बर्ताव सुधारनेके उपाय

आपने लिखा कि ‘मेरा स्वभाव तामसी होता चला जाता है, सबसे अच्छा व्यवहार नहीं होता। ऐसा कौन-सा साधन है जिससे स्वभाव बदल जाय और सबसे सात्त्विक व्यवहार होने लगे?’ सो ठीक है सात्त्विक व्यवहार हो, ऐसी आपकी इच्छा है। एक तो यही स्वभाव बदलनेमें बड़ा कारण हो सकता है। मनुष्यको जो चीज वस्तुत: बुरी मालूम होने लगती है और उसका रहना काँटेकी-ज्यों चुभता है, तब वह चीज धीरे-धीरे छूट ही जाती है। और जिसकी सच्ची चाह होती है, वह चीज आगे-पीछे मिलती ही है। परन्तु बात यह है कि किसीके साथ बुरा बर्ताव करना यह असलमें ‘स्वभाव’ नहीं है। आत्माका तो स्वभाव है आनन्द और प्रेमसे परिपूर्ण! वह स्वयं आनन्दमय है और इसलिये आनन्द ही वितरण करना चाहता है। न यह अन्त:करणका ही धर्म है। यह तो बाहरसे आया हुआ दोष है, जो सावधानीके साथ प्रयत्न करनेपर नष्ट हो सकता है। निम्नलिखित बातोंपर ध्यान देकर चेष्टा करनी चाहिये। साधना या चेष्टा जबतक लगनसे नहीं होती, तबतक फल नहीं होता। पथ्यपरहेजका खयाल रखते हुए सावधानीके साथ दवा लेनेसे ही रोग मिटता है।

१—सब जीवोंमें भगवान् बसते हैं, भगवान् ही सब जीव बने हुए हैं; फिर बुरा बर्ताव किसके साथ किया जाय।

अब हौं कासों बैर करौं।

कहत पुकारत हरि निज मुख तें

घट-घट हौं बिहरौं॥

हम किसीके भी साथ बुरा बर्ताव करते हैं तो वह श्रीभगवान‍्के साथ ही करते हैं।

२—बुरा बर्ताव करनेसे भगवान् नाराज होते हैं, क्योंकि सभी जीव भगवान‍्की सन्तान हैं। किसीके बालकको कष्ट पहुँचानेसे माँ जरूर नाराज होगी।

३—बुरा बर्ताव करनेसे द्वेष, वैर, क्रोध, विषाद आदि दोषोंका जन्म-जन्मान्तरतक बड़ा विस्तार होता है; इससे अपनी और जगत‍्की बड़ी हानि होती है—लौकिक भी और पारमार्थिक भी।

४—बुरा बर्ताव हम तभी करते हैं जब कोई हमें बुरा लगता है। बुरा लगता है दोषदृष्टिसे। दोषदृष्टि सदा ही द्वेष और जलन पैदा करती है, इससे अपनी बड़ी हानि होती है। जिसको सबमें दोष देखनेकी आदत पड़ जाती है, वह जगत‍्से कुछ सीख ही नहीं सकता और सदा जला करता है, न अच्छे रास्तेपर ही जा सकता है। क्योंकि उसे रास्ता बतलानेवालोंमें और रास्तेमें भी दोष-ही-दोष दीखता है।

५—जब हमारे साथ कोई बुरा बर्ताव करता है तो हमें दु:ख होता है; इसी प्रकार हम जब दूसरेके साथ बुरा बर्ताव करते हैं तो उसे भी दु:ख होता है। हम स्वयं तो यह चाहें कि सब हमसे अच्छा बर्ताव करें और हम दूसरोंसे बुरा बर्ताव करें, यह अधर्म है। शास्त्र कहते हैं—

श्रूयतां धर्मसर्वस्वं श्रुत्वा चैवावधार्यताम्।

आत्मन: प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्॥

‘धर्मका सार सुनो और सुनकर उसे धारण करो। जो बात अपनेको प्रतिकूल लगती है, वह दूसरोंके साथ कभी न करो।’

६—अच्छे बर्तावसे प्रेम बढ़ता है, बुरे बर्तावसे वैर।

७—बुरा बर्ताव कामना, अभिमान, द्वेष और प्रतिकूल भावना आदिके कारण होता है, अतएव इनका सावधानीके साथ त्याग करना चाहिये।

८—भगवान‍्से कातर प्रार्थना करनी चाहिये कि हे भगवन्! किसी भी हेतुसे मैं किसी भी प्राणीके साथ कभी बुरा बर्ताव न करूँ।

९—श्रीचैतन्य महाप्रभुकी यह वाणी याद रखनी चाहिये—

तृणादपि सुनीचेन तरोरपि सहिष्णुना।

अमानिना मानदेन कीर्तनीय: सदा हरि:॥

‘अपनेको एक तिनकेसे भी बहुत छोटा समझनेवाले, वृक्षसे भी अधिक सहनशील, स्वयं अमानी और दूसरोंको मान देनेवाले पुरुषोंके द्वारा हरि सदा कीर्तनीय हैं।’ इस प्रकारका भाव हो जानेपर सहज ही किसीसे बुरा बर्ताव नहीं होगा।

और भी बहुत-सी बातें हैं। इनमेंसे किसी भी एक या एकाधिक बातपर पूरा खयाल रखनेसे बुरा बर्ताव दूर हो सकता है। संसारमें हम सभी मुसाफिर हैं। आपसमें हिल-मिलकर, एक-दूसरेके दोषोंको सहकर परस्पर सबकी सेवा करते हुए रहेंगे तो आरामसे मुसाफिरीके दिन कटेंगे और नये मुकद्दमे नहीं लगेंगे। और यदि लड़ते-झगड़ते रहेंगे तो मुसाफिरी भी भयदायक और अशान्तिरूप हो जायगी तथा बीचमें ही नये-नये फौजदारीके मुकद्दमोंमें फँसकर हैरान और परेशान भी होंगे!

तुलसी या संसार में भाँति भाँति के लोग।

सबसे हिल मिल चालिये नदी नाव संजोग॥

तेरे भावें जो करौ भलौ बुरो संसार।

नारायण तू बैठकर अपनो भवन बुहार॥

बुरा जो देखन मैं गया बुरा न पाया कोय।

जो तन देखा आपना मुझ-सा बुरा न कोय॥

श्रीभगवान‍्का स्मरण और जप निरन्तर करनेकी चेष्टा करनी चाहिये।