श्रीराम तथा श्रीकृष्ण भगवान् हैं

प्रिय महोदय! सादर हरिस्मरण। आपका पत्र मिला। आपका समूचा पत्र पढ़नेपर यह ज्ञात हुआ कि आप श्रीराम तथा श्रीकृष्ण आदि अवतारोंको भगवान् मानने या कहनेके विरोधी हैं। आपकी सबसे बड़ी युक्ति यह है कि ‘श्रीकृष्ण और श्रीराम एक दिन जन्मे और मरे थे, किंतु ईश्वर कभी जन्मता-मरता नहीं।’

मैं पूछता हूँ, क्या आपने श्रीकृष्णके जन्म और मरणको अपनी आँखों देखा है? आप कहेंगे, ‘नहीं’। तब आपने श्रीराम और श्रीकृष्णको कैसे जाना? रामायण तथा भागवत आदि सद्‍ग्रन्थोंद्वारा अथवा संत-महात्माओंद्वारा जाना। यदि यह बात है तो जिन ग्रन्थों या शास्त्रोंमें श्रीराम तथा श्रीकृष्णका चरित्र आया है, क्या उनमें उन्हें भगवान् नहीं माना गया है? यदि भगवान् माना गया है तो आपको भी मानना चाहिये। एक ही ग्रन्थकी एक ही विषयमें आधी बात तो आप मानें और आधी न मानें—यह कहाँका न्याय है?

यदि कहें कि ‘जन्म-मरणके कारण मैं उनको नित्य नहीं मानता’ तो इसपर इस प्रकारके विचारकी आवश्यकता है। क्या श्रीराम जिस प्रकार परमधाम पधारे थे, जिस प्रकार उनके साथ सारी अयोध्या चली गयी थी और जिस प्रकार वे अपने विष्णुरूपमें स्थित हुए थे, उसी प्रकारका महाप्रयाण साधारण जीवोंका भी होता है? कदापि नहीं। इसी प्रकार श्रीकृष्णके भी परमधाम-गमनका वृत्तान्त अलौकिक है। वे अपने उसी शरीरसे परमधाममें प्रतिष्ठित हुए। जन्म कालमें भी क्या साधारण मनुष्य उन्हींकी भाँति स्वत: चतुर्भुज रूपमें प्रकट हो जाते हैं? यदि नहीं, तो साधारण मनुष्योंके साथ उनकी तुलना कैसे की जा सकती है? उनके जन्म-कर्म संसारी जीवोंकी अपेक्षा सर्वथा विलक्षण, सर्वथा उत्कृष्ट अलौकिक हैं। जो कार्य बड़े-से-बड़े देवता भी नहीं कर सके, वही उन्होंने अनायास कर दिखाया। उन श्रीराम या श्रीकृष्णको साधारण मनुष्य कहना या मानना अपनी अज्ञानताका परिचय देना है।

आप समझते हैं, श्रीराम और श्रीकृष्ण जन्मे और मरे; किन्तु श्रीराम और श्रीकृष्ण सनातन परमेश्वर ही हैं। उनका जन्म नहीं, आविर्भाव होता है; मरण नहीं, तिरोभाव होता है। सूर्य छिपता है, नष्ट नहीं होता। नष्ट होता तो दूसरे दिन कैसे दिखायी देता। इसी प्रकार श्रीराम और श्रीकृष्ण अपने-अपने चिन्मय साकेत एवं गोलोकधाममें नित्य प्रतिष्ठित रहते हैं। भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये वे कभी-कभी इस धराधाममें अवतीर्ण या प्रकट होते हैं। फिर लीलाकार्य पूरा करके अन्तर्धान हो जाते हैं। यही कारण है कि आज भी वे अपने प्यारे भक्तोंको प्रत्यक्ष दर्शन देते हैं। आपने श्रीरामचरितमानसकी कई चौपाईयाँ अपने मतलबके लिये उद्‍धृत की हैं। उन्हीं तुलसीदासजीने श्रीरामके विषयमें क्या विचार किया है, इसे भी कभी आपने देखा है? श्रीतुलसीदासजीको श्रीरघुनाथजीने प्रत्यक्ष दर्शन दिया था, किंतु आप-जैसे महानुभाव इस बातपर विश्वास ही क्यों करेंगे।

जो हो, किसीके न माननेसे सत्यपर पर्दा नहीं पड़ता। किसीके न माननेसे सूर्यके प्रकाशपर अविश्वास नहीं किया जा सकता। श्रीराम और श्रीकृष्ण भगवान् परब्रह्म हैं, यही सिद्धान्त है। शेष सब भगवान‍्की दया है। यदि कोई कड़ी बात लिखी गयी हो तो कृपया क्षमा करेंगे।