भगवान‍्का स्वभाव

सप्रेम सादर यथायोग्य। आपका पत्र मिला। उसमें प्रेम और आपके हृदयकी भावुकता भरी है। सच्ची भावुकतामें एक मिठास होती है, वह उसमें मुझको मिली। मेरा इतना ही निवेदन है कि इस भावुकता और अनुरक्तिके प्रवाहका मुख श्रीनन्दनन्दनकी ओर मोड़ दीजिये। आप धन्य हो जायँगे। मैं तो क्षुद्र प्राणी हूँ, मुझमें जो आपको इतनी महत्ता दीखती है, यह आपकी सरल भावना है। आप सच मानिये—मुझमें अगणित दुर्बलताएँ हैं, असंख्य दोष हैं।

आपने लिखा ‘मुझमें एक भी अच्छी बात नहीं है जिसके फलस्वरूप मैं आपको प्रसन्न कर सकूँ।’ पण्डितजी! मैं हृदयसे कहता हूँ—आपके प्रति मैं कभी अप्रसन्न हुआ ही नहीं, चाहता हूँ कि किसीके प्रति भी मैं अप्रसन्न न होऊँ। अप्रसन्नताका कोई कारण भी तो हो। सभी मेरी प्रशंसा करते हैं, मुझे बड़ा बतलाते हैं, मेरा सम्मान करते हैं, मेरी सेवा करना चाहते हैं। ऐसी दशामें नीच स्वार्थी भी अप्रसन्न नहीं हो सकता, मुझे तो थोड़ी बुद्धिका भी घमंड है। फिर, मेरी प्रसन्नताका मूल्य ही क्या है। न तो यह प्रसन्नता सुख दे सकती है, न दु:ख ही टाल सकती है, और राग-द्वेषके अनित्य ढाँचेमें रहनेवाली होनेसे इसके स्थायी होनेकी भी सम्भावना नहीं है। मैं तो यह समझता हूँ कि जिस प्रकारका भाव आप मुझ तुच्छ प्राणीके प्रति दिखलाते हैं, ऐसा उस प्रेमके समुद्र, दयाके अखण्ड स्रोत, सुख-शान्ति और आनन्दके खजाने श्रीश्यामसुन्दरके प्रति रखें तो निश्चय ही आप उनके ‘प्रिय पात्र’ हो जायँ। आपकी सारी अयोग्यताएँ, सारी त्रुटियाँ उनकी पलकके इशारेमात्रसे महान् दिव्य गुणोंके रूपमें पलट जायँ। वे तो योग्यता नहीं देखते, त्रुटियोंको तो अपने हाथोंसे सुधार देते हैं—पापोंका बोझ अपने सरपर उठाकर उसे समुद्रमें बहा आते हैं। वे तो चाहते हैं—सिर्फ हृदयका सच्चा भाव। उनको सच्चे भावसे अपनी ‘बाँह गहा दीजिये’ भाव देखते ही वे स्वयं आकर बाँह पकड़कर आपको अपने हृदयसे लगा लेंगे। उनका एक स्वभाव है—वे जिसे ग्रहण कर लेते हैं—उसे छोड़ना नहीं जानते, चाहे वह कोई कैसा ही क्यों न हो। उसमें अगर कोई पाप-ताप रहता है तो स्वयं उसे दूर करके उसको निर्मल बना लेते हैं। मातृपरायण बच्चेका मल जननी ही तो धोती है। भाव निर्मल हो भावोंके प्रवाहका मुख भगवान‍्की ओर मुड़े—इसके लिये उनके नामका जप कीजिये। आपने दो बातें पूछी थीं। दोनों ये हैं—वस्तु है भावको भगवान‍्में अर्पण करना और करनेके लिये उपाय है नाम-जप।

मेरे प्रति आपका जो प्रेमभाव है, मेरे इस पत्रसे उसका तिरस्कार न समझिये। यह तो मैंने सच्ची स्थिति लिखी है। तुच्छ मनुष्य बालूकी भीतके समान अनित्य है। उसका अपना ही कोई पता नहीं है, तब वह दूसरोंका क्या कर सकता है। परन्तु इसमें प्रेमका क्या सम्बन्ध है, वह तो हृदयकी चीज है, किसीपर भी हो सकती है। आप अगर यह कहें तो मैं इसे स्वीकार करता हूँ और आपके प्रेमको सिर-माथेपर स्वीकार करता हूँ। मैं तो आपलोगोंके प्रेमका ऋणी हूँ! क्या कहूँ, सच्चे प्रेमका बदला कोई होता ही नहीं जो कोई चुका सके। प्रेम तो सदा ही अपना ऋण बढ़ाता ही रहता है। यह उसका स्वरूप है। × × ×