भगवान‍्के विधानमें आनन्द

सादर हरिस्मरण! आपके कई पत्र आये, मैं समयपर उत्तर नहीं दे सका। कोई विचार न करें। एजेन्सीका काम न होनेपर आपने जिस भावसे इसको ग्रहण किया, वह बहुत ही ठीक है। कर्मके प्रत्येक फलमें इसी प्रकार भगवान‍्की दयाको देखना चाहिये। आपने लिखा कि जैसे नारदजीको भगवान‍्ने विवाह नहीं करने दिया, वैसे ही मुझको भी इस काममें सफल नहीं किया। काम हो जाता तो मैं फँस जाता! सो ठीक ही है। ऐसा ही मानना चाहिये। काम होनेपर यह विचार करना चाहिये कि ‘यह मेरे पुरुषार्थका फल नहीं है और मुझे इसमें कोई आसक्ति या फलकामना भी नहीं है। भगवान‍्ने इस काममें दया करके ही मुझे नियुक्त कर दिया है। अतएव भगवान‍्के आज्ञानुसार भगवान‍्की प्रीतिके लिये उत्साह, सावधानी और धर्मपूर्वक सत्य और न्यायको साथ रखते हुए मैं यह सेवा करूँगा।’ और न होनेपर—‘न होनेमें ही कल्याण है, इसीलिये भगवान‍्ने नहीं होने दिया।’ यह विश्वास करके आनन्दमग्न रहना चाहिये। ‘होने’ और ‘न होने’ दोनोंमें ही हर्ष-विषादका विकार न होकर दोनोंमें ही भगवान‍्की कृपाका अनुभव करना चाहिये। ‘न होनेमें’ जैसे दु:खका विकार होता है, वैसे ही ‘होनेमें’ सुखका विकार होता है। विकार होते ही भगवान‍्की विस्मृति हो जाती है ‘न होनेमें’ तो भगवान‍्का स्मरण होता भी है; परंतु ‘होनेमें’ भगवान‍्का स्मरण छूटना बहुत सहज है। अतएव किसी भी हालतमें मनमें विकार न होकर प्रभुकी स्मृति बनी रहे और प्रभुका स्मरण करते हुये ही प्रभुके सौंपे हुए कार्यको प्रसन्नतापूर्वक करें। ऐसी ही भक्तकी धारणा होनी चाहिये। मेरी धारणामें भी आपका यह काम न होना अच्छा ही हुआ। मैंने बहुत डरते हुए ही सिफारिश की थी।

आपकी यह प्रार्थना भी बहुत ही सुन्दर है कि ‘भगवान् सब जीवोंपर पूर्ण दया करके एक बार अपना लें और भगवान‍्की सच्ची भक्तिका प्रचार सारे विश्वमें हो जाय।’ बड़ी ही सद्भावना है। परंतु यह जान रखना चाहिये कि सभी जीवोंपर सदा ही भगवान‍्की पूर्ण दया है। हाँ, भक्तिका प्रचार होनेसे ही सब जीव इस दयाको समझ सकते हैं। भक्तिका प्रचार हो—इस प्रकारकी भावना करना बहुत उत्तम है ही। परंतु साथ ही भगवत्कृपा अनुभव करते हुए हमलोग भक्त बनते रहें तो एक-एक करके विश्वके सभी लोग भक्त बन सकते हैं। भगवान् तो भक्तिके प्रचारमें सहायक होंगे ही। परंतु भक्ति प्रचारकी वस्तु है नहीं। यही बड़ी अड़चन है। वह तो करनेकी चीज है। आपका स्वास्थ्य अच्छा होगा।