भक्तिका स्वरूप
सप्रेम हरिस्मरण! आपका प्रेमभरा पत्र मिला। मेरे पत्रसे ही यदि आपको यह अनुमान हो गया कि न्यूनाधिक अंशमें शीघ्र ही भगवान्की दया होकर आपका उद्धार हो जायगा, तब तो मेरे पत्रका वस्तुत: बड़ा ही महत्त्व है। परंतु ऐसी बात समझमें आती नहीं। या तो आप भ्रममें हैं या मेरा मखौल कर रहे हैं। भक्तोंकी दया तो स्वाभाविक ही सबपर होती है। ‘अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्र: करुण एव च’। (गीता १२। १३) यह उनका स्वभाव है ‘कोई भक्त भी हो और वह दयामें कंजूसी भी करे।’ यह तो वैसी ही बात है कि सूर्य है परंतु उसमें प्रकाश देनेकी उदारता नहीं है। हाँ, आपने यह भूल जरूर की कि मुझ-सरीखे प्राणीके लिये भगवद्भक्त होनेका अनुमान कर लिया, इसीलिये आपको कंजूसी भी दिखायी दी; परंतु यह तो कंजूसी नहीं है—वस्तुस्थिति ही है। जो स्वयं दरिद्र हो वह किसीको क्या दे। उसे जैसे धनी माननेवाले भूलमें होते हैं, मुझे यदि आप भक्त मानते हैं तो वैसी भूल आप भी करते हैं। जबतक चित्तवृत्तिका प्रवाह सम्पूर्ण रूपसे भगवान्की ओर नहीं बहता, जबतक जीवनकी प्रत्येक क्रिया और चेष्टा केवल भगवदर्थ ही नहीं होती, जबतक जीवन भगवान्के इशारेपर नाचनेवाली कठपुतली नहीं बन जाता, जबतक जीवन प्रार्थनामय नहीं बन जाता और जबतक दैवी सम्पत्तिके गुण स्वाभाविक ही हृदयमें डेरा नहीं कर लेते, तबतक मैं कैसे मानूँ कि मुझमें भगवद्भक्ति है। हाँ, आपलोगोंकी भावनासे मुझे लाभ अवश्य हो सकता है और आपकी ऐसी भावनाके लिये मुझे आपका कृतज्ञ होना चाहिये।
बोझ भगवान् पर डाल दीजिये
‘तमाम बोझ सँभालनेवाले’ तो एकमात्र श्रीभगवान् हैं, यदि हम उनपर अपना बोझ छोड़ सकें। छोड़ दीजिये न। बिलकुल हलके हो जाइयेगा। अवश्य ही उनपर सब बोझ छोड़ देनेपर आप प्रायश्चित्तके भागी नहीं होंगे, यह निश्चित बात है। हाँ, बोझ अपने सिरसे उतारे भी नहीं और उनको सौंप दिया बतलावें, तब तो बोझसे आप मरेंगे ही। बोझा तो उतारनेसे ही भार हटेगा, कहनेमात्रसे नहीं। यह अनुभव करके देख लीजिये। सभीको अनुभव है। बोझा उतार कर दूसरेको दिया कि हलके हुए! जबतक हलके नहीं होते तबतक यह सिद्ध ही है कि बोझ सिरपर ही है, चाहे भूलसे माने नहीं।