भगवान‍्की कृपाशक्ति

एक पत्रमें आपने इस आशयकी बात लिखी थी कि किसी समय मेरे किसी संकल्पसे आपके मनमें बार-बार उठनेवाली एक बुरी वासना शान्त हो गयी थी, इसलिये अब मैं पुन: ऐसा संकल्प करूँ जिससे आपकी कोई दूसरी बुरी वासना भी शान्त हो जाय। इसपर मेरा यह निवेदन है कि यदि उस बार ऐसा हुआ तो इसमें प्रधान कारण भगवत्कृपा और आपकी श्रद्धा है, मेरे संकल्पोंमें मुझे ऐसी कोई शक्ति नहीं दीखती जिसके बलपर मैं कुछ कर सकता हूँ ऐसा कह सकूँ। हाँ, आपके मनसे बुरी वासना नाश हो जाय यह मैं भी चाहता हूँ। आप भगवत्कृपापर विश्वास करें और श्रद्धापूर्वक ऐसा निश्चय करें कि ‘भगवान‍्की दयासे अब मेरे मनमें अमुक बुरी वासना कभी न उठे।’ तो मेरा विश्वास है कि यदि आपका निश्चय दृढ़ श्रद्धायुक्त होगा तो आपके मनसे उक्त बुरी वासना हट सकती है। श्रीभगवान‍्की शक्ति अपरिमित है, जो मनुष्य अपनेको भगवान् पर सर्वतोभावेन छोड़ देता है, अपना सारा बल भगवान‍्के चरणोंमें न्योछावर कर भगवान‍्के बलका आश्रय कर लेता है, तो भगवान‍्की अचिन्त्य महिमामयी कृपाशक्तिके द्वारा सुरक्षित होकर वह समस्त विरोधी शक्तियोंपर विजयी हो सकता है। निर्भरता अवश्य ही सत्य, पूर्ण और अनन्य होनी चाहिये। फिर उसे कुछ भी चिन्ता नहीं करनी पड़ती।

सत्यका स्वरूप और उसका महत्त्व

सत्यका महत्त्व समझमें आ जानेके बाद जरा-सा भी सत्यका अपलाप बहुत ही असह्य मालूम होता है। सत्यके द्वारा प्राप्त होनेवाले अतुलनीय आनन्द और शान्तिका आस्वादन नहीं होता, तभीतक असत्यकी ओर प्रवृत्ति होती है। श्रीभगवान‍्में पूर्ण विश्वास होनेपर भी असत्य छूट जाता है। आसक्ति, मोह और प्रमादवश ही मनुष्य झूठ बोलता है और उसके द्वारा सफलताकी सम्भावना मानता है। मनोरंजनके लिये झूठ बोलना प्रमाद है। स्वभाव बिगड़ जानेपर असत्य छूटना अवश्य ही कठिन हो जाता है, परंतु यह नहीं मानना चाहिये कि वह छूट ही नहीं सकता। वास्तवमें आत्मा सत्स्वरूप है, आत्माका स्वरूप ही सत्य है। अतएव असत्य आत्माका स्वभाव नहीं है। भूलसे इस दोषको आत्माका स्वरूप मान लिया जाता है। जो बाहरसे आयी हुई चीज है उसको निकालना असम्भव कदापि नहीं है। पुरानी होनेकी वजहसे कठिन अवश्य है। भगवान‍्की कृपापर भरोसा करके दृढ़तापूर्वक पुराने अभ्यासके विरुद्ध नया अभ्यास किया जाय और बीचमें ही घबराकर छोड़ न दिया जाय तो असत्यका पुराना अभ्यास निश्चय ही छूट जा सकता है। इस बातपर अवश्य विश्वास करना चाहिये। दुर्गुण और दुर्भाव, आत्मा या अन्त:करणके धर्म नहीं हैं, स्वाभाविक नहीं हैं। अतएव इनको नष्ट करना, यथायोग्य परिश्रमसाध्य होनेपर भी सर्वथा सम्भव है।

यहाँ एक बात यह सत्यके सम्बन्धमें जान रखनी चाहिये। सत्य वही है, जिसमें किसी प्रकारका कपट न हो और जो निर्दोष प्राणीका अहित न करता हो। मानो सत्यके साथ सरलता और अहिंसाका प्राण और जीवनका-सा मेल है। इनका परस्पर अविनाभाव-सम्बन्ध है। वाणीसे शब्दोंका उच्चारण ज्यों-का-त्यों होनेपर भी यदि कपटयुक्त भावभंगीके द्वारा सुननेवालेकी समझमें यथार्थ बात नहीं आती तो वह वाणी सत्य नहीं है। इसके विपरीत शब्दोंके उच्चारणमें एक-एक अक्षरकी या वाक्यकी यथार्थता न होनेपर भी यदि सुननेवालेको ठीक समझा देनेकी नीयत, इशारों या भावोंका प्रयोग करके उसे यथार्थ समझा देनेकी सरल चेष्टा होती है तो वह सत्य है। उच्चारणमें वाणीकी प्रधानता होनेपर भी सत्यका यथार्थ सम्बन्ध मनसे है। इसी प्रकार किसी निर्दोष जीवका अहित करनेकी इच्छा या वासनासे जो सत्य शब्दोंका उच्चारण किया जाता है, वह भी परिणाममें असत्य और अनिष्ट फलका उत्पादक होनेसे असत्यके ही समान है। मन, वचन तथा तनमें कहीं भी छल न होकर जो सरल भाषण होता है, वही अहिंसायुक्त होनेपर सत्य समझा जाता है।

क्रोधनाशके उपाय

क्रोधनाशके प्रधान उपाय दो हैं।

१—सबमें भगवान‍्को देखना। २—सब कुछ भगवान‍्का विधान समझकर प्रत्येक प्रतिकूलतामें अनुकूलताका अनुभव करना। और भी अनेकों उपाय हैं, उनसे सावधानीके साथ काम लेना चाहिये। सर्वत्र सबमें भगवान‍्को देखनेका अभ्यास करना चाहिये और जिनसे व्यवहार पड़ता हो उनको भगवान‍्का स्वरूप समझकर पहले मन-ही-मन उन्हें प्रणाम कर लेना चाहिये। तदनन्तर यथायोग्य निर्दोष व्यवहार करना चाहिये। श्रीभगवान् हैं, यह बात याद रखनेपर व्यवहारमें निर्दोषता अपने-ही-आप आ जायगी।

नरकके तीन द्वार

धनका लोभ न रखकर कर्तव्यबुद्धिसे या इससे भी उच्चभावना हो तो भगवान‍्की सेवाके भावसे धनोपार्जनके लिये चेष्टा करनी चाहिये। यह भाव रहेगा तो दोष नहीं आ सकेंगे। धनोपार्जनमें पापोंका प्रवेश लोभके कारण ही होता है। यह याद रखना चाहिये कि काम, क्रोध और लोभ तीनों नरकके द्वार हैं और आत्माका पतन करनेवाले हैं। श्रीभगवान‍्ने गीतामें स्पष्ट इस बातकी घोषणा की है, अतएव इन तीनोंसे यथासाध्य बचना चाहिये।

पर-धन और पर-स्त्रीमें विष-बुद्धि

पर-धन और पर-स्त्रीमें विष-बुद्धि होनी चाहिये। उन्हें जलती हुई आग या महाविषधर सर्प समझकर उनसे दूर—अति दूर रहना चाहिये। सद्हेतुसे भी पर-धन या पर-स्त्रीमें प्रीति होनेपर गिरनेका डर रहता है; क्योंकि ये ऐसी ही वस्तुएँ हैं। जरा-सी दूषित आसक्ति उत्पन्न होते ही पतन होते देर नहीं लगती। इसीसे साधकोंके लिये शास्त्रोंमें इनका ‘स्व’ होनेपर भी वर्जन ही श्रेयस्कर बतलाया गया है। ‘पर’ तो प्रत्यक्ष नरकानल है ही। अतएव बार-बार दोष और दु:खबुद्धि करके पर-स्त्री और पर-धनकी ओर चित्तवृत्तिको कभी जाने ही नहीं देना चाहिये।

भगवान‍्की दयापर विश्वास

एक बात और, वह यह कि श्रीभगवान‍्की दयापर विश्वास करके उनका स्मरण करते रहना चाहिये। भगवान् पर निर्भर हो जानेसे सारी विपत्तियाँ अपने-आप ही टल जाती हैं। भगवान् कहते हैं—तुम मुझमें मन लगाये रखो, फिर मेरी कृपासे सारी बड़ी-से-बड़ी कठिनाइयोंको सहज ही लाँघ जाओगे।

मच्चित्त: सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।

(गीता १८। ५८)

भगवान‍्की इस आश्वासन-वाणीपर विश्वास करके उनपर निर्भर होनेकी चेष्टा करनी चाहिये।