ब्रह्मज्ञान, पराभक्ति और भगवान्की लीला
आपका कृपापत्र मिला था। उत्तर लिखनेमें बहुत देर हो गयी, इसके लिये क्षमा करें। व्यतिरेक और अन्वय—दोनों प्रकारसे ही ब्रह्मज्ञानकी साधना होती है। आजकल अवश्य ही ऐसी प्रथा-सी हो गयी है कि लोग वेदान्तका अर्थ ही व्यतिरेक-साधना करते हैं। वे नेति-नेति कहकर जगत्को स्वप्न गन्धर्वनगर, शशशृंग और रज्जुमें सर्प आदिकी भाँति सर्वथा असत् बतलाकर सबका अस्वीकार तो करते हैं, परंतु सब कुछको एकमात्र नित्य सच्चिदानन्दघनस्वरूप मानकर ब्रह्मका स्वीकार नहीं करते। इसीलिये कभी-कभी जगत्का बाध करते-करते ब्रह्मका भी बाध हो जाता है और मनुष्यका चित्त एक जडशून्य भूमिकापर जा पहुँचता है। जगत् वस्तुत: न कभी था, न है, न होगा— यह सत्य है, परंतु इसके साथ यह भी सर्वथा सत्य है कि जगत्के रूपमें जो कुछ भी भास रहा है, वह तथा जिसको भासता है, वह भी ब्रह्म ही है। जगत्को सर्वथा वस्तुशून्य समझना ‘व्यतिरेक’ साधना है और चेतना-चेतनात्मक समस्त विश्वमें एक चेतन अखण्ड परिपूर्ण ब्रह्मसत्ताका अनुभव करना ‘अन्वय’ साधना। दोनों साधनाओंके समन्वयसे जो ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म, नेह नानास्ति किंचन’ तत्त्वकी प्रत्यक्षानुभूति होती है, वही ब्राह्मी स्थिति है।
यह श्रीभगवान्का सच्चिदानन्दमय ब्रह्मस्वरूप है। इसके जान लेनेपर ही समग्र पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्णकी प्रेम-लीला या व्रजलीलाके समझनेका अधिकार प्राप्त होता है। दिव्य हृदय और दिव्य नेत्रोंके बिना व्रजलीलाके दर्शन नहीं हो सकते। विविध साधनाओंके द्वारा हृदय जब समस्त संस्कारोंसे शून्य होकर शुद्ध सत्त्वमें प्रतिष्ठित हो जाता है और जब सम्पूर्ण विश्वमें एक अखण्ड अनन्त समरस सर्वव्यापक सर्वरूप अव्यक्त ब्रह्मकी साक्षात् अनुभूति होती है तभी प्रेमकी आँखें खुलती हैं, तभी भगवान्के लीलाके यथार्थ और पूर्ण दर्शनकी योग्यता प्राप्त होती है और तभी प्रेमी भक्तका भगवान्के साथ पूर्णैक्यमय मिलन होता है। यही ज्ञानकी परानिष्ठा है। ‘निष्ठा ज्ञानस्य या परा।’(गीता १८। ५०) श्रीभगवान्ने स्वयं कहा है—
ब्रह्मभूत: प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति।
सम: सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम्॥
भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वत:।
ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्॥
(गीता १८। ५४-५५)
‘साधक जब प्रसन्न अन्त:करण होकर ब्रह्ममें स्थित हो जाता है, जब उसे न तो किसी बातका शोक होता है और न किसी बातकी आकांक्षा ही। समस्त प्राणियोंमें उसका समभाव हो जाता है, तब उसे मेरी पराभक्ति—पूर्ण प्रेम प्राप्त होता है। और उस पराभक्तिके द्वारा मुझ भगवान्के तत्त्वको—मैं जो कुछ और जितना कुछ हूँ—वह पूरा-पूरा जान लेता है और इस प्रकार तत्त्वसे जानकर वह तुरंत ही मुझमें मिल जाता है (मेरी लीलामें प्रवेश करता है)।’
यह ब्रह्मज्ञान और यह पराभक्ति—केवल ऊँची-ऊँची बातोंसे नहीं मिलती। निरी बातोंसे तो ब्रह्मज्ञानके नामपर मिथ्या अभिमान और भक्तिके नामपर विषय-विमोहकी प्राप्ति होती है। सत्संग, साधुसेवन, सद्विचार, वैराग्य, भजन, निष्काम कर्म, यम-नियमादिका पालन और तीव्रतम अभिलाषा होनेपर इसकी प्राप्ति सम्भव है। भगवत्कृपाकी तो शरीरमें प्राणोंकी भाँति सभी साधनाओंमें अनिवार्य आवश्यकता है।