देश पतनकी ओर जा रहा है

प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। आपका पत्र मिला था, उत्तर देरसे जा रहा है। आपने अपने पत्रमें देशकी तथा धर्मकी जो शोचनीय स्थिति लिखी है, वह वस्तुत: सत्य है। पता नहीं क्या होनेवाला है, पर जिस ओर देश जा रहा है, उसे देखते तो भविष्य और भी अन्धकारमय तथा कष्टप्रद ही दीखता है। बुद्धिके विपरीत निर्णयसे प्राय: सभी कुछ विपरीत हो रहा है। माना जा रहा है—उत्थान, विकास और उन्नति। पर वस्तुत: हो रहा है—पतन, विनाश और अधोगति—‘सर्वार्थान् विपरीतांश्च’।

प्रथम तो भारतमाताका अंगच्छेद करके जो पाकिस्तान निर्माणका महापाप हुआ, वही बहुत बड़ी भूल हुई। दूसरे जब ‘इस्लामी’ राज्यके रूपमें पाकिस्तान बना तो ‘भारत’ को बहुमत समाजके नाते ‘हिंदू’ राज्य घोषित करना चाहिये था। पर दुर्भाग्यवश हमारे नेताओंकी उदार भावनासे या किसी विदेशी चक्रके परिणामस्वरूप इसे ‘सेक्यूलर’ या ‘धर्मनिरपेक्ष’ राज्य घोषित किया गया। ‘हिंदूराज्य’ कहना संकुचित माना गया। यह भी हमारी संस्कृतिके तथा हमारे धर्मके स्वरूपको न समझनेके कारण ही हुआ। नहीं तो, हिंदू-संस्कृति या हिंदू-धर्मके समान उदार तथा सर्वाश्रय, सर्वरक्षक, सर्वकल्याणप्रद, सर्वहितकर धर्म और कोई है नहीं। जो चराचर प्राणिमात्रमें एक आत्मा या एक भगवान‍्को देखता है और सबके कल्याणमें ही अपना कल्याण देखनेकी घोषणा करता है।

‘ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किंच जगत्यां जगत्।’

(ईश०उ०१)

‘इस चल जगत‍्में जो कुछ भी है, सबमें ईश्वर परिव्याप्त है।’

सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।

ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शन:॥

(गीता ६।२९)

‘सबमें समभावसे परमात्माको देखनेवाला योगयुक्तात्मा अपने आत्मामें सब भूतप्राणियोंको और सब भूतप्राणियोंमें अपने आत्माको देखता है।’

यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।

तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥

(गीता ६।३०)

‘जो मुझ (भगवान्)-को सर्वत्र देखता है और सबको मुझ (भगवान्)-में देखता है, उससे भगवान् कभी ओझल नहीं होते, वह कभी भगवान‍्से ओझल नहीं होता।’

विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि।

शुनि चैव श्वपाके च पण्डिता: समदर्शिन:॥

(गीता ५।१८)

‘विद्याविनयसम्पन्न ब्राह्मण, गौ, हाथी, कुत्ते और चाण्डाल— सबमें समभावसे आत्माको देखनेवाला पण्डित है।’

आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन।

सुखं वा यदि वा दु:खं स योगी परमो मत:॥

(गीता ६।३२)

‘जो अपने आत्माकी उपमासे अपने ही समान सर्वत्र सबके सुख या दु:खको देखता है, वह योगी सदा भगवान‍्में बर्तता है।’

खं वायुमग्निं सलिलं महीं च

ज्योतींषि सत्त्वानि दिशो द्रुमादीन्।

सरित्समुद्रांश्च हरे: शरीरं

यत् किंच भूतं प्रणमेदनन्य:॥

(श्रीमद्भा० ११।२।४१)

‘यह आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, ग्रह-नक्षत्र, प्राणी, दिशाएँ, वृक्ष-वनस्पति, नदी, समुद्र—सभी भगवान‍्के शरीर हैं। सभी रूपोंमें स्वयं भगवान् प्रकट हैं। यों समझकर वह, जो कोई भी सामने आ जाता है, उसे अनन्य भावसे भगवद्भावसे प्रणाम करता है।’

सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया:।

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दु:खभाग्भवेत्॥

‘सब सुखी हों, सब नीरोग हों, सब कल्याणका साक्षात्कार करें, दु:खका भाग किसीको न मिले।’

उमा जे राम चरन रत

बिगत काम मद क्रोध।

निज प्रभुमय देखहिं जगत

केहि सन करहिं बिरोध॥

सो अनन्य जाकें असि

मति न टरइ हनुमंत।

मैं सेवक सचराचर

रूप स्वामि भगवंत॥

‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’—

ये सब हिंदू-धर्मके सिद्धान्त हैं। कभी समस्त विश्वमें यदि शान्ति होगी तो इसी हिंदू-धर्म (जिसे ‘मानवधर्म’ ही नहीं, ‘विश्वधर्म’ या ‘आत्म-धर्म’ कह सकते हैं)-से होगी। तभी प्रत्येक मनुष्य विश्वके सभी जीवोंमें अपनेको या भगवान‍्को देखेगा, तभी सम्पूर्ण विश्व एक महान् विराट् शरीर होगा और तभी जैसे पैरसे लेकर सिरतक सारे अंगोंको हम अपना ही स्वरूप मानकर किसीका असुख-अहित नहीं चाहते, वरं सहज ही सबका सुख-हित सम्पादन करते हैं, वैसे ही विश्वका प्रत्येक मानव प्रत्येक मानवका सुख-हित सम्पादन करेगा। संत विनोबाकी ‘जय जगत्’ कल्पना तभी सार्थक होगी। यही सच्ची मानवता होगी। पर हमारे अंदरसे तो मानो सर्वहितसाधिनी यह मानवता ही निकल गयी है। इसीसे हमने ‘हिंदू-राज्य’ घोषित न करके, एक नये सम्प्रदाय ‘धर्मनिरपेक्ष’ राज्यकी धर्मनाशिनी नींव डाली है। इसीसे आज बहुमतका स्वाभाविक अधिकार होनेपर भी हम अपनेको ‘हिंदू’ कहते लजाते हैं, कहीं सम्प्रदायवादी न कहलाने लगें—इससे डरते हैं और इसीलिये आजका शिक्षित अग्रणी समाज तथा सहज ही उसका अनुगमन करनेवाली जनतामें ‘धर्मनिरपेक्षता’ के नामपर ‘धर्महीनता’ आ गयी है और परिणामस्वरूप ‘भारतीय धर्म’ तथा ‘भारतीय आचार’ में अनुदारता, संकुचितता और हीनता दीखने लगी है। एवं इसीसे हमारे शिक्षा-जगत‍्से ‘धार्मिक शिक्षा’ का नाम उठा जा रहा है। उदार हिंदू-धर्मको न समझनेके कारण हमारा ‘स्व’ अत्यन्त संकुचित, छोटी-सी सीमामें आबद्ध हो गया, इसीका परिणाम है मानवताका ह्रास! विनय, त्याग तथा प्रेमपूर्ण समझौतेसे समस्या सुलझानेके स्थानपर अनुशासनहीनता, उद्दण्डता, उच्छृंखलता, विध्वंस और हत्याका ताण्डवनृत्य! हमारा प्रत्येक क्षेत्र आज इस दुर्दशासे ग्रस्त है, इस भीषण पीड़ासे संत्रस्त है, राजनीतिक क्षेत्र विशेषरूपसे। यह अविवेककी घोर आँधी पाश्चात्य देशोंमें तो थी ही, हमारे यहाँ भी आ गयी। बस, अपने क्षुद्र ‘स्व’ के ‘अर्थ’—साधनके लिये—नीच ‘स्वार्थके’ लिये संगठन करो, आन्दोलन करो, विपक्षियोंको गालियाँ दो, बहुत रूखे तथा कड़े शब्दोंमें नये-नये दोष बताकर उनका प्रचार करो, उत्पात-उपद्रव मचाओ, आग लगाओ, लूट-पाट करो, हत्या-हिंसा करो। इससे प्रेम तथा शान्तिकी आशा कैसे की जा सकती है? और कैसे यथार्थ विकासको अवसर मिल सकता है? राजनीतिक नेताओंमें तो यह रोग भयानकरूपसे व्याप्त हो गया है और उनकी देखा-देखी आगकी तरह विद्यार्थियों तथा अन्य जनोंमें भी फैल रहा है। इसीसे आज देशमें शान्तिप्रिय, विवेकी, तपस्वी, तितिक्षु, जितेन्द्रिय, क्षुद्र-स्वार्थहीन, सबका कल्याण चाहनेवाले, उदार सत्पुरुषोंका राजनीतिक जगत‍्में अभाव होता जा रहा है, जो पतनका एक प्रधान लक्षण है।

प्राचीन कालमें राजनीति धर्म-नियन्त्रित थी। सूर्यवंशी तथा चन्द्रवंशी राजाओंका इतिहास देखिये। सारी राज्यप्रणाली तथा राज्यशासन आध्यात्मिक तपस्वी, शमदमसम्पन्न, उदारमना ऋषियोंके द्वारा अनुशासित था, जो सत्य तथा न्यायकी रक्षा करनेमें सहज ही सहायक होता था। अब तो अध्यात्मको ढकोसला और धर्मको पतनका कारण बताया जाता है। इसीसे ऐसा लगता है कि अभी हमारी जैसी स्थिति—गति है, उसके अनुसार हम पतनके गर्तकी ओर ही दौड़े जा रहे हैं।

भगवान् सबको सद‍्बुद्धि दें। सबका कल्याण करें। शेष भगवत्कृपा।