भगवान‍्से तुरंत उत्तर मिलेगा

सादर सप्रेम हरिस्मरण। आपके चारों पत्र मिल गये। उत्तर लिखनेमें मेरी ओरसे बहुत ही अवहेलना हुई, इसके लिये मनमें बड़ा संकोच है। कई बार पत्र लिखनेका विचार किया। दो-चार पंक्तियाँ लिखीं भी, परन्तु कोई-न-कोई विघ्न आ गया, जिससे लिखना रुक गया। आप इतनेपर भी मुझसे नाराज नहीं हुए और पत्रोंका उत्तर न लिखनेपर भी बराबर पत्र लिखते रहे, इस कृपा और प्रेमके बदले मैं तो कुछ भी करनेमें असमर्थ हूँ। आपने मेरे लिये जो कुछ भी शब्द लिखे हैं, उनको पढ़कर मुझे तो लज्जा आती है। मैं ऐसे शब्दोंके सर्वथा अयोग्य हूँ। वास्तवमें आपके पत्रोंका उत्तर वही दे सकता है, जिसमें आपके लिखे शब्दोंका अर्थ घटता हो। हाँ, मैं आपकी श्रद्धापर इससे कोई आक्षेप नहीं करता। पाषाण या धातुमयी मूर्तिमें भी श्रद्धा और प्रेमके कारण भगवान‍्के दर्शन हो सकते हैं। वस्तुत: सब जगह भगवान् हैं भी। मेरा तो यही लिखना है कि आपको मुझमें जो बातें दिखायी देती हैं, उसका कारण श्रद्धा ही है। मेरी दृष्टिसे तो मुझे ऐसी कोई बात नहीं दिखायी देती। मेरा असौजन्य और अकृतज्ञता तो इसीसे सिद्ध है कि रुग्णावस्थामें आपके लिखे हुए करुण और प्रेमभरे पत्रोंका मैं महीनोंतक उत्तर नहीं लिख पाता। आप अपनी श्रद्धामयी सज्जनतासे फिर भी मुझको चाहते हैं; यह आपकी महिमा है। मेरा तो यह निवेदन है कि आप जिस प्रकार मुझे स्मरण करते हैं और मुझको पत्र लिखते हैं, उसी प्रकार दयार्णव, सर्वशक्तिमान्, सर्वगुणगणालंकृत, परम सुहृद् आपके नित्य परम आत्मीय, सदा अतिसमीप रहकर आपकी सारी स्थितियोंको भलीभाँति जानने-समझनेवाले और किसीकी भी बड़ी-से-बड़ी भूलपर भी कभी आपका अहित न करनेकी इच्छा करनेवाले भगवान‍्का स्मरण कीजिये और भावकी भाषामें उन्हें पत्र लिखिये। एक पत्र भी पूरा नहीं लिख पायेंगे—तुरंत आपको आश्वासनपूर्ण उत्तर मिलेगा।

‘निरबल ह्वै बल राम पुकारो आये आधे नाम।’

भक्तशिरोमणि गजेन्द्र पूरा नाम भी उच्चारण नहीं कर पाये थे, उनके सामने भगवान् प्रकट हो गये और उन्होंने गजराजको तुरंत बचा लिया। यह अनहोनी या कल्पित कथा नहीं है।

रोगमें क्या समझना चाहिये?

परंतु रोगकी निवृत्तिके लिये भी उन्हें क्यों पुकारना चाहिये। रोगकी सौगात भेजनेवाले क्या कोई दूसरे हैं। और यदि प्रियतमके हाथसे भेजी हुई चीज रोग है, तो फिर हमें उससे दु:ख क्यों होना चाहिये? जिस वस्तुसे प्रियतमका सम्बन्ध है, जो उनके घरसे आयी है, जिसको उन्होंने भेजा है, जो उनके हाथोंसे स्पर्शित है, जिसको लेकर वही आये हैं, उससे हमें भय और शोक क्यों होना चाहिये? प्रियतमकी प्यारी छबि उसके पीछे छिपी है, उनका हाथ उससे संलग्न है, अगर यह बात है तो हमें प्रियतमका प्यारा हाथ देखकर उस वस्तुका आलिंगन करना चाहिये। और प्रियतम स्वयं ही स्वाँग बदलकर आये हैं तब तो कहना ही क्या है। वस्तुत: दोनों ही बातें सत्य हैं। हम इनमेंसे एकको भी स्वीकार कर लें तो हमारे लिये प्रत्येक क्षण परमानन्दसे पूर्ण हो जायगा। यह तो प्रेममार्गकी बात हुई। शरणागति और निर्भरतामें भी यही बात है। भगवान‍्के प्रत्येक विधानमें परमानन्दका अनुभव होना और सर्वतोभावसे उन्हींपर निर्भर करना शरणागतिका लक्षण है। इसमें सारी क्रियाएँ भगवत्प्रेरित होती हैं। यहाँ क्रियाहीनता नहीं है। परन्तु वह क्रिया कठपुतलीके नाचके समान है। वह किसी फलके लिये किया जानेवाला साधन नहीं है। इस निर्भरताके मार्गसे भी रोगके लिये चिन्ता करनेकी आवश्यकता नहीं है। चिन्ता तो एकमात्र चिन्तामणिकी होनी चाहिये, जिसकी चिन्तासे अन्यान्य समस्त चिन्ताएँ सदाके लिये नष्ट हो जाती हैं।

ज्ञानकी दृष्टिसे तो मायाके कार्यमें मोह होना ही अज्ञान है। अज्ञानकी अपने हाथों दी हुई गाँठको तो खोलना ही चाहिये। ज्ञान और भक्तिके समत्त्वपक्षमें भी शरीरकी बीमारीके लिये चिन्ताकी आवश्यकता नहीं। आप विद्वान् हैं, स्वयं विचार कीजिये।

भगवान‍्की दयामें विश्वास

मेरे निवेदनके अनुसार तो आपको श्रीभगवान् में, उनकी अपार करुणामें, उनके अनन्त प्रेममें, उनकी अहैतुकी सुहृदतामें और उनकी असीम दयामें विश्वास करके यह दृढ़ निश्चय कर लेना चाहिये कि ‘हमारा परम कल्याण निश्चित है’। यदि भगवान् पर विश्वास करके आप अपने कल्याणके लिये संशयहीन हो जायँगे तो आपका कल्याण निश्चित है। बस, भगवान‍्की दयापर विश्वास करनेभरकी देर है। इस विश्वासकी प्राप्तिके लिये भी भगवान‍्से करुण प्रार्थना करनी चाहिये। एक बारकी हृदयकी करुणायुक्त पुकार भगवान‍्के आसनको डुला देती है ‘जिन्हहि परम प्रिय खिन्न।’ जो उनके लिये खिन्न होता है, जिसको उनका विरह-ताप जलाये डालता है, उससे मिले बिना वे नहीं रह सकते। रोगसे घबराइये नहीं। यह रोग यदि आपके अनन्तकालीन जीव-जीवनका अन्तिम रोग बन सके तो रोगका स्वागत करना चाहिये और ऐसा बन सकना आपके हाथ है। आपके हाथसे मेरा मतलब आपके पुरुषार्थसे नहीं है आपके हृदयसे है। जो यह कह सके कि ‘मेरे हाथमें कुछ नहीं है। हे नाथ! सब कुछ तुम्हारे हाथ है, जो चाहो सो करो, तुम्हारी चीजमें मैं एतराज करनेवाला कौन। फिर मैं भी तो तुम्हारी ही चीज हूँ। एतराज करता हूँ तो तुम्हीं करते-करवाते हो। तुम्हीं तुम्हारी जानो। और जो चाहो सो करो-कराओ।’