (प्रकृतिजन्य त्रिगुणोंसे रहित, मायातीत दिव्य मंगलविग्रह) सच्चिदानन्दकन्दस्वरूप, सूर्यकुलके ध्वजारूप भगवान् श्रीरामचन्द्रजी मनुष्योंके सदृश ऐसे चरित्र करते हैं, जो संसाररूपी समुद्रके पार उतरनेके लिये पुलके समान हैं।

प्रश्न—अच्छा, यह बात तो समझमें आ गयी कि भगवान‍्के अवतारका प्रयोजन भक्तोंपर अनुग्रह करना और लोगोंको भव-सागरसे तारना ही है और वे किसी कर्मके वश भी नहीं हैं; परंतु दशरथजीके यहाँ उनका जन्म हुआ था और कुछ कालके पश्चात् उनका देहत्याग भी हो गया। इसलिये उनका जन्म-मरण तो होता ही है; फिर जन्म नहीं है, यह कैसे कहा जाता है?

उत्तर—भाई! उनका जन्म-मरण-सा दीख तो सकता है; परंतु वे नित्य, अजन्मा और अविनाशी हैं। इससे वास्तवमें हमलोगों-जैसा उनका जन्म-मरण नहीं होता। उनका तो आविर्भाव और अन्तर्धान होता है। जैसे कोई योगी अपनी इच्छासे जब चाहे तब अपने योगबलद्वारा प्रकट हो जाता है और मनमें आते ही छिप जाता है, वैसे ही भगवान् अपनी स्वरूपभूता योगमायाको लेकर स्वेच्छानुसार प्रकट हो जाते हैं और फिर अन्तर्हित हो जाते हैं। यही उनका ‘जन्म-मरण’ है। योगीका उदाहरण भी वस्तुत: भगवान‍्के साथ लागू नहीं होता। उनका आविर्भाव-तिरोधान अनन्यसाधारण ही होता है। जो स्वरूपसे ही अजन्मा और अविनाशी हैं, उनका जन्म और मरण हमारी बुद्धिसे बाहरकी बात है। इसीसे गीतामें श्रीभगवान‍्ने कहा है कि ‘मेरे दिव्य जन्म-कर्मको तत्त्वत: जाननेवाला देह छोड़नेपर पुनर्जन्म नहीं पाता, वह मुझको प्राप्त होता है।’ जिनके जन्मके रहस्यको जाननेमात्रसे जीवका जन्म होना छूट जाता है, उनका जन्म कितना विलक्षण होगा!

रही देह-ग्रहण और देह-पातकी बात, सो कहीं-कहीं तो वे ऐसी लीला करते हैं, जिससे मायादेहका ग्रहण-त्याग दीखता ही नहीं। वे जिस रूपमें प्रकट होते हैं, उसी रूपमें अन्तर्हित हो जाते हैं—जैसे रामायण और भागवतके वर्णनानुसार भगवान् दिव्य चतुर्भुज बालकके रूपमें प्रकट होते हैं, योनिद्वारसे उनका जन्म नहीं होता; और फिर वे समय आनेपर सदेह ही दिव्य लोकमें चले जाते हैं, यहाँ उनका कोई शरीर नहीं रह जाता। इसके अतिरिक्त कहीं-कहीं ऐसा भी होता है कि वे दिव्य देहसे तो अन्तर्धान हो जाते हैं, परंतु लोगोंको दिखानेके लिये माया-देहका निर्माण करके उसे छोड़ जाते हैं। महाभारत, पद्मपुराण आदिमें भगवान‍्की जिस देहके छोड़नेकी बात आती है, वह ऐसी ही देह है।

प्रश्न—जहाँ कहीं भी भगवान‍्के द्वारा देह छोड़े जानेका वर्णन मिलता है, वहाँ यह माननेमें क्या आपत्ति है कि उनका स्थूल देह तो पड़ा रह गया और वे हमलोगोंकी भाँति सूक्ष्म (लिंग) और कारण देहको लेकर अपने लोकमें चले गये?

उत्तर—ऐसा नहीं माना जा सकता; क्योंकि स्थूल, सूक्ष्म और कारण देह अविद्याकी भूमिकामें हैं। ये तीनों ही देह जड और मायिक हैं। अनादिकालसे कर्मबन्धनमें पड़े हुए तथा आत्म-विस्मृतिके कारण जड देहमें अभिमान रखनेवाले वासनायुक्त जीवोंको ही ये देह प्राप्त होते हैं। वास्तवमें तो जीवका स्वरूप भी सच्चिदानन्दमय ही है; परंतु जबतक उसका अनादिकालीन देहाभिमान और तज्जनित कर्म-बन्धन नहीं छूटता, तबतक उसे इसकी उपलब्धि नहीं होती और वह जन्म-मृत्युके चक्‍करमें पड़ा रहता है। परंतु भगवान् तो प्रकृतिसे नित्य परे हैं; उनमें न कोई देहाभिमान है और न कर्मबन्धन है। इसलिये भगवान‍्के देहमें न तीन शरीर हैं, न जड अन्त:करण है और न कोई अभिमान या कर्मका आधार ही है। भगवत्स्वरूप ही भगवद्देह है, वह नित्य निर्विकार चिदानन्दमय है। परंतु इस रहस्यको अधिकारी पुरुष ही जानते हैं—

चिदानंदमय देह तुम्हारी।

बिगत बिकार जान अधिकारी॥

हाँ, भगवान् चाहें तो आवश्यकतानुसार अभिमानकी रचना करके मायिक देहका भी निर्माण कर सकते हैं; परंतु उनका वह अभिमान और वह मायिक शरीर आगन्तुक ही होता है, लीलाका ही होता है। ऐसे ही मायिक देहका त्याग किया जाना कहा जा सकता है। स्वरूपभूत देहका त्याग नहीं हो सकता। वह तो नित्य है, उसमें त्याग-ग्रहण नहीं है; वह प्रकृतिके गुणोंसे अतीत, मन-इन्द्रियोंसे अतीत, प्राकृत देश-कालसे अतीत, विकाररहित, सच्चिदानन्दविग्रह, ‘माया-गुन-गोपार, निज-इच्छा-निर्मित’ है—

निज इच्छा निर्मित तनु माया गुन गो पार।

× × ×

सोइ सच्चिदानंद घन कर नर चरित उदार॥

इसीलिये भक्तों और शास्त्रोंने उसे चिद्घनविग्रह कहा है। वह न कभी बनता है और न कभी बिगड़ता है, सदा एकरस और विशुद्ध रहता है।

भगवद्देहके सम्बन्धमें यह कहना भी भूल है कि वह योगियोंके अनुभवमें आनेवाले दिव्य तन्मात्राओंसे बना होता है। योगी या योगिराज—कोई भी भगवद्देहके तत्त्वोंका अनुभव नहीं कर सकता, वास्तवमें वहाँ कोई भगवान‍्से भिन्न तत्त्व या तन्मात्रा है ही नहीं। ‘विशुद्ध सत्त्व’ कहना तो भगवान‍्के विशुद्ध स्वरूपको लक्ष्य करानेके लिये है। कुछ लोग भूलसे ‘विशुद्ध सत्त्व’ का अर्थ रज-तमसे रहित केवल सत्त्वगुण मान लेते हैं; परंतु ऐसा मानना ठीक नहीं, क्योंकि प्रकृतिजन्य त्रिगुणोंमें दोको छोड़कर केवल एक गुण किसी भी कालमें कहीं भी नहीं रहता। एक गुणके विशेष प्रकाशके समय दो गुण छिपे रह सकते हैं। उनकी क्रियाएँ प्रबलरूपसे प्रत्यक्ष नहीं हो सकतीं, परंतु उनका अभाव कदापि नहीं होता। ‘विशुद्ध सत्त्व’ तो भगवद्देहके लिये ही प्रयुक्त होनेवाला एक संकेत वाक्य है। सिद्ध योगियोंके सिद्ध देहके लिये भी कहीं-कहीं ‘विशुद्ध सत्त्व’ संज्ञा आती है; परंतु वह विशुद्ध देह और ‘विशुद्ध सत्त्व’ अपेक्षाकृत है। हमलोगोंकी अपेक्षा वह विशुद्ध है; किंतु वह प्रकृतिसे परे नहीं है, है वह मायिक ही। अवश्य ही उस देहमें भी अपेक्षाकृत दिव्यता होती है, वह सदा किशोर और रमणीय रह सकता है, उसमें बुढ़ापा और रोग नहीं होते, उच्च श्रेणीकी कायशुद्धिके कारण उसमेंसे दिव्य गन्ध निकल सकती है—यहाँतक कि उस देहके विण्मूत्रादिमें भी सुगन्ध पैदा हो जा सकती है और उसकी आयु भी बहुत अधिक हो सकती है। किसी-किसी सिद्ध योगीका शरीर कल्पके अन्ततक भी रह सकता है। परंतु स्मरण रहे कि यह सब कुछ होता है प्रकृतिके तत्त्वोंसे ही। प्रकृतिजन्य हो जानेसे ऐसा हो सकता है। कोई-कोई सिद्ध योगी देह-निर्माण भी कर लेते हैं। उनका वह ‘निर्माणकाय’ निर्माणचित्तका ही रूपान्तर होता है, वह देखनेमें देहके सदृश आकारवाला होनेपर भी वस्तुत: चित्तके अतिरिक्त और कुछ नहीं होता। योगियोंकी इच्छाशक्तिके प्रभावसे ही ऐसे योगदेहका निर्माण होता है, परंतु भगवान‍्का मायिक देह भी इससे अत्यन्त विलक्षण होता है। वह भगवान‍्के इच्छाधीन और विशुद्ध भागवती मायासे निर्मित होता है, अत: उसमें विलक्षण दिव्यता और सुन्दरता होती है। जब भगवान‍्के मायादेहकी ही इतनी महिमा है, तब भगवत्स्वरूप चिन्मय देहकी तो बात ही क्या है।

प्रश्न—तब तो भगवान् भी हमलोगोंकी भाँति ही देहधारी हुए़, चाहे उनका वह देह कितना ही दिव्य हो। परंतु जो देहधारी हैं, वे निराकार, निर्गुण, अव्यक्त और सर्वव्यापक कैसे हो सकते हैं?

उत्तर—यही तो रहस्यकी बात है। इसीलिये तो गोसाईंजी महाराज कहते हैं—

निर्गुन रूप सुलभ अति सगुन जान नहिं कोइ।

सुगम अगम नाना चरित सुनि मुनि मन भ्रम होइ॥

सुनो, भगवान‍्का वास्तविक स्वरूप तो तभी समझमें आ सकता है, जब भगवान् कृपा करके समझा देते हैं। उसके लिये बड़ी साधनाकी आवश्यकता है। भगवत्संगियोंका श्रद्धापूर्वक संग हो, ऐसे सत्संगमें भगवान‍्के रहस्यमय गुणानुवादका श्रवण हो और प्रेमपूर्वक भगवान‍्का यथार्थ भजन हो, तब संसारके विषयोंसे वैराग्य होकर शम-दमादिकी प्राप्ति होती है। तदनन्तर समरूपसे सर्वत्र व्याप्त भगवान‍्के निराकार ब्रह्मरूपका ज्ञान होता है। उसके बाद पराभक्ति—प्रेमाभक्तिकी प्राप्ति होती है और फिर श्रीभगवान‍्की कृपासे भगवान‍्के अचिन्त्य दिव्यानन्दमय परमस्वरूपका यथार्थ ज्ञान होता है।

भगवान‍्के यथार्थ रूपको कोई समझा नहीं सकता; वह वाणी, मन, बुद्धि—सभीसे परे है। परंतु इस बातको किसी अंशमें समझनेके लिये भगवच्चर्चाके नाते कुछ विचार करना मंगलकारी ही होगा। इसी खयालसे कुछ विचार करनेका साहस कर रहे हैं। भगवान् एक हैं, अद्वितीय हैं, सच्चिदानन्दघन हैं। उनके सिवा और कुछ है ही नहीं, यह सर्वथा सत्य है। वे भगवान् मायाके आकारवाले न होनेके कारण ‘निराकार’ और मायाके गुणोंवाले न होनेसे ‘निर्गुण’ कहलाते हैं। उनका ‘आकार’ और उनके ‘गुण’ उनके स्वरूप ही हैं। इसीलिये भगवान् इस प्रकार ‘नित्य निराकार’ और ‘नित्य निर्गुण’ होनेपर भी अपने स्वरूपभूत गुण और आकारसे युक्त होनेके कारण ‘नित्य साकार’ और ‘नित्य सगुण’ भी हैं। परंतु उनका यह रूप और गुणसमूह उनसे अभिन्न हैं।

उनका वह दिव्यातिदिव्य ‘साकार’ और ‘सगुण’ स्वरूप मायिक न होनेसे सर्वथा अतीन्द्रिय है, इसलिये वे ‘अव्यक्त’ हैं। इस मायिक जगत‍्में भी अनेकों अतीन्द्रिय पदार्थ हैं और साधना करते-करते जब इन्द्रियाँ निर्मल हो जाती हैं और लिंगदेहके किसी अंशतक शुद्ध होनेपर जब स्थूलदेहसे आंशिक रूपमें उसका पृथक्त्व हो जाता है, तब इन्द्रियाँ भी सूक्ष्मभावापन्न होकर अतीन्द्रिय पदार्थोंको किसी अंशतक देख सकती हैं। योग-साधना करते-करते इसमें जितनी-जितनी अग्रगति होती है, उतनी-उतनी ही अतीन्द्रिय पदार्थोंको प्रत्यक्ष करनेकी सामर्थ्य बढ़ती जाती है। परंतु जागतिक अतीन्द्रिय पदार्थोंको देखनेकी शक्ति प्राप्त हो जानेपर भी भगवान‍्के दर्शनका अधिकार नहीं मिल जाता। वह तो तभी मिलता है, जब भगवान् स्वयं कृपा करके दिव्यदृष्टि दे देते हैं।

प्रश्न—तब फिर बहुत-से भक्तोंको दर्शन होनेकी जो बात कही जाती है, उसका क्या तात्पर्य है? क्या वह सब मिथ्या कल्पनामात्र है? या उन सभीको भगवत्कृपासे दिव्य-दृष्टि प्राप्त हो गयी रहती है? अवतारकालमें तो असंख्य जीव भगवान‍्को देखते हैं, वे सभी क्या दिव्यदृष्टि प्राप्त होते हैं?

उत्तर—भक्तोंको दर्शन देनेकी बात मिथ्या कल्पनामात्र नहीं है। भगवान् दया करके भक्तोंको अपने दिव्य स्वरूपका दर्शन देते हैं और जिस समय दर्शन देते हैं, उस समय उतनी देरके लिये वहाँका सब कुछ ‘दिव्य’ कर देते हैं। भक्तकी दृष्टि भी दिव्य हो जाती है। अवश्य ही इसमें भी अधिकारिभेदसे तारतम्य रहता है।

अवतारकालमें भगवान् अपनेको योगमायासे समावृत रखते हैं। और जहाँ वे अपने इस योगमायाके परदेको हटाते हैं, वहीं उनके स्वरूपके यथार्थ दर्शन हो सकते हैं। वह परदा सब जगह समानरूपसे नहीं हटता। इस योगमायाके कारण ही भगवान‍्का देह लोगोंको मनुष्यका-सा मालूम होता है। इसीलिये वे भगवान‍्को पहचान नहीं सकते—

नाहं प्रकाश: सर्वस्य योगमायासमावृत:।

(गीता ७।२५)

अस्तु, अब तुम्हारी समझमें आ गया होगा कि भगवान‍्का दिव्यातिदिव्य सगुण साकार स्वरूप अव्यक्त कैसे है? रही सर्वव्यापककी बात, सो उसके लिये सूर्यका उदाहरण तुम्हारे सामने है। सूर्य एक ही है, परंतु वह एक ही समयमें सारे ब्रह्माण्डमें सबको दीखता है। जब प्रकृतिका एक पदार्थ—सूर्य इतना प्रभाव रख सकता है, तब सर्वशक्तिमान्, स्वभावसे ही सर्वव्यापी, एक ही भगवान् सब जगह प्रकाशित रहें, इसमें क्या आश्चर्य है। परंतु भगवान् तो लीलामय हैं न! वे एक ही साथ नित्य निर्विशेष और नित्य सविशेष होते हुए ही नित्य लीलामय हैं। उनकी लीलामें कभी विराम है ही नहीं। नित्य-लीलाके लिये उन एकके ही अनेकों लीलास्वरूप हैं और वे सभी सत्य तथा नित्य हैं। वे अनेक होनेपर भी नित्य एक ही हैं, यही उनकी भगवत्ताकी महिमा है। वे ही भगवान् सच्चिदानन्दघन परम अक्षर ब्रह्म हैं, वे ही ‘सर्वत्र व्यापक’ परमात्मा हैं। वे ही विराट् हैं (माता कौसल्याको अपने श्रीमुखमें और काकभुशुण्डिजीको अपने उदरमें श्रीरामजीने विराट् रूप दिखलाये ही हैं) और वे ही जीवात्मारूपसे जड जगत‍्के अंदर अनुस्यूत अध्यात्म हैं। वे ही अपरा प्रकृति और उसके परिणामसे उत्पन्न समस्त भूतरूप क्षर अधिभूत हैं। वे ही कर्म हैं, वे ही विराट् ब्रह्माण्डाभिमानी हिरण्यमय पुरुष अधिदैव हैं। इस हिरण्यमय पुरुषको ही सूत्रात्मा, हिरण्यगर्भ या ब्रह्मा कहते हैं। वे ही सब यज्ञोंके भोक्ता और प्रभु होनेसे अधियज्ञ हैं। वे ही अन्तर्यामी हैं, वे ही समग्र संसार हैं। वे ही अखिल-ब्रह्माण्डनायक, अज, अनादि, निर्विकार, सर्वशक्तिमान्, परम करुणामय, परम प्रेममय, परमैश्वर्यमय, परम ज्ञानमय, परम वैराग्यमय, परम यशोमय, परम श्रीमय और परम धर्ममय षडैश्वर्यपूर्ण भगवान् हैं। वे ही विभिन्न ब्रह्माण्डोंमें अपने अंशरूप विभिन्न त्रिमूर्तियोंके रूपमें विराजित हैं—

उपजहिं जासु अंस ते नाना।

संभु बिरंचि बिष्नु भगवाना॥

लोक लोक प्रति भिन्न बिधाता।

भिन्न बिष्नु सिव मनु दिसित्राता॥

उनका स्वरूप अकथ और अचिन्त्य है; फिर उनके सम्बन्धमें यह कहना ही भूलसे भरा हुआ है कि वे देहधारी होते हुए ही निर्गुण, निराकार, अव्यक्त और सर्वव्यापक कैसे हो सकते हैं।

उनका देह हमलोगों-जैसा विनाशी और जन्मशील देह नहीं है; वह नित्य है, शाश्वत है, श्रेष्ठ है, हानोपादानरहित है, प्रकृतिसे परे है और परमानन्द-संदोहरूप है। उसमें देह-देहीका पृथक्त्व नहीं है—देही ही देह है, देह ही देही है। वे नित्य परमधाममें रहते हुए ही व्यापक परमात्मारूपसे सर्वत्र व्याप्त हैं, ब्रह्मरूपसे अखण्ड स्थिर हैं, भगवान‍्‍‍रूपसे भक्तोंके सामने प्रकट हैं और जीवात्मारूपसे सर्वत्र कर्ता और भोक्ता बन रहे हैं। श्रीराम और श्रीकृष्णके रूपमें वे ही परात्पर भगवान् प्रकट हैं, जो सबके आधार हैं, सर्वरूप हैं, सर्वमय हैं और सबसे परे हैं। वे पूर्णब्रह्म, परात्पर ब्रह्म और साक्षात् ‘भगवान् स्वयम्’ हैं।

प्रश्न—‘भगवान् स्वयम्’ तो श्रीकृष्णके लिये भागवतमें कहा गया है और वहाँ अन्य सब अवतारोंको अंशकला बतलाया गया है। फिर श्रीरामको ‘स्वयं भगवान्’ कैसे कहा जाता है?

उत्तर—अनेकों ब्रह्माण्ड हैं और सभी ब्रह्माण्डोंमें कल्पभेदसे भगवान‍्के अवतार होते हैं। बहुत बार भगवान् विष्णु ही रामावतार और कृष्णावतार धारण करते हैं। जिस समय विष्णुभगवान‍्का श्रीराम या श्रीकृष्णरूपमें अवतार होता है, उस समय श्रीलक्ष्मीजी उनके साथ सीता या राधा—रुक्मिणीरूपमें अवतरित होती हैं; और जिस समय स्वयं परात्पर प्रभु अवतीर्ण होते हैं, उस समय उनकी साक्षात् स्वरूपाशक्ति अवतार धारण करती हैं। जब विष्णुभगवान‍्का रामावतार होता है और परात्पर ब्रह्म श्रीकृष्ण स्वयं अवतीर्ण होते हैं, तब श्रीकृष्णको साक्षात् ‘स्वयं भगवान्’ और अन्य अवतारोंको अंशकला कहा जाता है। और जब विष्णुभगवान‍्का कृष्णावतार होता है और परात्पर ब्रह्म श्रीराम स्वयं अवतीर्ण होते हैं, तब श्रीरामको साक्षात् ‘स्वयं भगवान्’ तथा अन्य अवतारोंको अंशकला कहा जाता है। परात्पर श्रीरामके लिये महारामायणमें कहा गया है—

भरण: पोषणाधार: शरण्य: सर्वव्यापक:।

करुण: षड्गुणै: पूर्णो रामस्तु भगवान् स्वयम्॥

परंतु इससे यह नहीं समझना चाहिये कि विष्णुभगवान‍्का अवतार अपूर्ण होता है। भगवान् अंशांशिभावसे व्यक्त होनेपर भी सर्वत्र पूर्ण हैं। लीलाभेदसे ही उनमें तारतम्य है, स्वरूपसे नहीं।

जिस प्रकार परात्पर समग्र ब्रह्म श्रीरामसे समस्त ब्रह्माण्डोंमें भिन्न-भिन्न शिव, विष्णु और ब्रह्मा उत्पन्न होते हैं, इसी प्रकार उनकी स्वरूपाशक्ति श्रीसीताजीसे अनेकों ब्रह्माण्डोंमें अनेकों उमा, रमा और ब्रह्माणी उत्पन्न होती हैं।

जासु अंस उपजहिं गुनखानी।

अगनित लच्छि उमा ब्रह्मानी॥

प्रश्न—भगवान् विष्णु और परात्पर ब्रह्ममें क्या अन्तर है और परात्पर ब्रह्म श्रेष्ठ क्यों माने गये हैं?

उत्तर—भगवान् विष्णु और परात्पर पुरुषोत्तम ब्रह्म (श्रीराम)-में तत्त्वत: कोई अन्तर नहीं है। लीलाभेदसे अन्तर है। त्रिदेवगत विष्णु भिन्न-भिन्न ब्रह्माण्डोंमें अलग-अलग लीलाकार्य करनेके लिये प्रकट हैं, जो केवल सत्त्वमय ‘पालन’ का कार्य ही करते हैं। ब्रह्मा, विष्णु, शंकर तीनों ही वस्तुत: परात्पर ब्रह्मकी ही अभिव्यक्तियाँ हैं—जो सत्त्व, रज और तमरूप पालन, सृजन और संहारका नियमित कार्य करनेके लिये हैं। इनके कार्य लीलाक्षेत्रके अनुसार सीमाबद्ध हैं, आंशिक हैं, इसीसे ये सभी अंशावतार माने जाते हैं। तत्त्वत: अभेद होनेपर भी अनन्तकोटि ब्रह्माण्डोंमें इनके अनन्तकोटि भिन्न-भिन्न स्वरूप हैं। इसीलिये काकभुशुण्डिजीने कहा है—

भिन्न भिन्न मैं दीख सबु अति बिचित्र हरिजान।

अगनित भुवन फिरेउँ प्रभु राम न देखेउँ आन॥

परात्पर ब्रह्म ही इन सब रूपोंमें प्रकट हैं और उन्हींकी शक्तिसे ये सब कार्य करते हैं और उतना ही कार्य करते हैं, जितनेके लिये विधान है। इसी बातको बतलानेके लिये श्रीरामरूप परात्पर पुरुषोत्तम ब्रह्मकी इस प्रकार महिमा गायी गयी है जो सर्वथा सत्य है—

जाकें बल बिरंचि हरि ईसा।

पालत सृजत हरत दससीसा॥

बिष्नु कोटि सम पालन कर्ता।

रुद्र कोटि सत सम संहर्ता॥

............................................।

बिधि सत कोटि सृष्टि निपुनाई॥

और इसीलिये परात्पर ब्रह्म श्रीरामसे द्रोह करनेवालेकी उनके अंशरूप सहस्रों ब्रह्मा, विष्णु और शंकर भी रक्षा नहीं कर सकते। कैसे करें? परात्पर ब्रह्मसे द्रोह करनेवाला स्वरूपत: उन त्रिदेवोंसे ही द्रोह करता है; क्योंकि वे उनसे सर्वथा अभिन्न हैं। और लीलाभेदसे परात्पर ब्रह्म उनके अंशी हैं। अंशीके द्रोहीको अंश कैसे शरण दे सकते हैं। इसीलिये कहा गया है—

संकर सहस बिष्नु अज तोही।

सकहिं न राखि राम कर द्रोही॥

अतएव परमार्थत: अभेद होनेपर भी लीलाकी दृष्टिसे त्रिदेवोंकी अपेक्षा परात्पर ब्रह्म श्रेष्ठ हैं ही, और इसी दृष्टिसे ऐसा कहा भी जाता है।

एक बात और है। वेदान्तमें कहा गया है कि व्यष्टिभावसे स्थूल, सूक्ष्म और कारण देहके अभिमानी जीवको वैश्वानर, तैजस और प्राज्ञ कहते हैं तथा समष्टिभावके अभिमानीको विश्व, हिरण्यगर्भ और ईश्वर। ये समष्टिके अभिमानी ही त्रिदेव हैं। ये सभी त्रिगुणमें हैं। कार्यकी दृष्टिसे ये त्रिदेव अवश्य ही ईश्वर कहे जाते हैं, परंतु वैसे प्रकृतिसे परे नहीं हैं। परात्पर प्रभु ‘सर्वलोकमहेश्वर’ हैं—‘तमीश्वराणां परमं महेश्वरम्’ ये तीनों गुणोंसे अतीत, व्यष्टि-समष्टि-विभागरहित और नित्य ‘नित्य’ हैं। इस दृष्टिसे भी परात्पर ब्रह्म श्रीराम ब्रह्मा, विष्णु और महेश—इन त्रिमूर्तियोंसे परे और श्रेष्ठ माने गये हैं।

प्रश्न—श्रीभगवान‍्के सारे अंग क्या हमलोगों-जैसे ही होते हैं?

उत्तर—हमलोगोंके अंगोंसे उनकी कोई तुलना ही नहीं हो सकती। उनका आकार-प्रकार सभी अत्यन्त विलक्षण और परमाश्चर्य तथा आनन्ददायक होता है—

गिरा अनयन नयन बिनु बानी। .....................॥

अत: कोई उन्हें कैसे बताये! उनका वह भगवत्स्वरूप विग्रह माधुर्यमय है, वह ‘आनन्दमात्रकरपादमुखोदरादि’ और ‘आनन्दैकरसमूर्ति’ है। इसीके साथ उनके परमदिव्य प्रेम, दया, प्रभुता, भक्तवत्सलता आदि असंख्य गुण मानो मूर्तिमान् हुए उनके अंग-अंगसे प्रकाशित होते रहते हैं। उस दिव्य स्वरूपके करोड़वें अंशका भी वर्णन कोई नहीं कर सकता। वर्णन तो दूर, कोई अनुमान भी नहीं कर सकता। योगमायासे अनावृत जो उनका स्वरूप है, उसकी जरा-सी क्षणिक झाँकी भी ब्रह्मानन्दको बहा देती है, कैवल्य-सुखको फीका कर देती है। श्रीजनकजीपर कृपा करके भगवान् श्रीरामने क्षणकालके लिये योगमायाका परदा दूर किया। ब्रह्मज्ञानियोंके गुरु श्रीजनकजी देखकर मुग्ध हो गये, उनकी आँखोंमें आनन्दाश्रु भर आये, वाणी गद्‍गद हो गयी, वे अपनेको सँभाल न सके और विश्वामित्रसे पूछने लगे—

कहहु नाथ सुंदर दोउ बालक।

मुनिकुल तिलक कि नृपकुलपालक॥

ब्रह्म जो निगम नेति कहि गावा।

उभय बेष धरि की सोइ आवा॥

सहज बिरागरूप मनु मोरा।

थकित होत जिमि चंद चकोरा॥

ताते प्रभु पूछउँ सतिभाऊ।

कहहु नाथ जनि करहु दुराऊ॥

इन्हहि बिलोकत अति अनुरागा।

बरबस ब्रह्मसुखहि मन त्यागा॥

जनकजीका ब्रह्मानन्द बरबस हट गया और वे सच्चिदानन्दघन सगुण विग्रहके दर्शनसे परमानन्दमें मग्न हो गये। जब श्रीरामजी जनकपुरसे विदा होने लगे तब श्रीजनकजी एकान्तमें श्रीरामजीसे मिले और बरबस भक्तके भावसे हाथ जोड़कर प्रेमपूर्वक वचन बोले—

राम करौं केहि भाँति प्रसंसा।

मुनि महेस मन मानस हंसा॥

करहिं जोग जोगी जेहि लागी।

कोहु मोहु ममता मदु त्यागी॥

ब्यापकु ब्रह्मु अलखु अबिनासी।

चिदानंदु निरगुन गुनरासी॥

मन समेत जेहि जान न बानी।

तरकि न सकहिं सकल अनुमानी॥

महिमा निगमु नेति कहि कहई।

जो तिहुँ काल एकरस रहई॥

नयन बिषय मो कहुँ भयउ सो समस्त सुख मूल।

सबइ लाभु जग जीव कहँ भएँ ईसु अनुकूल॥

इससे पता लगता है कि श्रीरामका सौन्दर्य-तत्त्व और उनका स्वरूप-तत्त्व कितना विलक्षण और अलौकिक है!

पर इसका यह अर्थ नहीं है कि उनके हस्त-पादादि अंग नहीं हैं, सभी हैं, परंतु हैं चिन्मय और अत्यन्त अलौकिक। योगमायासे समावृत होनेके कारण लोग उन्हें मनुष्यके-से देखते हैं, यही उनका ‘मायामानुषरूप’ है। दिवालीपर चीनीके हाथी-घोड़े बनाये जाते हैं, उनका हाथी-घोड़ेका-सा आकार दीखता है। यह आकार असत्य नहीं है, यह तो सत्य ही है; परंतु उनको रक्त-मांस और हड्डी-चमड़ीवाला समझना असत्य है। इसी प्रकार भगवान‍्के योगमायासमावृत रूपमें जो हाथ, पैर आदि अंग दीखते हैं, वे असत्य नहीं हैं; क्योंकि वे तो भगवान‍्के हैं ही। अवश्य ही वे हैं बहुत विलक्षण, योगमायाके परदेसे ठीक नहीं दीखते—मनुष्योंके-से दीखते हैं। परंतु उनको मनुष्योंकी भाँति स्थूल अस्थि-चर्ममय, स्थूल-सूक्ष्म-कारण-देहविशिष्ट मान लेना असत्य है। जैसे चीनीके हाथी-घोड़ोंमें सर्वत्र चीनी-ही-चीनी है, वैसे ही भगवान‍्का स्वरूप सर्वथा, सर्वदा और सर्वत्र चिदानन्दमय ही, भगवत्स्वरूप ही है।

‘योगमाया-समावृतमानुषरूप’ को भी सगुणरूप कहते हैं। अवश्य ही यह सगुणरूप उनके उस निर्गुण-सगुणरूपसे सर्वथा भिन्न और केवल लीलाके लिये ही लोगोंको दीखता है। इसीलिये इसको ‘मायिक’ भी कहते हैं। यही अगुणका भक्तोंके प्रेमवश सगुण होना है—‘भगत प्रेमबस सगुन सो होई।’ नहीं तो सगुण होना, न होना कुछ नहीं कहा जा सकता। क्योंकि उनका निर्गुण-सगुणरूप अर्थात् दिव्य स्वरूपभूत गुणोंसे युक्त विग्रह तो नित्य है। होना उसीका होता है, जो पहले नहीं होता। दिव्य भगवद्देह तो स्वरूपत: नित्य है।

प्रश्न—अच्छा, देह कितने प्रकारके होते हैं?

उत्तर—देह प्रधानतया दो प्रकारके होते हैं—प्राकृत और अप्राकृत। प्रकृतिके राज्यमें जितने प्रकारके देह हैं, वे सब प्राकृत हैं और प्रकृतिसे परे दिव्य चिन्मय राज्यमें जो देह हैं, वे अप्राकृत हैं। स्थूल, सूक्ष्म और कारण—इन तीन भेदोंसे प्राकृत देहका निर्माण हुआ है। जबतक ‘कारण’ वर्तमान है, तबतक इस प्राकृत देहसे छुटकारा नहीं मिल सकता। इस त्रिविध-देहविशिष्ट प्राकृत देहसे छूटकर केवल आत्मरूपमें ही स्थित हो जाने अथवा दिव्य राज्यमें भगवान‍्के चिन्मय पार्षदादि स्वरूपोंकी प्राप्ति होनेको ही मुक्ति कहते हैं। मैथुनी-अमैथुनी, योनिज-अयोनिज—सभी प्राकृत शरीर वस्तुत: योनि और विन्दुके संयोगसे ही बनते हैं। इनमें कई स्तर हैं। अधोगामी विन्दुसे उत्पन्न होनेवाला शरीर अधम है और ऊर्ध्वगामीसे होनेवाला उत्तम। कामप्रेरित मैथुनसे उत्पन्न शरीर सबसे निकृष्ट है, किसी प्रसंगविशेषपर ऊर्ध्वरेता पुरुषके संकल्पसे विन्दुके अधोगामी होनेपर उससे उत्पन्न होनेवाला शरीर उससे उत्तम द्वितीय श्रेणीका है, ऊर्ध्वरेता पुरुषके संकल्पमात्रसे केवल नारीशरीरके मस्तक, कण्ठ, कर्ण, हृदय या नाभि आदिके स्पर्शमात्रसे उत्पन्न होनेवाला देह तीसरी श्रेणीका है। इसमें नीचेके अंगोंकी अपेक्षा ऊपरके अंगोंके स्पर्शसे होनेवाला अपेक्षाकृत उत्तम है। बिना स्पर्शके केवल दृष्टिद्वारा होनेवाला उससे उत्तम; और बिना देखे संकल्पमात्रसे होनेवाला उससे भी उत्तम है। पहला और दूसरा मैथुनी है और शेष तीनों अमैथुनी, इससे ये देह पहले दोनोंकी अपेक्षा शुद्ध हैं। स्त्री-पिण्ड या पुरुष-पिण्डके बिना भी देह उत्पन्न होते हैं। परंतु इनमें भी सूक्ष्म योनि और विन्दुका सम्बन्ध रहता ही है। प्रेतादि लोकोंके वायुप्रधान और देवलोकादिके तेज:प्रधान आतिवाहिक देह भी प्राकृतिक ही हैं। योगियोंके ‘निर्माणशरीर’ बहुत शुद्ध हैं, परंतु वे भी प्रकृतिसे परे नहीं हैं। अप्राकृत देह इससे अत्यन्त विलक्षण होता है। और भगवद्देह तो भगवत्स्वरूप ही है तथा वह सर्वथा अनिर्वचनीय है देह-तत्त्व बहुत ही समझनेका विषय है, इसके लिये बहुत समय चाहिये। दूसरे किसी समय इसपर विचार हो सकता है।

प्रश्न—अच्छी बात है, देह-तत्त्वकी बात फिर कभी पूछी जा सकती है। अब यह बताइये कि रामायणमें जगह-जगह श्रीरामको ब्रह्म बतलाया गया है, उन ब्रह्मका क्या स्वरूप है?

उत्तर—यह बार-बार कहा जा चुका है कि वस्तुत: ब्रह्म और राम एक ही तत्त्व हैं। परंतु रामायणमें ‘ब्रह्म’ शब्द प्राय: परात्पर समग्र ब्रह्मके लिये ही आया है, वेदान्तियोंके निर्गुण ब्रह्मके लिये नहीं; क्योंकि वह तो गुणोंसे सर्वथा रहित है और वह भगवान‍्की ही एक अभिव्यक्तिमात्र है। उसका अवतार नहीं हो सकता। अवतार तो सगुण ब्रह्मका ही होता है, चाहे वह अवतारी समग्र हो या समग्रका कोई अंश हो, यानी चाहे साक्षात् परात्पर भगवान् हों या उनके अंश विष्णु-शंकरादि हों। रामचरितमानसमें ब्रह्मका जो रूप बतलाया गया है, वह केवल निर्गुण ही नहीं, गुणसागर भी है; तथा इसी रूपमें जगह-जगह श्रीरामकी स्तुति की गयी है—

जय सगुन निर्गुन रूप रूप अनूप भूप सिरोमने।

........................................................॥

जय निर्गुन जय जय गुन सागर।

इससे सिद्ध है कि रामायणके अवतारी ब्रह्म परात्पर भगवान् हैं और वे दाशरथि श्रीरामचन्द्र ही हैं। वे ही परात्पर राम अपने स्वरूपको छिपाकर ‘मायामानुषरूप’ में लीला करते हैं—

सोइ सच्चिदानंद घन रामा।

अज बिग्यान रूप बल धामा॥

ब्यापक ब्याप्य अखंड अनंता।

अखिल अमोघसक्ति भगवंता॥

अगुन अदभ्र गिरा गोतीता।

सबदरसी अनवद्य अजीता॥

निर्मम निराकार निरमोहा।

नित्य निरंजन सुख संदोहा॥

प्रकृति पार प्रभु सब उर बासी।

ब्रह्म निरीह बिरज अबिनासी॥

भगत हेतु भगवान प्रभु राम धरेउ तनु भूप।

किए चरित पावन परम प्राकृत नर अनुरूप॥

जथा अनेक बेष धरि नृत्य करइ नट कोइ।

सोइ सोइ भाव देखावइ आपुन होइ न सोइ॥

उपर्युक्त वर्णनसे भलीभाँति जाना जा सकता है कि श्रीराम साक्षात् परब्रह्म हैं। यहाँ यह कहना असंगत न होगा कि ब्रह्मसूत्रके ब्रह्म, गीताके समग्र ब्रह्म—‘पुरुषोत्तम’, भागवतके ‘स्वयं भगवान्’ और श्रीरामचरितमानसके ‘श्रीराम’ एक ही तत्त्व हैं।

प्रश्न—पहले आप कह चुके हैं कि सिद्ध योगियोंके विशुद्ध देहमें जरा-व्याधि आदि नहीं होती, तब भगवान‍्के शरीरमें भी नहीं होनी चाहिये। फिर आजकल जो लोग भगवान‍्के कुछ चित्रोंमें दाढ़ी-मूँछ बना देते हैं, वे क्या भूल करते हैं?

उत्तर—निश्चय ही, भूल तो करते ही हैं। भगवान‍्का देह नित्य निरामय, नित्य नवकिशोर और नित्य नवीन रहता है। अवतारकालमें लीलाके हेतुसे सोलह वर्षकी अवस्थातक तो वह बढ़ता प्रतीत होता है—‘प्रतीत होता है’ इसीलिये कहा जाता है कि वास्तवमें वह बढ़ता नहीं। योगमायाके परदेके बाहर उसका बढ़ना दिखायी देता है। सोलह वर्षकी अवस्थाके बाद बाहरसे भी बढ़ता दिखायी नहीं देता। वह नित्य नवकिशोर ही रहता है। दाढ़ी-मूछें उस स्वरूपके नहीं होतीं। उनके सिरकी घुँघराली काली अलकावली सदा एक-सी शोभासम्पन्न रहती है, उनकी मुखश्री नित्य नवीन अपूर्व छविमयी दिखायी देती है।

प्रश्न—जिन लोगोंको भगवान‍्के दर्शन होते हैं, उन सबको क्या योगमायासे अनावृतरूपके ही दर्शन होते हैं?

उत्तर—नहीं। बहुत ही थोड़े पुरुष ऐसे भाग्यवान् होते हैं, जिनको अनावृतरूपके दर्शन होते हैं। वह रूप तो शिव-ब्रह्मादि तथा मुनीश्वरादिके लिये भी परम दुर्लभ है। परंतु योगमायासे समावृतरूपके दर्शन भी बड़े ही सौभाग्यसे होते हैं, वह भी कोई मामूली बात नहीं है।

प्रश्न—विष्णु, शिव, ब्रह्मादिका स्वरूप क्या भगवान‍्से भिन्न है?

उत्तर—यह पहले कह ही चुके हैं कि वह तत्त्वत: भगवान‍्से अभिन्न है और लीलाके लिये भिन्न है। शिव और विष्णु विभिन्न ब्रह्माण्डोंमें भगवान‍्के अंशावताररूपमें भी हैं और मूलत: महाशिव तथा महाविष्णुके रूपमें सर्वथा सर्वदा अभिन्न भी। ब्रह्माका अधिकार जीवको भी प्राप्त हो सकता है और ब्रह्मा भगवान‍्के अंशावतार भी होते हैं। यह स्मरण रखना चाहिये कि भगवान् एक ही हैं और वे सब रूपोंसे सर्वथा विलक्षण हैं। सच्चे भावसे किसी भी स्वरूपकी उपासना करनेवाला साधक अन्तमें उसी अचिन्त्य परस्वरूपको प्राप्त होता है।

यहाँ श्रीरामके स्वरूपके सम्बन्धमें श्रीरामचरितमानससे कुछ वचन उद्‍धृत किये जाते हैं। इनसे श्रीरामके स्वरूपका बहुत कुछ पता लग सकता है। श्रीशिवजी कहते हैं—

राम सच्चिदानंद दिनेसा।

नहिं तहँ मोह निसा लवलेसा॥

सहज प्रकासरूप भगवाना।

नहिं तहँ पुनि बिग्यान बिहाना॥

हरष बिषाद ग्यान अग्याना।

जीव धर्म अहमिति अभिमाना॥

राम ब्रह्म ब्यापक जग जाना।

परमानंद परेस पुराना॥

पुरुष प्रसिद्ध प्रकास निधि प्रगट परावर नाथ।

रघुकुलमनि मम स्वामि सोइ कहि सिवँ नायउ माथ॥

‘श्रीरामचन्द्रजी सच्चिदानन्दस्वरूप सूर्य हैं। वहाँ मोहरूपी रात्रिका लवलेश भी नहीं है। वे स्वभावसे ही प्रकाशरूप और षडैश्वर्ययुक्त भगवान् हैं, वहाँ तो विज्ञानरूपी प्रात:काल भी नहीं होता। (अज्ञानरूपी रात्रि हो तब तो विज्ञानरूपी प्रात:काल हो; भगवान् तो नित्य ज्ञानस्वरूप ठहरे।) हर्ष, शोक, ज्ञान, अज्ञान, अहंता और अभिमान—ये सब जीवके धर्म हैं। श्रीरामचन्द्रजी तो व्यापक ब्रह्म, परमानन्दस्वरूप, परात्पर प्रभु और पुराणपुरुष हैं—इस बातको सारा जगत् जानता है। जो पुराण-पुरुष प्रसिद्ध हैं, प्रकाशके भंडार हैं, सब रूपोंमें प्रकट हैं, जीव, माया और जगत् —सबके स्वामी हैं, वे ही रघुकुलमणि श्रीरामचन्द्रजी मेरे स्वामी हैं।’ यों कहकर शिवजीने उनको मस्तक नवाया।

मनु महाराज अभिलाषा करते हैं—

उर अभिलाष निरंतर होई।

देखिअ नयन परम प्रभु सोई॥

अगुन अखंड अनंत अनादी।

जेहि चिंतहिं परमारथबादी॥

नेति नेति जेहि बेद निरूपा।

निजानंद निरुपाधि अनूपा॥

संभु बिरंचि बिष्नु भगवाना।

उपजहिं जासु अंस तें नाना॥

ऐसेउ प्रभु सेवक बस अहई।

भगत हेतु लीलातनु गहई॥

‘हृदयमें निरन्तर यही अभिलाषा हुआ करती कि हम कैसे उन परम प्रभुको आँखोंसे देखें। जो निर्गुण, अखण्ड, अनन्त और अनादि हैं और परमार्थवादी (ब्रह्मज्ञानी, तत्त्ववेत्ता) लोग जिनका चिन्तन किया करते हैं, जिन्हें वेद ‘नेति-नेति’ (यह भी नहीं, यह भी नहीं) कहकर निरूपण करते हैं, जो आनन्दस्वरूप, उपाधिरहित और अनुपम हैं, जिनके अंशसे अनेकों शिव, ब्रह्मा और विष्णुभगवान् प्रकट होते हैं, ऐसे महान् प्रभु भी सेवकके वशमें हैं और भक्तके लिये दिव्य लीलाशरीर धारण करते हैं।’

श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—

श्रुति सेतु पालक राम तुम्ह

जगदीस माया जानकी।

जो सृजति जगु पालति हरति

रुख पाइ कृपानिधान की॥

जो सहससीसु अहीसु महिधरु

लखनु सचराचर धनी।

सुरकाज धरि नरराज तनु चले

दलन खल निसिचर अनी॥

राम सरूप तुम्हार बचन अगोचर बुद्धिपर।

अबिगत अकथ अपार नेति नेति नित निगम कह॥

जगु पेखन तुम्ह देखनिहारे।

बिधि हरि संभु नचावनिहारे॥

तेउ न जानहिं मरमु तुम्हारा।

औरु तुम्हहि को जाननिहारा॥

सोइ जानइ जेहि देहु जनाई।

जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई॥

तुम्हरिहि कृपाँ तुम्हहि रघुनंदन।

जानहिं भगत भगत उर चंदन॥

‘हे राम! आप वेदकी मर्यादाके रक्षक जगदीश्वर हैं और जानकीजी आपकी स्वरूपभूता माया हैं, जो कृपाके भंडार आपकी रुख पाकर जगत‍्का सृजन, पालन और संहार करती हैं। जो हजार मस्तकवाले सर्पोंके स्वामी और पृथ्वीको अपने सिरपर धारण करनेवाले हैं, वही चराचरके स्वामी शेषजी लक्ष्मण हैं। देवताओंके कार्यके लिये आप राजाका शरीर धारण करके दुष्ट राक्षसोंकी सेनाका नाश करनेके लिये चले हैं। राम! आपका स्वरूप वाणीके अगोचर, बुद्धिसे परे, अज्ञात, अकथनीय और अपार है। वेद निरन्तर उसका ‘नेति-नेति’ कहकर वर्णन करते हैं। राम! जगत् दृश्य है, आप उसको देखनेवाले हैं। आप [अपने अंशस्वरूप] ब्रह्मा, विष्णु और शंकरको भी नचानेवाले हैं। जब वे भी आपके मर्मको नहीं जानते, तब और कौन आपको जाननेवाला है? वही आपको जानता है, जिसे आप जना देते हैं और जानते ही वह आपका ही स्वरूप बन जाता है। हे रघुनन्दन! हे भक्तोंके हृदयको शीतल करनेवाले चन्दन! आपकी ही कृपासे भक्त आपको जान पाते हैं।’

प्रश्न—यदि श्रीराम परात्पर ब्रह्म हैं और श्रीशिवजी उनसे अभिन्न हैं तो वे शिवजीकी पूजा कैसे करते हैं? रामचरितमानसके अनुसार तो वे नित्य पार्थिव-पूजन करते थे और उन्होंने श्रीरामेश्वरकी स्थापना भी की थी।

उत्तर—यह कहा जा चुका है कि तत्त्वत: श्रीराम और श्रीशंकर एक ही हैं। श्रीराम और श्रीशिव ही क्यों—यह सारा चराचर जगत् भी वास्तवमें रामसे अभिन्न है। इसीसे तो रामायणमें ‘सीय राममय सब जग जानी। करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी॥’ और ‘मैं सेवक सचराचर रूप स्वामि भगवंत’ यह स्पष्ट कहा गया है और श्रीशंकरजीको तो रामायणमें श्रीरामजीके ‘सेवक, स्वामी, सखा’ तीनों बतलाया गया है। रामायणके अनुसार वे श्रीरामजीके अनन्य भक्त हैं, ऐसे भक्त, जो सीताका वेष बना लेनेपर सतीतकका त्याग कर देते हैं, और स्वामी हैं—ऐसे स्वामी, जिनकी पूजा रामजी नित्य करते हैं, और सखा भी हैं, क्योंकि शिवजीकी बारातमें भगवान् उनसे नाना प्रकारके सखोचित विनोद करते हैं। और वास्तवमें भेद इनके लीलारूपोंमें ही है, स्वरूपत: कोई भेद नहीं है। शैवोंके शिव, शाक्तोंकी शक्ति तथा वैष्णवोंके महाविष्णु, श्रीराम और श्रीकृष्ण—सब एक ही हैं। इस तरहकी शंका नहीं करनी चाहिये। सच्चा रामोपासक वैष्णव सम्पूर्ण चराचरमें अपने परम इष्टदेव श्रीरामको ही देखता है। वह यही समझता है कि मेरे ही राम कहीं शिवरूपमें, कहीं शक्तिरूपमें, कहीं निर्गुण ब्रह्मरूपमें पूजित होते हैं। यहाँतक कि मुसलमानोंके अल्लाह और ईसाइयोंके परम पिता परमेश्वर भी हमारे राम ही बने हुए हैं। रामके अतिरिक्त और कोई परमेश्वर है ही नहीं। श्रीराम ही श्रीशिवरूपसे श्रीरामकी पूजा करते हैं और श्रीराम ही श्रीरामरूपसे अपने श्रीशिवरूपकी पूजा करते हैं। ये सब लीलाएँ भक्तोंके कल्याणके लिये ही होती हैं।

भूमौ जले नभसि देवनरासुरेषु

भूतेषु देवि सकलेषु चराचरेषु।

पश्यन्ति शुद्धमनसा खलु रामरूपं

रामस्य वै भुवितले समुपासकाश्च॥

उमा जे राम चरन रत बिगत काम मद क्रोध।

निज प्रभुमय देखहिं जगत केहि सन करहिं बिरोध॥

प्रश्न—भगवान् श्रीरामके स्वरूपकी तो कुछ कल्पना हुई; अब यह बताइये कि उनको प्रसन्न करनेके साधन कौन-से हैं।

उत्तर—इस प्रश्नका उत्तर श्रीरामचरितमानसमें जगह-जगह दिया गया है। कुछ स्थलोंके वचन नीचे उद्‍धृत किये जाते हैं। माता पार्वती श्रीशिवजीसे कहती हैं—

नर सहस्र महँ सुनहु पुरारी।

कोउ एक होइ धर्म ब्रतधारी॥

धर्मसील कोटिक महँ कोई।

बिषय बिमुख बिराग रत होई॥

कोटि बिरक्त मध्य श्रुति कहई।

सम्यक ग्यान सकृत कोउ लहई॥

ग्यानवंत कोटिक महँ कोऊ।

जीवनमुक्त सकृत जग सोऊ॥

तिन्ह सहस्र महुँ सब सुख खानी।

दुर्लभ ब्रह्म लीन बिग्यानी॥

धर्मसील बिरक्त अरु ग्यानी।

जीवनमुक्त ब्रह्मपर प्रानी॥

सब ते सो दुर्लभ सुरराया।

राम भगति रत गत मद माया॥

अर्थात् ‘हे त्रिपुरारि! सुनिये, हजारों मनुष्योंमें कोई एक धर्माचरण-व्रत धारण करनेवाला होता है और करोड़ों धर्मात्माओंमें कोई एक विषयसे विमुख (विषयोंका त्यागी) तथा वैराग्यपरायण होता है। श्रुति कहती है कि करोड़ों विरक्तोंमें कोई एक सम्यक् (यथार्थ) ज्ञानको प्राप्त करता है और करोड़ों ज्ञानियोंमें कोई एक ही जीवन्मुक्त होता है। जगत‍्में कोई बिरला ही ऐसा (जीवन्मुक्त) होगा। हजारों जीवन्मुक्तोंमें भी सब सुखोंकी खान, ब्रह्ममें लीन विज्ञानवान् पुरुष और भी दुर्लभ है। हे देवाधिदेव महादेवजी! धर्मात्मा, वैराग्यवान्, ज्ञानी, जीवन्मुक्त और ब्रह्मलीन—इन सबमें भी वह प्राणी अत्यन्त दुर्लभ है, जो मद-मायारहित होकर रामभक्तिके परायण हो।’

काकभुशुण्डिजी कहते हैं—

जे असि भगति जानि परिहरहीं।

केवल ग्यान हेतु श्रम करहीं॥

ते जड़ कामधेनु गृहँ त्यागी।

खोजत आकु फिरहिं पय लागी॥

सुनु खगेस हरि भगति बिहाई।

जे सुख चाहहिं आन उपाई॥

ते सठ महासिंधु बिनु तरनी।

पैरि पार चाहहिं जड़ करनी॥

‘जो भक्तिकी ऐसी महिमा जानकर भी उसे छोड़ देते और केवल ज्ञानके लिये श्रम (साधन) करते हैं, वे मूर्ख घरपर खड़ी हुई कामधेनुको छोड़कर दूधके लिये मदारके पेड़को खोजते फिरते हैं। हे पक्षिराज! सुनिये—जो लोग श्रीहरिकी भक्तिको छोड़कर दूसरे उपायोंसे सुख चाहते हैं, वे मूर्ख और जड करनीवाले (अभागे) बिना जहाजके ही तैरकर महासमुद्रके पार जाना चाहते हैं।’

ज्ञानकी कठिनताका उल्लेख ज्ञान-दीपक-प्रकरणमें करके फिर काकभुशुण्डिजी कहते हैं—

राम भगति चिंतामनि सुंदर।

बसइ गरुड़ जाके उर अंतर॥

परम प्रकास रूप दिन राती।

नहिं कछु चहिअ दिआ घृत बाती॥

मोह दरिद्र निकट नहिं आवा।

लोभ बात नहिं ताहि बुझावा॥

प्रबल अबिद्या तम मिटि जाई।

हारहिं सकल सलभ समुदाई॥

खल कामादि निकट नहिं जाहीं।

बसइ भगति जाके उर माहीं॥

गरल सुधासम अरि हित होई।

तेहि मनि बिनु सुख पाव न कोई॥

ब्यापहिं मानस रोग न भारी।

जिन्ह के बस सब जीव दुखारी॥

राम भगति मनि उर बस जाकें।

दुख लवलेस न सपनेहुँ ताकें॥

चतुर सिरोमनि तेइ जग माहीं।

जे मनि लागि सुजतन कराहीं॥

‘श्रीरामजीकी भक्ति सुन्दर चिन्तामणि है। हे गरुड़जी! यह जिसके हृदयमें बसती है, वह दिन-रात अपने-आप ही परम प्रकाश-रूप रहता है; उसको दीपक, घी और बत्ती कुछ भी नहीं चाहिये। इस प्रकार मणिका एक तो स्वाभाविक प्रकाश रहता है। फिर मोहरूपी दरिद्रता समीप नहीं आती (क्योंकि मणि स्वयं धनरूप है); और तीसरे लोभरूपी हवा उस मणिमय दीपको नहीं बुझाती, [क्योंकि मणि स्वयं प्रकाशरूप है, वह किसी दूसरेकी सहायतासे नहीं प्रकाश करती] उसके प्रकाशसे अविद्याका प्रबल अन्धकार मिट जाता है। मदादि पतंगोंका सारा समूह हार जाता है। जिसके हृदयमें भक्ति बसती है, काम, क्रोध और लोभ आदि उसके पास भी नहीं जाते। उसके लिये विष अमृतके समान और शत्रु मित्र हो जाता है। उस मणिके बिना कोई सुख नहीं पाता। बड़े-बड़े मानस रोग, जिनके वश होकर सब जीव दु:खी हो रहे हैं, उसको नहीं व्यापते। श्रीरामभक्तिरूपी मणि जिसके हृदयमें बसती है, उसे स्वप्नमें भी लेशमात्र दु:ख नहीं होता। जगत‍्में वे ही मनुष्य चतुरोंके शिरोमणि हैं, जो उस भक्तिमणिके लिये भलीभाँति यत्न करते हैं।’

कलिजुग केवल हरि गुन गाहा।

गावत नर पावहिं भव थाहा॥

कलिजुग जोग न जग्य न ग्याना।

एक अधार राम गुन गाना॥

सब भरोस तजि जो भज रामहि।

प्रेम समेत गाव गुन ग्रामहि॥

सोइ भव तर कछु संसय नाहीं।

नाम प्रताप प्रगट कलि माहीं॥

‘कलियुगमें तो केवल श्रीहरिकी गुणगाथाओंका गान करनेसे ही मनुष्य भव-सागरकी थाह पा जाते हैं। कलियुगमें न तो योग और यज्ञ है और न ज्ञान ही है। श्रीरामजीका गुणगान ही एकमात्र आधार है। अतएव सारे भरोसे त्यागकर जो श्रीरामजीको भजता है और प्रेमसहित उनके गुणसमूहोंको गाता है, वही भव-सागरसे तर जाता है—इसमें कुछ भी संदेह नहीं। नामका प्रताप कलियुगमें प्रत्यक्ष है।’

अन्तमें भगवान् श्रीरामका ‘निज सिद्धान्त’ सुनो—

अब सुनु परम बिमल मम बानी।

सत्य सुगम निगमादि बखानी॥

निज सिद्धांत सुनावउँ तोही।

सुनु मन धरु सब तजि भजु मोही॥

मम माया संभव संसारा।

जीव चराचर बिबिधि प्रकारा॥

सब मम प्रिय सब मम उपजाए।

सब ते अधिक मनुज मोहि भाए॥

तिन्ह महँ द्विज द्विज महँ श्रुतिधारी।

तिन्ह महुँ निगम धरम अनुसारी॥

तिन्ह महँ प्रिय बिरक्त पुनि ग्यानी।

ग्यानिहु ते अति प्रिय बिग्यानी॥

तिन्ह ते पुनि मोहि प्रिय निज दासा।

जेहि गति मोरि न दूसरि आसा॥

पुनि पुनि सत्य कहउँ तोहि पाहीं।

मोहि सेवक सम प्रिय कोउ नाहीं॥

भगति हीन बिरंचि किन होई।

सब जीवहु सम प्रिय मोहि सोई॥

भगतिवंत अति नीचउ प्रानी।

मोहि प्रानप्रिय असि मम बानी॥

सुचि सुसील सेवक सुमति प्रिय कहु काहि न लाग।

श्रुति पुरान कह नीति असि सावधान सुनु काग॥

एक पिता के बिपुल कुमारा।

होहिं पृथक गुन सील अचारा॥

कोउ पंडित कोउ तापस ग्याता।

कोउ धनवंत सूर कोउ दाता॥

कोउ सर्बग्य धर्मरत कोई।

सब पर पितहि प्रीति सम होई॥

कोउ पितु भगत बचन मन कर्मा।

सपनेहुँ जान न दूसर धर्मा॥

सो सुत प्रिय पितु प्रान समाना।

जद्यपि सो सब भाँति अयाना॥

एहि बिधि जीव चराचर जेते।

त्रिजग देव नर असुर समेते॥

अखिल बिस्व यह मोर उपाया।

सब पर मोहि बराबरि दाया॥

तिन्ह महँ जो परिहरि मद माया।

भजै मोहि मन बच अरु काया॥

पुरुष नपुंसक नारि वा जीव चराचर कोइ।

सर्ब भाव भज कपट तजि मोहि परम प्रिय सोइ॥

सत्य कहउँ खग तोहि सुचि सेवक मम प्रानप्रिय।

अस बिचारि भजु मोहि परिहरि आस भरोस सब॥

भगवान् कहते हैं—‘हे काक! अब तुम मेरी सत्य, सुगम, वेदादिके द्वारा वर्णित परम निर्मल वाणी सुनो। मैं तुमको यह ‘निज सिद्धान्त’ सुनाता हूँ, इसे सुनकर मनमें धारण करो और सब तजकर मेरा भजन करो। यह सारा संसार मेरी मायासे उत्पन्न है। इसमें अनेकों प्रकारके चराचर जीव हैं, वे सभी मुझे प्रिय हैं; क्योंकि सभी मेरे उत्पन्न किये हुए हैं। इनमें मुझको मनुष्य सबसे अच्छे लगते हैं। मनुष्योंमें भी द्विज, द्विजोंमें भी वेदोंको धारण करनेवाले, उनमें भी वेदोक्त धर्मपर चलनेवाले और उनमें भी वैराग्यवान् मुझे प्रिय हैं। वैराग्यवानोंमें फिर ज्ञानी और ज्ञानियोंसे भी अत्यन्त प्रिय विज्ञानी हैं। विज्ञानियोंसे भी प्रिय मुझे अपना दास है, जिसे मेरी ही गति है, कोई दूसरी आशा नहीं है। मैं तुझसे बार-बार सत्य ‘निज सिद्धान्त’ कहता हूँ कि मुझे अपने सेवकके समान प्रिय कोई भी नहीं है। भक्तिहीन ब्रह्मा ही क्यों न हो, वह मुझे सब जीवोंके समान ही प्रिय है। परंतु भक्तिमान् अत्यन्त नीच भी प्राणी मुझे प्राणोंके समान प्रिय है—यह मेरी घोषणा है। पवित्र, सुशील और सुन्दर बुद्धिवाला सेवक, भला बताओ, किसको प्यारा नहीं लगता। वेद और पुराण ऐसी ही नीति कहते हैं।’

‘हे काक! सावधान होकर सुनो। एक पिताके बहुत-से पुत्र पृथक्-पृथक् गुण, शील और आचरणवाले होते हैं। कोई पण्डित होता है, कोई तपस्वी; कोई ज्ञानी, कोई धनी; कोई शूरवीर और कोई दानी। कोई सर्वज्ञ और धर्मपरायण होता है। पिताका प्रेम इन सबपर समान होता है। परंतु इनमेंसे यदि कोई मन, वचन और कर्मसे पिताका ही भक्त होता है, स्वप्नमें भी दूसरा धर्म नहीं जानता, तो वह पुत्र पिताको प्राणोंके समान प्रिय होता है—चाहे वह सब प्रकारसे अज्ञान (मूर्ख) ही क्यों न हो। इसी प्रकार तिर्यक् (पशु-पक्षी), देव, मनुष्य और असुरोंसमेत जितने भी चेतन और जड जीव हैं; उनसे भरा हुआ यह सम्पूर्ण विश्व मेरा ही पैदा किया हुआ है, अत: सबपर मेरी बराबर दया है। परंतु फिर भी इनमेंसे जो मद और मायाको छोड़कर मन, वचन और शरीरसे मुझको भजता है—वह पुरुष हो, नपुंसक हो, स्त्री हो अथवा चर-अचर कोई भी जीव हो—कपट छोड़कर जो ही सर्वभावसे मुझे भजता है, वही मुझे परम प्रिय है। हे पक्षी! मैं तुमसे सत्य कहता हूँ, पवित्र (अनन्य एवं निष्काम) सेवक मुझे प्राणोंके समान प्रिय है। यों विचारकर सब आशा-भरोसा छोड़कर मुझको ही भजो।’

उपर्युक्त विवेचनसे यह अच्छी तरह समझमें आ गया होगा कि श्रीरामचरितमानसके भगवान् श्रीराम परात्पर पुरुषोत्तम पूर्णब्रह्म हैं और उनके प्रेम-लाभके लिये अविचल एवं विशुद्ध भक्ति ही एकमात्र साधन है। मुक्ति तो ऐसे भक्तोंके पीछे-पीछे उनका आश्रय पानेके लिये फिरती है, परंतु वे अनन्यप्रेमी भक्त भक्तिपर ही लुभाये रहकर उसका आदर नहीं करते—

अस बिचारि हरि भगत सयाने।

मुक्ति निरादर भगति लुभाने॥

अन्तमें—आओ, हमलोग भी रामतत्त्वज्ञशिरोमणि तुलसीके सुरमें सुर मिलाकर अपने जीवनका यही परमफल बनायें—

सियराम-सरूपु अगाध अनूप

बिलोचन-मीननको जलु है।

श्रुति रामकथा, मुख रामको नामु,

हिएँ पुनि रामहिको थलु है॥

मति रामहि सों, गति रामहि सों,

रति रामसों, रामहि को बलु है।

सबकी न कहै, तुलसीके मतें

इतनो जग जीवनको फलु है॥