श्रीरामनवमी
श्रीरामनवमी सारे जगत्के लिये सौभाग्यका दिन है; क्योंकि अखिल विश्वपति सच्चिदानन्दघन श्रीभगवान् इसी दिन दुर्दान्त रावणके अत्याचारसे पीडित पृथ्वीको सुखी करने और सनातन-धर्मकी मर्यादा स्थापन करनेके लिये मर्यादापुरुषोत्तम श्रीरामके रूपमें प्रकट हुए थे। श्रीराम केवल हिंदुओंके ही ‘राम’ नहीं हैं, वे अखिल विश्वके प्राणाराम हैं। भगवान् श्रीराम और भगवान् श्रीकृष्णको केवल हिंदूजातिकी सम्पत्ति मानना उनके गुणोंको घटाना है, असीमको सीमाबद्ध करना है। विश्वचराचरमें आत्मरूपसे नित्य रमण करनेवाले और स्वयं ही विश्वचराचरके रूपमें प्रतिभासित सर्वव्यापी सर्वान्तर्यामी सर्वरूप नारायण किसी एक देश या व्यक्तिकी ही वस्तु कैसे हो सकते हैं? वे सबके हैं, सबमें हैं, सबके साथ सदा संयुक्त हैं और सर्वमय हैं। जो कोई भी जीव उनकी आदर्श मर्यादा-लीला—उनके पुण्यचरित्रका श्रद्धापूर्वक गान, श्रवण और अनुकरण करता है, वही पवित्र-हृदय होकर परम सुखको प्राप्त कर सकता है। श्रीरामके समान आदर्श पुरुष, आदर्श धर्मात्मा, आदर्श नरपति, आदर्श मित्र, आदर्श शत्रु, आदर्श भाई, आदर्श पुत्र, आदर्श गुरु, आदर्श शिष्य, आदर्श पति, आदर्श स्वामी, आदर्श सेवक, आदर्श वीर, आदर्श दयालु, आदर्श शरणागत-वत्सल, आदर्श तपस्वी, आदर्श सत्यवादी, आदर्श दृढ़प्रतिज्ञ और आदर्श संयमी और कौन हुआ? जगत्के इतिहासमें श्रीरामकी तुलनामें एक श्रीराम ही हैं। श्रीरामने साक्षात् परमपुरुष परमात्मा होनेपर भी जीवोंको सत्यपथपर आरूढ़ करानेके लिये ऐसी आदर्श लीलाएँ कीं, जिनका अनुकरण सभी लोग सुखपूर्वक कर सकते हैं। उन्हीं हमारे श्रीरामका पुण्य प्राकट्यदिवस चैत्र शुक्ला नवमी है। इस सुअवसरपर सभी लोगोंको, खास करके उनको, जो श्रीरामको साक्षात् भगवान् और अपने आदर्श पूर्वपुरुषके रूपमें अवतरित मानते हैं, श्रीराम-जन्मका पुण्योत्सव मनाना चाहिये। इस उत्सवका प्रधान उद्देश्य होना चाहिये श्रीरामको प्रसन्न करना और श्रीरामके आदर्श गुणोंका अपनेमें विकास कर श्रीराम-कृपा प्राप्त करनेका अधिकारी बनना। अतएव विशेष ध्यान श्रीरामके आदर्श चरित्रके अनुकरणपर ही रखना चाहिये। विधि इस प्रकार की जा सकती है—
१—चैत्र शुक्ला १ से चैत्र शुक्ला ९ तक नौ दिन उत्सव मनाया जाय।
२—प्रत्येक मनुष्य (स्त्री, पुरुष, बालक) प्रतिदिन अपनी रुचिके अनुसार श्रीरामके दो अक्षरी, पंचाक्षरी या चार अक्षरी* मन्त्रका नियमपूर्वक जप करे।
पहले दिन नियम कर ले, उसीके अनुसार नौ दिनतक करते रहना चाहिये। कम-से-कम १०८ मन्त्रका जप प्रतिदिन हो जाना चाहिये। उत्साह और समय मिले तो नौ दिनमें नौ लाख नामका जप कर सकते हैं।
३—प्रतिदिन सुबह या शामको कुछ समयतक नियमितरूपसे श्रीराम-नामका कीर्तन हो।
४—श्रीरामायणका नौ दिनोंमें पूरा पाठ किया जाय। वाल्मीकि, अध्यात्म या श्रीगोसाईंजीकृत मानस, इनमेंसे अपनी रुचिके अनुसार किसी भी रामायणका पाठ कर सकते हैं। जो ऐसा न कर सकें वे कुछ समयतक प्रतिदिन रामायण पढ़ें या सुनें।
५—माता-पिताके चरणोंमें प्रतिदिन प्रात:काल प्रणाम करें।
६—यथासाध्य खूब सावधानीसे सत्य-भाषण करें (सच बोलें)।
७—घरमें माता, पिता, भाई, भौजाई, स्वामी, स्त्री, नौकर, मालिक सभी आपसमें प्रेम रखें, अपने अच्छे बर्तावसे सबको प्रसन्न रखें, किसीसे झगड़ा न करें।
८—ब्रह्मचर्यका पालन करें।
९—रामनवमीका व्रत करें।
१०—रामनवमीके दिन श्रीरामजन्मोत्सव मनाया जाय, श्रीराम-कथा हो, सभाएँ की जायँ, जिनमें रामायणका प्रवचन और रामायणसम्बन्धी शिक्षाप्रद व्याख्यान हों। कहने और सुननेवाले अपने अंदर श्रीरामके-से गुण लावें, इसके लिये दृढ़ निश्चय करें और श्रीरामसे प्रार्थना करें।
११—आपसके मेलमें बाधा न आती हो तो श्रीरामकी सवारीका जुलूस नगर-कीर्तनके साथ निकाला जाय।
इन ग्यारह बातोंमेंसे जिनसे जितनी पालन हो सकें, उतनी ही करनेकी चेष्टा करें, श्रीरामनामका जप, कीर्तन, माता-पिता आदिके चरणोंमें प्रणाम, सबसे प्रेम, ब्रह्मचर्यका अधिक-से-अधिक पालन, सत्य-भाषण आदि बातें तो जीवनभर पालन करनेयोग्य हैं। इनका अभ्यास अधिक-से-अधिक बढ़ाना चाहिये। श्रीरामकी भक्तिके लिये इन्हीं व्रतोंकी आवश्यकता है।