भगवत्साक्षात्कारके उपाय
प्रश्नोंके उत्तर—
(१) उत्तम लेखोंके संग्रह करनेवाले तथा उत्तम लेख लिखने- वालोंको ईश्वर-साक्षात्कार होना ही चाहिये, यह कोई बात नहीं है। लेख संग्रह करना और लिखना तो परिश्रम, दक्षता, अध्ययन, अभ्यास तथा विद्यासे भी हो सकता है। प्रभुका साक्षात्कार तो प्रेम—सच्चे प्रभु-प्रेमसे होता है। वहाँ विद्या, यज्ञ, दान, कर्म, तप आदिका इतना महत्त्व नहीं है जितना प्रेमका है। वास्तवमें सत्य प्रेम ही प्रभुका स्वरूप है।
प्रेम हरी को रूप है, वे हरि प्रेमस्वरूप।
एकहि ह्वै द्वैमें लसै, ज्यों सूरज अरु धूप॥
प्रभु-प्रेम सर्वथा अनन्य और अव्यभिचारी हुआ करता है। उस प्रेमका भाग दूसरे किसीको किंचित् भी नहीं मिलता।
मैं अपने सम्बन्धमें कुछ भी नहीं लिखना चाहता। इतना ही लिखता हूँ कि मैं अपने ऊपर भगवान्की बड़ी कृपा समझता हूँ और पग-पगपर उस परम कृपाका अनुभव करता हूँ।
(२) इस कलिकालमें भगवान्का साक्षात्कार अवश्य हो सकता है। भगवान् नित्य हैं तो उनका साक्षात्कार भी सर्वकालमें नित्य है। भगवान्के साक्षात्कारका पहला उपाय तो साक्षात्कारकी अति तीव्र और एकमात्र इच्छाका होना है। भगवान्की माधुरी मूरतिके दर्शनके लिये प्राणोंमें व्याकुलता, मनमें वेदना और अन्य सारी अभिलाषाओंका त्याग हो जाना चाहिये; परंतु यह बात सदा याद रखनी चाहिये कि अपने पुरुषार्थके बलसे भगवान्के दर्शन नहीं हो सकते। उस वस्तुकी कोई कीमत नहीं है जिसके बदलेमें वह मिल जाय। व्याकुलता, वेदना और अन्य सारी आकांक्षाओंका त्याग कोई साधन नहीं है। ये तो प्रभु-विरहीके लक्षण हैं। भगवान्के दर्शन तो उन्हींकी कृपासे होते हैं। आप जिस स्वरूपके दर्शन चाहते हैं, उसीके दर्शन हो सकते हैं। परंतु इसमें किसी मनुष्यकी सहायता क्या काम दे सकती है। आपका और आपके प्रभुका बड़ा ही निकटका सम्बन्ध है; वे आपमें हैं और आप उनमें हैं, वे आपके हैं और आप उनके हैं। इस सीधे सम्बन्धको पहचानकर, पहचाननेमें न आवे तो विश्वास करके ही उन्हें सच्चे हृदयसे पुकारिये। आपकी व्याकुल पुकारसे बड़ा काम हो सकता है। भगवान् सब स्थानोंमें सब कालमें पूर्णरूपसे विराजमान हैं। पुकार सुनते ही उत्तर देते हैं। बच्चा छटपटाता हो और माँ बाहर बैठी हो तो क्या वह बच्चेकी पुकार सुनकर कभी उसके पास आये बिना रह सकती है? पुकार बनावटी हो या माँ न हो तो दूसरी बात है। यहाँ न होनेका तो सवाल ही नहीं है; क्योंकि भगवान् तो सर्वत्र सर्वकालमें हैं ही। अब आवश्यकता केवल सच्ची पुकार की है। भगवान् यहाँपर हैं, मेरे एकमात्र प्रेमास्पद हैं। इस विश्वास और निश्चयपर दृढ़तासे आरूढ़ होकर जो भगवान्को पुकारा जाता है, वही सच्ची पुकार है। दो बातें होनी चाहिये—एक भगवान्के यहाँ होनेमें दृढ़ विश्वास, और दूसरी उन्हींको एकमात्र परम प्रेमपात्र समझना। बस, ऐसा समझकर तीव्र इच्छा और प्राणोंकी व्याकुलतासे जिस किसीने उनको पुकारा है, उसीने उनकी दिव्य झाँकीका दर्शन प्राप्त किया है। इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है। भगवान्के शृंगारकी जैसी आप ठीक समझें वैसी ही भावना करें। दर्शन होनेपर असलीका पता आप ही लग सकता है। नामका जप—जो नाम आपको प्रिय लगे उसीका करें; परंतु श्रीकृष्णभगवान्के उपासकके लिये ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ या ‘श्रीराम कृष्ण हरि’ अथवा ‘श्रीकृष्ण: शरणं मम’ ये मन्त्र बहुत उपादेय हैं। भगवान्को जल्दी आकर्षण करनेका उपाय तो प्रेम है—अनन्य प्रेम है। सारी इन्द्रियाँ उन्हींकी सेवामें लग जानी चाहिये, आरम्भमें नियमपूर्वक नाम-जप, सदा नाम जपते हुए ही कार्य करनेका अभ्यास, नियमित ध्यान करनेकी चेष्टा और ध्यानकी चेष्टा रखते हुए ही कार्य करनेका अभ्यास, असत्य, दम्भ और अभिमानका त्याग, दीनता, नम्रता, प्रेम, मैत्री आदिका ग्रहण करना—ये ही उपाय हैं।
भगवान्की कृपाका भरोसा रखना—‘उनकी कृपासे मेरा अवश्य उद्धार होगा, भगवान् मुझे जरूर दर्शन देकर कृतार्थ करेंगे’ ऐसा निश्चय रखना; भगवान् सदा मेरे साथ हैं, मैं उनके शरणागत हूँ, उनका वरद हाथ सदा मेरे मस्तकपर है, मेरे कृतकार्य होनेमें कोई सन्देह नहीं, पाप मेरे पास नहीं आ सकते। इस प्रकारकी दृढ़ भावना करना बहुत लाभकारी है।