भजन—साधन और साध्य
सप्रेम हरिस्मरण! भजन-साधनकी स्थिति लिखी, सो ठीक है। जब सत्त्वगुणका आधिक्य होता है, तब भजन अधिक होता है। रजोगुणकी अधिकतासे सांसारिक कार्योंमें विशेष मन लगता है और तमोगुणमें आलस्यकी प्रधानता रहती है। गुण अनेकों कारणोंसे घटते-बढ़ते रहते हैं—पूर्वसंस्कार, प्रारब्ध, वातावरण, अन्न, जल, संग, अध्ययन आदि अनेकों कारण हैं। विषयोंमें मन अनादि कालसे उलझा है। बड़ा अभ्यास है विषयचिन्तन और विषयसेवनका। असंख्य जीवनोंका यह अभ्यास यदि एक मानव-जीवनमें बदल जाय तो भगवान्की बड़ी कृपा समझनी चाहिये। कुछ महीनों या वर्षोंमें पूरा लाभ न हो तो निराश नहीं होना चाहिये। सत्संग, शुद्ध वातावरण, भजन आदिसे लाभ तो हुआ ही है। यह तो मानना ही पड़ेगा। यह ठीक है कि पूरी तत्परता नहीं आयी और न पूरी इच्छा ही हुई भगवान्की ओर बढ़नेकी। करते चले जाइये-भजन। तत्परता आप ही आवेगी, और जब पूरी इच्छा हो जायगी, तब तो फिर कुछ करना शेष नहीं रह जायगा। पूरी इच्छा होनेकी ही देर है। पूरी इच्छा होनेपर भगवान् तत्काल ही उसे पूरी (सफल) भी कर देते हैं। बात सुननेसे ही काम नहीं चलता, सुननेके साथ ही करना चाहिये। करते-करते कभी-न-कभी काम बन ही जायगा। बस, ऐसी बात यह एक ही है। करते जाइये और विश्वास कीजिये, निश्चय कीजिये कि काम बन ही जायगा।
राम नाम रटते रहो जब लग घटमें प्रान।
कबहूँ दीनदयाल के भनक परेगी कान॥
भजन करते-करते जब भजनका बाह्य भाव न रहकर बिलकुल आन्तरिक हो जायगा, भजनमें मन रमेगा, उसमें आनन्दकी उपलब्धि होगी, तब यथार्थ भजन होगा। एक भजन होता है साधनरूप, एक होता है साध्य। अभी साधनरूप भी पूरा नहीं हो पाया है। साधनरूप भजन करते-करते जब वह स्वाभाविक होकर अन्तरसे होने लगेगा, जब माला-नियम की जरा भी जरूरत नहीं रहेगी, अपने-आप ही भजनमें मन लगा रहेगा, तब उसे साध्यरूप प्राप्त होगा; फिर छूटेगा नहीं। यह स्थिति इसी जन्ममें हो सकती है। आपके मनमें भगवत्कृपापर—भगवान्की अचिन्त्य दया शक्तिपर विश्वास होना चाहिये। मनमें विश्वास करके जैसे बने वैसे ही लगनसे, बेलगनसे भजन करते जाइये। भगवत्कृपासे आप ही कल्याण होगा। भगवत्कृपा और भजनकी महान् शक्तिके सम्बन्धमें जरा भी संदेह न आने दें। इधर पत्र बहुत इकट्ठे हो गये, इससे संक्षेपमें ही उत्तर लिखा है।