भगवत्प्रेमकी प्राप्तिके साधन

सचमुच मनुष्य, जो अपने जीवनको भगवान‍्से विमुख बिता देता है, बड़ी भारी भूल करता है। जीवन बीत जानेपर बड़ा पश्चात्ताप होता है—हाय! जीव-जीवनमें मिला हुआ सुअवसर बड़ी बुरी तरह खो दिया। मनुष्य-जीवनका एकमात्र प्रयोजन होना चाहिये भगवान‍्की या भगवत्प्रेमकी उपलब्धि। गंगाकी धारा जैसे निरन्तर अनवरतरूपसे समुद्रकी ओर जाती है—सारी विघ्न-बाधाओंको हटाती हुई, एक लक्ष्यसे, वैसे ही हमारी चित्तवृत्तियाँ, हमारी चेष्टाएँ, हमारी चिन्ताएँ, हमारी क्रियाएँ, हमारे अनुभव, सब जाने चाहिये केवल भगवान‍्की ओर!

यह सत्य है, भगवत्प्रेमकी प्राप्तिके लिये और सारे प्रेमोंका त्याग कर देना पड़ेगा। सब कुछ उस प्रेमकी आगमें जला डालनेके लिये हँसते-हँसते तैयार हो जाना पड़ेगा और मौका पाते ही बिना चूके इस सब कुछको वैसे ही जला डालना चाहिये जैसे बिना विलम्ब तत्परतासे हम मुर्देको फूँक देते हैं। मुर्दा फूँककर तो आत्मीयताके सम्बन्धसे हम रोते हैं, परंतु भगवत्प्रेमकी आगमें जब विषयोंका मुर्दा फुँक जाता है, तब तो रोने—विषादसे और शोकसे रोनेके मूल कारण ही नष्ट हो जाते हैं। फिर कभी रोना भी होता है, तो वह बड़े ही आनन्दका कारण होता है; क्योंकि उसकी उत्पत्ति आनन्दसे ही होती है।

इसलिये केवल भगवान‍्का ही चिन्तन कीजिये। भगवान‍्से प्रार्थना कीजिये, हमारा तमाम जीवन—जीवनकी क्षुद्र-से-क्षुद्र चेष्टा भगवान‍्के लिये ही हो। पूर्ण हृदयसे हम भगवान‍्को ही भजें। दूसरेके लिये न मनमें स्थान हो और न दूसरेकी सेवामें कभी तन लगे। तन, मन, धन जो कुछ है, उन्हींका तो है। उनकी वस्तु उन्हींके अर्पण हो जाय। जो वस्तु उनके अर्पण हो जाती है, वही बचती है; वह हो जाती है अनमोल और वह हमें विपत्तिके अथाह समुद्रोंसे तार देती है।

प्रेममें खोना और अलग होना नहीं होता, खोने और अलग होनेमें भी पाना ही होता है। यही तो प्रेमका रहस्य है।