भावुकताका प्रयोग भगवान्में कीजिये
सादर हरिस्मरण! आपका कृपा-पत्र मिला! आपके भावुक हृदयमें जो घाव है उसके लिये मुझे हार्दिक संवेदना है। परन्तु उस हृदयने जिस चीजको पकड़ा था वह कितनी नश्वर और परिणाममें दु:खदायिनी थी—इसका आप अनुभव करके भी अनुभव नहीं करना चाहते। इसके बदले आपका यह हृदय यदि श्रीश्यामसुन्दरकी मनोमोहिनी रूपमाधुरीमें फँस जाता तो कितना आनन्द होता। भावुकता तो भगवान्का दिया हुआ एक धन है। उसे यदि नश्वर चीजोंके लिये नष्ट किया जाय तो यह उसका अपव्यय ही होगा। उसे तो भगवत्स्वरूपकी नित्य और निरन्तर बढ़ती ही रहनेवाली माधुरीके आस्वादनमें लगाना चाहिये। यही उसका सदुपयोग है। जिस चीजको खोकर आपका हृदय तड़प रहा है उसकी खालके नीचे क्या था, जरा इसका तो विचार कीजिये। क्या यह ध्यान आनेसे आपको अपनी पसंदगीपर घृणा नहीं होती? आशा है आप अपनी प्रवृत्तिके पीछे न चलकर एक सच्चे परीक्षककी भाँति उसकी असलियतकी परीक्षा करेंगे और जो नष्ट होनेवाली थी और नष्ट हो भी गयी, उस तुच्छ वस्तुका ध्यान छोड़कर उसे भगवान्की निरतिशय माधुरीके आस्वादनमें लगायेंगे।
भगवान्के रूपमें अनुराग होनेके लिये इस बातकी बहुत आवश्यकता है कि आप यथासम्भव हर समय भगवन्नाम-जप करें। यदि हर समय न कर सकें तो नियमपूर्वक मालाओंकी गणना करते हुए ही करें। इससे मनकी मलिनता दूर होगी, भगवान्में अनुराग होगा, आत्माको शान्ति मिलेगी और उसके प्रति आपके हृदयमें जो अवैध अनुराग हुआ था उसका पाप भी निवृत्त होगा।