श्रीहनुमान्जीकी योगशक्ति
प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। कृपापत्र मिला। आपकी शंका है कि ‘हनुमान्जीने जब मशक-समान रूप धारण किया तो अँगूठी कहाँ रही?’ वास्तवमें हनुमान्जीके महत्त्वको न जाननेसे ही मनमें इस तरहकी शंका पैदा होती है। जो हनुमान्जी अपने पर्वताकार शरीरको क्षणभरमें मच्छरके समान बना सकते हैं, वे उस अँगूठीको भी अपनी योगशक्तिसे इतनी छोटी कर सकते हैं कि मच्छर होनेपर भी उसे लिये रह सकें। क्या इतनी साधारण बात भी आपकी समझमें नहीं आती?
‘श्रीरामेश्वर-स्थापना किस पण्डितने करायी’—इस प्रश्नके उत्तरमें निवेदन है कि रामदलमें विद्वानोंकी कमी नहीं थी। स्वयं हनुमान्जी ‘नवव्याकरणार्थवेत्ता’ थे; उन्होंने सूर्यदेवसे सब शास्त्रोंका अध्ययन किया था। सीताजी भी अव्यक्तरूपसे सदा भगवान्के साथ ही थीं, केवल स्थूल जगत्में अपहरणकी लीला चल रही थी; वह भी छायाकी। साक्षात् सीता तो पावकमें निवास करती थीं और पावक देवता सर्वत्र प्रकट हो सकते थे। फिर भी आप पण्डितका नाम तथा सीताकी उपस्थितिके विषयमें कुछ सुनना ही चाहते हैं तो सुनें—दन्तकथाओंमें सुनी हुई बात है, सम्भव है कहीं लिखी भी हो—‘रामेश्वरजीकी स्थापना करानेके लिये स्वयं पण्डितप्रवर दशानन (रावण)-जी ही पधारे थे। स्थापनाका कार्य सुचारुरूपसे चलानेके लिये कुछ समयतकके लिये रावणने सीताजीको भी वहाँ उपस्थित कर दिया था।’ सत्य क्या है, भगवान् जानें। शेष भगवत्कृपा।