भगवान‍्की असीम कृपा

सप्रेम हरिस्मरण! आपका प्रेमभरा पत्र मिला। दया और स्नेह तो श्रीभगवान‍्का हम सभीपर अनन्त है, इतना अनन्त है जिसकी कहीं कोई सीमा ही नहीं। मैं यहाँसे जानेवाला तो जल्दी था, परंतु देर हो ही गयी। श्रीभगवान‍्का विधान मंगलपूर्ण ही होता है। पूज्यपाद श्रीमहाराजजीने जो आशीर्वाद दिया सो उनकी बड़ी कृपा है। दिन बहुत आनन्दसे कट रहे हैं। भगवान‍्की बड़ी ही कृपा है। मैं तो बस, इतना ही जानता हूँ—भगवान‍्की मुझपर असीम कृपा है। इसके सिवा और कोई महिमा हो तो पता नहीं। और भगवान‍्से प्रार्थना भी यही है कि वे यदि कृपा करके जनावें तो अपनी ही महिमा जनावें—मेरे तो दोष ही दिखलावें। सचमुच बात भी यही है। मनुष्य तो दोषोंसे भरा है—परन्तु भगवान‍्का हृदय अनन्त माताओंके अनन्त हृदयोंके अनन्त एकत्रीकृत वात्सल्यकणोंका महान् अगाध समुद्र है। उस वात्सल्य-समुद्रकी कोई सीमा ही नहीं है। इससे भगवान्—कैसा भी अपराधी कोई क्यों न हो, जरा भी सामने आते ही उसे पाप-शून्य करके अपनी मधुमयी पवित्र गोदमें लेते हैं। जो सामने नहीं आता, उसका भी अपनी सहज सुहृदतावश कल्याण ही करते हैं। प्रकार विभिन्न हैं, करते तो कल्याण ही हैं। कल्याणमय जो ठहरे! श्रीभगवान‍्में वस्तुत: किसीका अकल्याण करनेकी शक्ति ही नहीं है। संसारमें दु:ख-सुखके कोई भी कैसे भी दृश्य आवें, सभी उनकी कल्याणमयी लीलाके ही तो सीन हैं। बस, आनन्द-ही-आनन्द, कल्याण-ही-कल्याण! आपकी निष्ठा, गुरुभक्ति, श्रद्धा सराहनीय है। आपका हृदय बड़ा निर्मल है। आपके निर्मल हृदयकी भावना मेरे लिये लाभदायक ही होगी, इसमें कोई सन्देह नहीं। आपकी निष्ठा, प्रेम, हृदयकी सरलता और निष्कपटता, श्रद्धा और विश्वास, भजन और भाव सभी उच्चस्तरके हों—यह तो मैं स्वाभाविक ही देखना चाहता हूँ।