भगवान‍्की दयालुतापर विश्वास

जबतक मनुष्य परमात्माको नहीं प्राप्त कर लेता, तबतक नित्य नये जालोंमें फँसता ही रहता है। हमलोग अनन्त जन्मोंसे यही करते आ रहे हैं। परंतु यह नहीं मानना चाहिये कि उबरनेकी कोई सूरत ही नहीं है। तुम्हें भगवान् पर श्रद्धा रखनी चाहिये कि वे उबारनेवाले हैं, उनकी शरण लेते ही सारे जाल सदाके लिये कट जाते हैं। घबराओ नहीं, ‘अटकी नाव’ भगवत्कृपाके अनुभवरूपी अनुकूल वायुका एक झोंका लगते ही चल पड़ेगी। भगवान‍्की दयालुतापर विश्वास करो। जो दु:ख, कष्ट और विपत्तियाँ आ रही हैं, उन्हें भगवत्कृपाका आशीर्वाद समझो और प्रत्येक कष्टके रूपमें कृष्ण-कन्हैयाके दर्शन कर उन्हें अपनी सारी सत्ता समर्पण करनेकी चेष्टा करो, कष्टोंको कृष्णरूपमें वरण करो, सिर चढ़ाओ, आलिंगन करो। परन्तु उनसे छूटनेके लिये कभी भूलकर भी कुमार्गपर चलनेकी कायरताके वश मत होओ; लड़ते रहो—मनकी बुरी वृत्तियोंसे—ऐसा करोगे तो श्रीकृष्णकृपासे तुम्हारी एक दिन अवश्य विजय होगी, तुम सुखी होओगे। मैं भी चाहता हूँ तुमसे मिलना हो। परन्तु संयोग ईश्वराधीन है। मेरे दिलको तुम अपने साथ समझो। तुम्हारी स्मृति मुझे बार-बार होती है। तुम हर हालतमें मेरे प्रिय हो और रहोगे। शरीर और मनसे प्रसन्न रहनेकी निरन्तर चेष्टा करते रहो। भगवान‍्के नामका जप सदा करते रहो और उसे उत्तरोत्तर बढ़ाओ।