श्रीराम-गुण-गान
[१]
(राग मालकोश—त्रिताल)
चित्र-विचित्र मण्डपोंसे है
शोभित अवधपुरी रमणीय।
सर्वकाम सब सिद्धिप्रदायक
उसमें कल्पवृक्ष कमनीय॥
उसके मूलभागमें शोभित
परम मनोहर सिंहासन।
अति अमूल्य मरकत, सुवर्ण,
नीलमसे निर्मित अतिशोभन॥
दिव्य कान्तिसे करता वह अति
गहरे अन्धकारका नाश।
होता रहता उससे दुर्लभ
विमल ज्ञानका सहज प्रकाश॥
उसपर समासीन जन-मनके
मोहन राघवेन्द्र भगवान।
श्रीविग्रहका रंग हरित-द्युति-
श्यामल दुर्वापत्र समान॥
उज्ज्वल आभासे आलोकित
दिव्य सच्चिदानन्द-शरीर।
देवराज-पूजित हरता जो
सत्वर जन-मनकी सब पीर॥
प्रभुके सुन्दर मुखमण्डलकी
सुषमाका अतिशय विस्तार।
देता रहता जो राकाके
पूर्ण सुधाधरको धिक्कार॥
उसकी अति कमनीय कान्ति भी
लगती अति अपार फीकी।
राघवके वदनारविन्दकी
अनुपम छबि विचित्र नीकी॥
लसित अष्टमीके शशांककी
सुषमा तेजपुंज शुभ भाल।
काली घुँघराली अलकावलिकी
सुन्दरता विशद विशाल॥
दिव्य मुकुटके मणि-रत्नोंकी
रश्मि कर रही द्युति-विस्तार।
मकराकर कुण्डलोंका
सौन्दर्य वर्णनातीत अपार॥
सुन्दर अरुण ओष्ठ विद्रुम-सम,
दन्तपंक्ति शशि-किरण-समान।
अति शोभित जिह्वा ललाम अति
जपापुष्प सम रंग सुभान॥
कम्बु-कंठ, जिसमें ऋक् आदिक
वेद शास्त्र करते नित वास।
श्रीविग्रहकी शोभा वर्धित
करते ये सब अंग-विलास॥
केहरि-कंधर-पुष्ट समुन्नत
कंधे प्रभुके शोभाधाम।
भुज विशाल, जिनपर अति शोभित
कंकण-केयूरादि ललाम॥
हीरा-जटित मुद्रिकाकी
शोभा देदीप्यमान सब काल।
घुटनोंतक लंबे अति सुन्दर
राघवेन्द्रके बाहु विशाल॥
विस्तृत वक्ष:स्थल लक्ष्मी-
निवाससे अतिशय शोभासार।
श्रीवत्सादि चिह्नसे अंकित
परम मनोहर नित्य उदार॥
उदर रुचिर गम्भीर नाभि, अति
सुन्दर सुषमामय कटिदेश।
मणिमय कांचीसे सुषमा श्री-
अंगोंकी बढ़ रही विशेष॥
जंघा विमल, जानु अति सुन्दर,
चरण-कमलकी कान्ति अपार।
अंकुश-यव-वज्रादि चिह्नसे
अंकित तलुवे शोभागार॥
योगिध्येय श्रीराघवके
श्रीविग्रहका जो करते ध्यान।
प्रतिदिन शुभ्र उपचारोंसे जो
पूजन करते हैं मतिमान॥
वे प्रिय जन प्रभुके होते, नित
उन्हें पूजते सब सुर-भूप।
दुर्लभ भक्ति प्राप्त करते वे
राघवेन्द्रकी परम अनूप॥
[२]
(राग विहाग—तीन ताल)
शौर्य-वीर्य-ऐश्वर्य अतुल
माधुर्य दिव्य सौन्दर्य-निधान।
नित्य सच्चिदानन्द दिव्य
शुचितम गुणगण-सागर भगवान॥
धैर्य परम, गाम्भीर्य सरस,
सौशील्य सहज, औदार्य महान।
शरणागत-वात्सल्य, साम्य,
कारुण्य, स्थैर्य, चातुर्य अमान॥
सत्य, अहिंसा, मृदुता, आर्जव,
ज्ञान, तेज, बल, बुद्धि ललाम।
नमस्कार पद-पद्मोंमें जो
गुणनिधि अतुल राम-से राम॥
[३]
(राग भूपाल तोड़ी—तीन ताल)
रामचंद्र मुख-मंजु मनोहर
भक्त-भ्रमर मन-हारक।
मंगल मूल मधुर मंजुल मृदु
दिब्य सहज सुख-कारक॥
नित्य निरामय निर्मल अबिरल
ललित कलित सुभ सोभित।
पाप-ताप-मद-मोह-हरन, मुनि-
मन-सुचि-करन सुलोभित॥
नील स्याम-तनु, धनु कर सोहत,
बरद हस्त भय नासत।
सुमन-माल-सुरभित, मुक्ता-मनि-
हार लसत दुति भासत॥
पीत बसन सौंदर्य-सौर्य-निधि,
भाल तिलक अति भ्राजत।
अखिल भुवनपति, सुषमा-श्री लखि,
काम कोटि-सत लाजत॥
[४]
(राग खट—तीन ताल)
अतुल अनन्त अचिन्त्य सद्गुणों-
के शुचितम शुभ आकर।
असुर दैत्य-तम-निशा-विनाशक
रवि-कुल-कमल-दिवाकर॥
साधु-धर्म-संरक्षण-संबर्धन-
हित नित्य धनुर्धर।
अखिल विश्वगत प्राणिमात्रके
सहज समर्थ सुहृदवर॥
मात-पिता-गुरुभक्ति अनुत्तम
भ्रातृ-स्नेह-रत्नाकर।
राम स्वयं भगवान अकारण-
करुण भक्त-भव-भयहर॥
[५]
(राग भैरवी—ताल कहरवा)
मात-पिता-गुरु-भक्ति, एकपत्नीव्रत पावन।
भ्रातृप्रेम, शरणागतवत्सलता मनभावन॥
परम मधुर सौन्दर्य काम-शतकोटि-लजावन।
त्याग, शान्ति, वैराग्य, ज्ञान मुनि-चित्त लुभावन॥
शौर्य-नीति-बल-तेज शुचि उपजावत मन हर्ष है।
दुष्ट-दलन, सेवक-सुहृद राम परम आदर्श हैं॥
[६]
(राग बहार—ताल कहरवा)
जय श्रीराम, भरत, लक्ष्मण,
शत्रुघ्न जयति, जय कपि हनुमान।
जय जानकी, माण्डवी, जय
उर्मिला सती, श्रुतिकीर्ति महान॥
जयति आदिकवि वाल्मीकि,
जय शंकर, जय कवि तुलसीदास।
रामायण-रचयिता धन्य, जय
उमा कर रहीं बुद्धि-विकास॥
[७]
(राग नट—ताल मूल)
सीता-राम, उर्मिला-लक्ष्मण,
माण्डवि-भरत मंगलाधार।
शुचि श्रुतिकीर्ति-शत्रुहन, गौरी-
हर, भुशुण्डि, हनुमान उदार॥
आदि महाकवि वाल्मीकि मुनि,
तुलसीदास भक्त सुखधाम।
अष्ट अष्टदल-मध्य सुशोभित,
केन्द्र राम-सीता अभिराम॥
मंगलमय इनका जो करता
श्रद्धायुत नित पूजन-ध्यान।
पाकर सीताराम-प्रेम वह
बनता परम भक्त मतिमान॥
[८]
(राग ईमन)
मज्जन करि सुभ सरजु-तट ठाढ़े श्रीरघुबीर।
संग अनुज मुनि अमल मन, प्रभु भंजन भव-भीर॥
बपु नव-नीरद-नील सुचि, भुवनाभरन रसाल।
सुन्दर पीताम्बर बिसद भ्राजत उर मनि-माल॥
पुष्पहार मुनि-मन-हरन सुंदर सुषमा-ऐन।
बिकट भ्रुकुटि, चितवनि कुटिल, रस-मद-माते नैन॥
रूप-जलधि माधुर्य-निधि उपमा-बिरहित अंग।
रोम-रोम पर बारियै अगनित अजित अनंग॥
[९]
(राग माढ़)
राम-लखन नृप-सुअन दोउ राजत कौसिक संग।
रूप-सुधा-सौंदर्य-निधि उमगत अंग सुअंग॥
दामिनि-बारिद-बर-वरन, तेज-पुंज रस-रंग।
नख-सिख सुंदर निरखि छबि मोहे अमित अनंग॥
धनु-सर कर, केहरि-ठवनि, कटि पटपीत-निषंग।
मुनि मख-राखन, भय-हरन, बिरमत सदा असंग॥
बिकट कुटिल मारीच मति नीच सुबाहु भुअंग।
उभय जीति, मुनि जग्य कौं सफल करॺो सब अंग॥
[१०]
(राग पूर्वी—ताल त्रिताल)
अति प्रसन्न-मन जनकराजने
विधिवत् कर सारे आचार।
चारों कन्याएँ कीं अर्पण,
चारोंको शुचि सालंकार॥
रामभद्रको सीता दी, दी
लक्ष्मणको उर्मिला अमन्द।
दी माण्डवी भरतको, दी
श्रुतिकीर्ति शत्रुहनको सानन्द॥
ऋषियोंने सविधान कराया
चारोंका विवाह-संस्कार।
जनकपुरीमें, सारे जगमें
ही छाया आनन्द अपार॥
[११]
(राग पूरिया—तीन ताल)
प्रभु! मैं नहिं नाव चलावौं।
तव पद-रज नर-करनि मूरि प्रभु!
महिमा अमित कहाँ लगि गावौं।
पाहन छुअत नारि भइ पावनि,
काठ पुरातन की यह नावौं।
परसत रज मुनि-नारि बनै यह,
मैं पुनि असि नौका कहँ पावौं॥
मैं अति दीन-दरिद्र, कुटुँब बहु,
यहि नौका तें सबहिं निभावौं।
जो यह उड़ै, जीविका बिनसै,
केहि बिधि पुनि परिवार चलावौं॥
अनुमति होइ तो लेइ कठौता,
सुरसरि-जल भरि प्रभु पहँ लावौं।
पद पखारि, रज धोइ भली बिधि,
करि चरनामृत पाप नसावौं॥
प्रभु-चरनन की सपथ नाथ! मैं,
अन्य भाँति नहिं नाव चढ़ावौं।
लखन रिसाइ तीर जो मारैं,
निबल, पकरि पद प्रान गवावौं॥
प्रेम भरे, अति सरल सुहावन,
अटपट बचन सुने रघुरावौं।
करुना-निधि हँसि अनुमति दीन्ही,
केवट कह्यो पार लै जावौं॥
[१२]
(राग हमीर—तीन ताल)
प्रभु बोले मुसुकाई।
जातें तोरि नाव रहि जावै, सोइ जतन करु भाई॥
पाँव पखारु, लाइ गंगाजल, अब मत बिलँब लगाई।
सुनत बचन तेहि छिन सो दौरॺौ, मन महँ अति हरषाई॥
भरॺो कठौता गंगाजल सों सब परिवार बुलाई।
प्रभु-पद आइ पखारन लाग्यौ, उर आनँद न समाई॥
सुरन बिलोकि प्रेम-करुना अति, नभ दुंदुभी बजाई।
केवट भाग्य सराहि अमित बिधि, सुमन-बृष्टि झरि लाई॥
पद पखारि, सब लै चरनामृत, पुरुखन पार लँघाई।
सीता-लखन सहित रघुनंदन, हरषित नाव चलाई॥
[१३]
(राग प्रदीप—तीन ताल)
मधुर मृदु सुंदर राजकुमार॥
स्यामल-गौर किसोर बंधु दोउ सुचि सुषमा-आगार।
कटि तूनीर, तीर-धनु कर महँ धीर बीर सकुमार॥
जटा-जूट-मंडित, मुनि पट, उर-बाहु बिसाल उदार।
चले जात पथ, पग बिनु पनही रूप-सील-भंडार॥
उभय मध्य राजति श्रीजानकि सोभामई अपार।
अति निर्मल देखत मन उमगत श्रद्धा-सरिता-धार॥
बूझति पिय सौं चकित, कथा बन की करि, हृदय बिचार।
हेरि-हेरि सिय-तनु समुझावत प्रिया, भरे हिय प्यार॥
लखन सकुचि सोचत सिय-हिय की बात, न पावत पार।
धन्य ते, जिन निरखे इनहीं, भरि नैन सकल सुख-सार॥
[१४]
(राग गौड़ सारंग—तीन ताल)
लक्ष्मण अनुज सती सीता सह मर्यादा-पुरुषोत्तम राम।
पिता-वचनका पालन करते वन-वन विचर रहे अभिराम॥
कभी पर्वतारोहण करते, कभी उतर करते विश्राम।
शुभ मर्यादा-लीला करते लीलामय आदर्श ललाम॥
[१५]
(राग देश)
चरन-पादुका नेह सों पूजत नित अभिराम।
राम-प्रेम-मूरति भरत निवसत नंदीग्राम॥
मन अखंड स्मृति राम की, जीभ राम कौ नाम।
राजत कर जप-माल सुचि, तजे भोग सब काम॥
[१६]
(राग मधुवती—तीन ताल)
सहित सहस्र चतुर्दश राक्षसगणके, जो थे पापाचार।
धर्मद्वेषी खरदूषणका महासमरमें कर संहार॥
बैठे रामभद्र; मुनियोंने आकर किया समुद सत्कार।
परम प्रशंसा कर सब करने लगे चतुर्दिक जय-जयकार॥
लगे बजाने देव दुन्दुभी अन्तरिक्षमें बारम्बार।
रामचन्द्रका अद्भुत अत्याश्चर्यपूर्ण यह कर्म निहार॥
[१७]
(राग पीलू—ताल दीपचंदी)
विप्रवेशधारी वैश्वानर आये प्रभुके पास।
विनय-विनम्र बचन बोले मुखपर छाया मृदु हास॥
नाथ! आपकी लीला अब लायेगी नूतन रंग।
सीता-हरण करेगा रावण खूब मचेगा जंग॥
अत: जगज्जननी सीताकी सेवाका सब भार।
मुझे सौंप इन छाया-सीताको करिये स्वीकार॥
लीला-बध जब कर रावणका कर देंगे उद्धार।
तब मैं इन्हें सौंप दूँगा सादर लाकर सरकार॥
दु:ख हुआ यद्यपि प्रभुको ली बात किंतु यह मान।
हुआ नहीं लक्ष्मणको भी इस गुप्त भेदका ज्ञान॥
[१८]
(राग हमीर—तीन ताल)
मधुर सु-सेवासे प्रसन्न हो शबरीसे बोले श्रीराम।
भद्रे! शुचि शुश्रूषा की, अब जाओ निज अभीष्ट हरि-धाम॥
आज्ञा पा, शबरीने जलते पावकमें जब किया प्रवेश।
दिव्य अग्नि-सम देह प्राप्तकर तेजस्वी-धर पावन वेश॥
वसन, हार, आभूषण, अनुलेपन सब दिव्य परम तन धार।
विद्युत्-द्युति दमकाती पहुँची दिव्य धाम, तमके उस पार॥
[१९]
(राग कलावती—ताल धुमाली)
‘ओजस्वी सौमित्रि करो तुम क्षमा हमारे सारे दोष।
मदको त्याग, तोड़ मालाको, बोले कपिपति—‘छोड़ो रोष॥’
रामकृपासे ही पाया मैंने श्री, कीर्ति, राज्य सर्वस्व।
राघवके उपकार अमितका क्या मैं बदला दूँ निस्सत्त्व॥
होगा प्रभुकी महिमासे ही रावण-वध, सीता-उद्धार।
मैं नगण्य भी पाऊँगा सेवाका शुचि सौभाग्य अपार॥
ताराने भी मधुर नम्र बचनोंसे स्थितिका किया बखान।
मृदु-स्वभाव लक्ष्मणने हो संतुष्ट किया तत्क्षण प्रस्थान॥
[२०]
(राग देश)
सीता अति कृस गात, सुमिरत मन रघुबंस-मनि।
आयहु मन इतरात, दसमुख मंदोदरि सहित॥
अधम निलज्ज अपार, कहे बचन निंदित अमित।
सीता दै फटकार, बोली—‘चुप रहु नीच! खल’॥
रावन कर अति क्रोध, कर अति कठिन कृपान लै।
धायहु असुर अबोध, सीतहि मारन मंद-मति॥
मयतनया धरि हाथ, अति बिनीत कहि नीति सुचि।
गई लेइ निज साथ, कोह-मोह-रत रावनहिं॥
[२१]
(राग हंसध्वनि—तीन ताल)
सीताका कर हरण दुष्ट रावण जब लंकामें लाया।
दिये प्रलोभन अमित, विविध विधिसे फुसलाया, समझाया॥
क्रोधातुर हो सती जानकीने जब उसको फटकारा।
रखकर सीताको अशोक-वन, लौट गया वह मन-मारा॥
जगज्जननि जानकिको जब सुरपतिने देखा दु:ख-अधीर।
अति दु:खित हो, चरु लेकर जब आये, शुचि शचिपति सुर-वीर॥
आश्वासन दे, कहा—‘जननि! रावणका कर सवंश संहार।’
विजयी हो रघुवर, तुमको ले जायेंगे निज संग उदार॥
कुछ दिन धीरज धरो, करो अनुचरकी यह सेवा स्वीकार।
दिव्य देव-हवि-अन्न ग्रहणकर क्षुधा-तृषासे पाओ पार॥
भूख-प्यासकी बाधा मैया! कभी न होगी तुमको अब।
सीताने सुरपतिको जब पहचाना, लिया दिव्य चरु तब॥
माताकी शुभ आशिष पाकर सुखसे लौट गये सुरराज।
धन्य वही, जिसका तन-मन-धन लगता सदा रामके काज॥
[२२]
(राग हंसनारायणी—तीन ताल)
‘पता लगाकर सीताका खुद मिलकर हैं आये हनुमान।
मेरे, लक्ष्मणके, रघुकुलके रक्षक परम महाबलवान॥
वस्तु न मेरे पास योग्य, दूँ जिसको इन्हें आज उपहार।
ऋणसे मुक्त हो नहीं सकता मैं कदापि, कर चुका विचार॥
आज इस समय मैं देता हूँ इनको बस, आलिंगन-दान।
मेरा यह सर्वस्व, महात्मा इससे हों प्रसन्न हनुमान’॥
(यों कह—) पुलकित हुए अंग सब, उमड़ा राघवके मन प्रेम अनन्य।
किया कृतात्मा सेवकको दे गाढालिंगन प्रभुने धन्य॥
[२३]
(राग तैलंग—तीन ताल)
रिपु रन जीति राम घर आए।
लषन-सीय-कपि-रीछ-सहित प्रभु
कुसल, अवध आनंद बधाए॥
नगर छयो आनंद-कुलाहल,
हाट-बाट-घर सबनि सजाए।
लगे बाजने वाजन चहूँ दिसि,
मुदित नारि-नर देखन धाए॥
उतरि बिमान भए सब ठाढ़े,
अमित रूप निज राम बनाए।
जथाजोग मिलि राम सबनि तें
सबके मन अति मोद बढ़ाए॥
[२४]
(राग नायकी—ताल मूल)
नील कमल, नव-नील-नीरधर,
नील मनोहर मरकत स्याम।
राज-राज-मनि-मुकुट कोटि-
कंदर्प-दर्प-हर सोभा-धाम॥
राजत रत्न-रचित सिंहासन,
भ्राजत सिर मनि-मुकुट ललाम।
अंग-अंग सुचि सुषमा-सागर
मुनि-मन-हर लोचन अभिराम॥
बरद हस्त-मुद्रा महिमामय
भक्त-कल्पतरु पूरन काम।
जनकनंदिनी सहित सुसोभित
सुख-दायक रघुनायक राम॥
[२५]
(राग भैरव—ताल कहरवा)
गो-द्विज-रक्षा-हेतु रामने
लिया दिव्य मानव-अवतार।
गो-द्विज-रक्षा-हेतु यज्ञकी
रक्षा की बन पहरेदार॥
गो-द्विज-रक्षा-हेतु किया उस
शिला-अहल्याका उद्धार।
गो-द्विज-रक्षा-हेतु प्रफुल्लित-
मन, वन-गमन किया स्वीकार॥
गो-द्विज-रक्षा-हेतु लिया
श्रीसीता-लक्ष्मणको निज साथ॥
गो-द्विज-रक्षा-हेतु तपस्वी
बन वन-वन विचरे रघुनाथ।
गो-द्विज-रक्षा-हेतु कराया
सीता-हरण असुरके हाथ।
गो-द्विज-रक्षा-हेतु बँधाया
पत्थर-पुल रोका निधि-पाथ॥
गो-द्विज-रक्षा-हेतु किया
रघुबरने लंका-दुर्ग-प्रवेश।
गो-द्विज-रक्षा-हेतु किया
दुर्धर्ष असुर-दलको नि:शेष॥
गो-द्विज-रक्षा-हेतु इन्द्रजित-
रावणका कर जीवन शेष।
गो-द्विज-रक्षा-हेतु बनाया
भक्त विभीषणको लंकेश॥
गो-द्विज-रक्षा-हेतु मिटाकर
अनाचार सब अत्याचार।
गो-द्विज-रक्षा-हेतु विविध शुचि
मर्यादाका कर विस्तार॥
गो-द्विज-रक्षा-हेतु किया
प्रस्थापित राम-राज्य शुभ-सार।
गो-द्विज-रक्षा-हेतु पुण्यमय
फैलाया सुख विविध प्रकार॥
[२६]
(राग रागेश्वरी—तीन ताल)
ध्यानमग्न हनुमान नाचते
गाते राम-नाम अविराम।
जय सियाराम, जय सियाराम,
जय सियाराम, जय सियाराम॥
जय रघुनायक, जय सुखदायक,
जय वरदायक, जय सियाराम।
जय सियाराम, जय सियाराम,
जय सियाराम, जय सियाराम॥
[२७]
(राग कामोद—तीन ताल)
कांचनाद्रि-कमनीय कलेवर
कदली-बन राजत अभिराम।
हेम-मुकुट सिर, भूषण भूषित;
अर्ध-निमीलित नेत्र ललाम॥
वरद पाणि वपु, ध्यानमग्न मन,
भक्त-कल्पतरु, नित्य निकाम।
राघवेन्द्र-सीता-प्रिय-सेवक
मन-मुख सदा जपत सियाराम॥
[२८]
आरती भगवान् मर्यादापुरुषोत्तम
आरति कीजै श्रीरघुबर की।
सत चित आनँद शिव सुन्दर की॥टेक॥
दशरथ-तनय कौसिला-नन्दन,
सुर-मुनि-रक्षक दैत्य-निकन्दन,
अनुगत-भक्त भक्त-उर-चन्दन,
मर्यादा-पुरुषोत्तम-वर की॥
निर्गुण-सगुण, अरूप-रूपनिधि,
सकल लोक-वन्दित विभिन्न विधि,
हरण शोक-भय, दायक सब सिधि,
मायारहित दिव्य नर-वर की॥
जानकिपति सुराधिपति जगपति,
अखिल लोक पालक त्रिलोक-गति,
विश्ववन्द्य अनवद्य अमित-मति,
एकमात्र गति सचराचर की॥
शरणागत-वत्सल-व्रतधारी,
भक्त-कल्पतरु-वर असुरारी,
नाम लेत जग-पावनकारी,
वानर-सखा-दीन-दुख-हर की॥
[२९]
आरती श्रीजानकीजी
आरति श्रीजनक-दुलारी की।
सीताजी रघुबर-प्यारी की॥ टेक॥
जगत-जननि जगकी विस्तारिणि,
नित्य सत्य साकेत-बिहारिणि,
परम दयामयि दीनोद्धारिणि,
मैया भक्तन-हितकारी की॥
सीताजी रघुबर-प्यारी की॥
सती-शिरोमणि, पति-हित-कारिणि,
पति-सेवा हित वन-वन-चारिणि,
पति-हित पति-वियोग-स्वीकारिणि,
त्याग-धर्म-मूरति-धारी की॥
सीताजी रघुबर-प्यारी की॥
बिमल-कीर्ति सब लोकन छायी,
नाम लेत पावन मति आयी,
सुमिरत कटत कष्ट दुखदायी,
शरणागत-जन-भय-हारी की॥
सीताजी रघुबर-प्यारी की॥
[३०]
आरती श्री अंजनीकुमारजी
आरति श्रीअंजनिकुमारकी।
शिवस्वरूप मारुतनन्दन,
केसरी-सुअन कलियुग-कुठार की॥
हियमें राम-सीय नित राखत,
मुखसों राम-नाम-गुण भाखत,
सुमधुर भक्ति-प्रेम-रस चाखत,
मंगलकर मंगलाकार की॥
॥ आरति श्रीअंजनिकुमारकी॥
विस्मृत-बल-पौरुष, अतुलित बल,
दहन दनुज-वन-हित, दावानल,
ज्ञानि-मुकुट-मणि, पूर्ण गुण सकल,
मंजु भूमि शुभसदाचार की
॥ आरति श्रीअंजनिकुमारकी॥
मन-इन्द्रिय-विजयी, विशाल मति,
कलानिधान, निपुण गायक अति,
छन्द-व्याकरण-शास्त्र अमित गति,
रामभक्त अतिशय उदार की॥
॥ आरति श्रीअंजनिकुमारकी॥
पावन परम सुभक्ति-प्रदायक,
शरणागतको सब सुख-दायक,
विजयी वानर-सेना-नायक,
सुगति-पोतके कर्णधार की॥