भोग-तृष्णामें दु:ख
तुम्हारा पत्र मिला। भाई दु:खोंसे घबराओ मत। दु:ख-कष्टोंके आघातसे यदि चेतना खो दोगे तो बड़ी हानि होगी। मनुष्यजीवन ही व्यर्थ हो जायगा। दु:ख-दैन्य और आधि-व्याधि भी तो भगवान्की ही सृष्टि है; विश्वास रखो, हमारे मंगलके लिये भगवान्ने इनको रचा है। इनकी चोटमें भगवान्के कोमल करस्पर्शके सुखका अनुभव करो—चपत करारी है परंतु है तो प्यारेके हाथकी। वह स्नेहसे ही मारता है, क्योंकि वह कभी स्नेहरहित निर्दय हो ही नहीं सकता। हम दिन-रात विषय-चिन्तन करते हैं, विषयोंके पीछे पागल बने हुए हैं, विषयोंके नाश और विषय-भोगोंके अभावको ही दु:ख-कष्ट समझते हैं; इसीसे सदा दु:खोंके तापसे तपते रहते हैं। यदि भगवच्चिन्तन करने लगें, आनन्दमय भगवान्का ध्यान करने लगें तो यह विषयोंका अभाव ही हमारे लिये सुखकर हो जायगा। फिर संसारका कोई भी दु:ख आनन्दमयके ध्यानमें प्रशान्त हुए हमारे चित्तमें क्षोभ उत्पन्न नहीं कर सकेगा।
भाई! यह मनुष्य-जन्म धन कमाकर भोग भोगनेके लिये नहीं है; संसारमें तुम इसलिये मनुष्य बनाकर नहीं भेजे गये हो कि तुम दिन-रात केवल विषय-भोगोंके बटोरनेकी चिन्तामें लगे रहो, क्षण-क्षणमें विषयके नाशकी भावनासे दु:खी और विषयप्राप्तिके संकल्पसे सुखी होते रहो और अपने जीवनको इन कल्पित दु:ख-सुखोंकी तरंगोंके आघातसे चूर-चूर करके अन्तमें हाथ मलते, पछताते, रोते मनुष्यजीवनसे हाथ धोकर चले जाओ। यह जीवन तो मिला है तुम्हें भगवान्को पानेके लिये। जगत्के सारे दु:ख-सुखोंमें जीवनके इस उद्देश्यको कभी न भूलो। यहाँके दु:ख वस्तुत: हैं ही क्या, जिनसे तुम इतना घबरा रहे हो? जिसको तुम दु:ख कहते हो वह विषयोंका अभाव ही तो है, परमात्माको चाहनेवाले साधक तो हँसते-खेलते जान-बूझकर विषयोंका सर्वथा त्याग करके सुखी हुआ करते हैं! मान-सम्मानके मोहमें मत फँसो। धनियोंके भोगों, महलों और मोटरोंकी ओर देखकर दिल न ललचाओ, उनके-जैसे बनकर उनके बीच बैठनेकी इच्छा न करो। इसमें अपमान, असम्मान या लांछनकी कौन-सी बात है? याद रखो, संसारके मान-सम्मानसे मण्डित, पर भगवान्को भूले हुए विषयासक्त धनीकी अपेक्षा अपमानित और लांछित वह दरिद्र बहुत ही उत्तम है जो सदा अपने चित्तको भगवान्में लगानेकी चेष्टा करता है और भगवान्का भजन करता है। याद रखो, वह विषयासक्त धनी नरकोंकी आगमें जलेगा और वह गरीब भगवान्रूपी स्नेहमयी जननीकी सुख-शान्तिभरी गोदका लाड़ला शिशु होगा। तुम इन दोनोंमें किस स्थितिको पसन्द करते हो? फिर क्यों दु:खी होते हो धनके अभावमें? क्यों अपनेको अपमानित समझते हो बहुत शानसे न रह सकनेमें? क्यों शर्माते हो गरीबी हालतमें रहने और सीधे-सादे जीवनमें! तुम समझदार हो, इस मोहको छोड़ दो। भगवान्ने तुमपर कृपा की है, जो धन-मदसे तुम्हें मुक्त कर दिया है। अब निर्द्वन्द्व होकर सुखसे भगवान्का भजन करो, तुम्हारा मंगल होगा। विश्वास करो, भगवान्का मंगलमय हाथ सदा ही तुम्हारे मस्तकपर है। विश्वासके साथ भजन करते रहोगे तो कुछ दिनोंमें इसका स्वयं अनुभव करोगे!
धनी बनने, धनियोंका-सा खर्चीला जीवन बिताने और धनियोंके गिरोहमें बैठने-उठनेकी लालसाने ही असलमें तुम्हें दु:खी बना रखा है। नहीं तो रोटी मिलती ही है, कपड़े तन ढकनेको मिल ही जाते हैं, सोने-बैठनेको जमीन है ही। फिर और क्या चाहिये? धनीलोग क्या धन होनेके कारण आध पाव अन्नके बदले दो-चार सेर खाते हैं? अथवा क्या वे साढ़े तीन हाथकी जगह दस-बीस हाथ जमीनपर सोते हैं? क्या वे रुपयोंकी गठरी बाँधे साथ लिये फिरते हैं? खाते-पीते उतना ही हैं, सोते उतनी-सी जमीनपर ही हैं। शरीर भी उनके रुपयोंसे लदे नहीं होते। फिर तुम्हारी-उनकी स्थितिमें क्या अन्तर है? हाँ, इतना अवश्य है, उनमें धनका अभिमान है, अपनेसे बड़े धनियोंसे ईर्ष्या है; और तुममें धनके अभावका विषाद है और तुम अपनेको दु:खी मानते हो। दु:खी तो वे भी हैं, क्योंकि वे भी अपनी स्थितिमें सन्तुष्ट नहीं हैं। भाई! यह मोह छोड़ दो—भजन करके जीवनको सार्थक करो। मोटा खाना, मोटा पहनना, गरीबीसे रहना, सन्तोष हो तो महान् सुखकर है और भगवान्की प्राप्तिमें बड़ा ही सहायक है।
भगवान्के लिये बड़े-बड़े राजाओंने संन्यास लिया था, तुमपर तो भगवान्की कृपा है, जो तुम्हारे विषय-भोग अपने-आप ही कम हो गये हैं। जीवननिर्वाहकी चिन्ता विश्वम्भरपर छोड़ दो—बने जितना निर्दोष कर्म करते रहो—जीवननिर्वाह हो ही जायगा। घबराओ नहीं। भगवान् पर भरोसा रखनेवाले कभी इसकी चिन्ता नहीं करते। वे तो भगवच्चिन्तन ही करते हैं। उनके लौकिक-पारलौकिक योगक्षेमको भगवान् वहन करते हैं। गीताके इस श्लोकको याद करो—
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जना: पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥
(९।२२)
भगवान् कहते हैं—‘जो अनन्य भक्त मुझको निरन्तर चिन्तन करते हुए मेरा भजन करते हैं उन नित्य मुझमें लगे हुए भक्तोंका योगक्षेम मैं स्वयं वहन करता हूँ।’
उस सुखकी कभी इच्छा न करो जो भगवान्को भुला दे और उस दु:खका स्वागत करो जो भगवान्का स्मरण करावे—
सुखके माथे सिल पड़ो जो नाम हृदैसे जाय।
बलिहारी वा दु:खकी जो छिन छिन राम रटाय॥
सच्ची बात तो यह है कि भगवान्को भुलाकर भोगोंसे कभी मनुष्य सुखी हो ही नहीं सकता। भोग तो दु:ख ही पैदा करते हैं। भगवान्ने कहा है—
ये हि संस्पर्शजा भोगा दु:खयोनय एव ते।
आद्यन्तवन्त: कौन्तेय न तेषु रमते बुध:॥
(गीता ५।२२)
‘विषयोंके साथ इन्द्रियोंका संयोग होनेपर उत्पन्न होनेवाले जो ये भोग हैं वे निश्चय ही दु:खके हेतु और आदि-अन्तवाले हैं, अर्जुन! बुद्धिमान् पुरुष उनमें प्रीति नहीं करता।’
सारा दु:ख इन भोगोंकी तृष्णामें ही है; अतएव भाई! शान्तिपूर्वक विचार करो और भोगतृष्णाका नाश करके भगवान्का भजन करो। महाभारतमें कहा है—
यच्च कामसुखं लोके यच्च दिव्यं महत्सुखम्।
तृष्णाक्षयसुखस्यैते नार्हत: षोडशीं कलाम्॥
‘संसारमें जो भोग-सुख हैं और स्वर्गादिके महान् दिव्य सुख हैं, वे कोईसे भी तृष्णा-नाशके सुखके सोलहवें हिस्सेके बराबर भी नहीं हैं।’