असली सद्गुण
भैया! नाटकमें पार्ट करनेकी तरह किये जानेवाले दिखावटी सत्य, अहिंसा, अक्रोध, क्षमा, ब्रह्मचर्य, दया आदिसे कुछ भी नहीं होता। उसी प्रकार नाटकीय ज्ञान, वैराग्य, भक्ति और प्रेम भी निरर्थक ही हैं। जैसे नाटकका राजा वस्तुत: राजा नहीं है, वैसे ही नाटकका ज्ञानी, तपस्वी और सदाचारी भी वस्तुत: वैसा नहीं है। मुझको अच्छा बोलना—लोगोंको समझाना आ गया। बड़ी-बड़ी ऊँची बातोंका उपदेश भी मैं करने लगा; परंतु यदि मैंने स्वयं उनका मर्म नहीं समझा और मेरे जीवनमें उन ऊँची बातोंने प्रवेश न किया तो मुझे क्या लाभ हुआ? धनके झूठे आडम्बरसे कोई धनी थोड़े ही हो गया? अतएव जीवनमें सात्त्विक गुणोंका और भक्ति, वैराग्य, ज्ञानका सच्चा विकास होना चाहिये। बड़ी लगनसे ऐसी चेष्टा करनी चाहिये। यह होता है—दूसरोंके दोष न देखकर उनके गुण देखनेसे, अपने अवगुण देखनेसे और जी-जानसे अपने अवगुणोंको नष्ट करके सद्गुणोंके प्रकाशके लिये अथक प्रयत्न करनेसे। लोग दूसरोंके दोष देखते हैं, अपने नहीं देखते—फल यह होता है कि अपने अंदर दोष आ-आकर भरते चले जाते हैं। सारे सद्गुण हमारे व्यवहारमें उतर आने चाहिये। बहुत बार आदमी भूलसे व्यावहारिक सत्तामें दोषोंका रहना अनिवार्य मानकर, युक्तिपूर्वक दोषोंका समर्थन करने लगता है, यह मनका बड़ा धोखा है। दोषका समर्थन किसी भी रूपमें नहीं करना चाहिये और अपने एक-एक दोषको दु:सह समझकर उसका त्याग करना चाहिये। सद्गुण और सद्व्यवहार केवल कथनमात्र न होकर क्रियात्मक होने चाहिये और प्रत्येक प्रतिकूल अवसरपर सावधानीके साथ डटे रहना चाहिये; जिससे सद्गुण और सद्व्यवहारका अभाव न हो जाय। धर्मकी परीक्षा काम पड़नेपर ही होती है। एकान्तमें सच्ची भक्ति हो, वही भक्ति है। सत्य और अहिंसा—जीवनमें उतरे रहें वही सच्चे सत्य और अहिंसा-व्रत हैं।