धनसे हानि और धनका सदुपयोग
आपका कृपापत्र मिला, उत्तर लिखनेमें बहुत देर हुई, इसके लिये क्षमा करें। धनकी सार्थकता उसे भगवान्की सेवामें लगानेमें है। लक्ष्मी भगवान्की सेविका हैं, उन्हें निरन्तर भगवान्की सेवामें ही नियुक्त करते रहना चाहिये। इससे लक्ष्मीकी प्रसन्नता प्राप्त होती है और उनका विस्तार होता है। लक्ष्मीपति नारायण तो प्रसन्न होते ही हैं। संसारमें जिसके पास जो कुछ भी है सब भगवान्का है। हमने जो उसपर अपना अधिकार मान लिया है यह तो हमारी बेईमानी है। हम सेवक हैं, हमारा काम है मालिककी सम्पत्तिकी रक्षा करना और उनके आज्ञानुसार, उनकी माँगके अनुसार उनकी सेवामें उसे समर्पित करते रहना। सारे जीव भगवान्के स्वरूप हैं—उनमें जहाँ जिस वस्तुका अभाव है; वहीं भगवान् उस वस्तुको चाह रहे हैं। जिसके पास वह वस्तु है, उसे चाहिये कि भगवान्की इस माँगको ठुकरावे नहीं और बड़े आदरके साथ उसपर अपना कोई अधिकार न समझकर उसे यथायोग्य अभावग्रस्त प्राणियोंके अर्पण कर दे। अभावग्रस्त प्राणियोंको दयाका पात्र न समझे और न अपनेको दाता समझकर मनमें अभिमान या उनपर अहसान करे। उन्हें भगवान्का स्वरूप समझे और भगवान्के नाते उस वस्तुपर उनका सहज अधिकार समझे। यह समझे कि मैंनें भगवान्की वस्तु भगवान्को ही दी है। जो वस्तुका स्वामी है, उसीको वह वस्तु दी जाय; इसमें हमारे लिये अभिमानकी कौन-सी बात है। इस प्रकार निरभिमान होकर धनके द्वारा भगवान्की सेवा करता रहे, इसीमें धनकी सार्थकता है और ऐसा करनेसे ही धनका उत्तम परिणाम होता है। नहीं तो, धन केवल कष्टदायक होता है और नाना प्रकारके पाप उत्पन्न करके नरकोंमें और दु:खपूर्ण योनियोंमें पहुँचा देता है।
श्रीमद्भागवतमें कहा है—
प्रायेणार्था: कदर्याणां न सुखाय कदाचन।
इह चात्मोपतापाय मृतस्य नरकाय च॥
यशो यशस्विनां शुद्धं श्लाघ्या ये गुणिनां गुणा:।
लोभ:स्वल्पोऽपि तान् हन्ति श्वित्रो रूपमिवेप्सितम्॥
अर्थस्य साधने सिद्धे उत्कर्षे रक्षणे व्यये।
नाशोपभोग आयासस्त्रासश्चिन्ता भ्रमो नृणाम्॥
स्तेयं हिंसानृतं दम्भ: काम: क्रोध: स्मयो मद:।
भेदो वैरमविश्वास: संस्पर्धा व्यसनानि च॥
एते पंचदशानर्था ह्यर्थमूला मता नृणाम्।
तस्मादनर्थमर्थाख्यं श्रेयोऽर्थी दूरतस्त्यजेत् ॥
भिद्यन्ते भ्रातरो दारा: पितर: सुहृदस्तथा।
एकास्निग्धा: काकिणिना सद्य: सर्वेऽरय: कृता:॥
अर्थेनाल्पीयसा ह्येते संरब्धा दीप्तमन्यव:।
त्यजन्त्याशु स्पृधो घ्नन्ति सहसोत्सृज्य सौहृदम्॥
(११।२३।१५—२१)
‘प्राय: देखा जाता है कि केवल इकट्ठा करनेवाले कृपणोंको धनसे कभी सुख नहीं मिलता। यहाँ तो रात-दिन धन कमाने और उसकी रक्षा करनेकी चिन्तासे जलते रहते हैं और मरनेपर धनका सदुपयोग न करके उसे पापकर्मका कारणरूप बनानेके कारण घोर नरकोंमें गिरते हैं। जैसे थोड़ा-सा भी कोढ़ सर्वांगसुन्दर शरीरके सौन्दर्यको बिगाड़ देता है; वैसे ही धनका तनिक-सा लोभ भी यशस्वियोंके निर्मल यशमें और गुणवानोंके सद्गुणोंमें कलंक लगा देता है। धन कमानेमें, कमाकर उसे बढ़ानेमें, रक्षा करनेमें, भोगनेमें और नाश हो जानेमें दिन-रात परिश्रम, भय, चिन्ता और भ्रममें डूबे रहना पड़ता है। १ चोरी, २ हिंसा, ३ झूठ बोलना, ४ दम्भ—दिखाऊ श्रेष्ठता, ५ काम, ६ क्रोध, ७ गर्व, ८ मद—अहंकार, ९ भेदबुद्धि, १० वैर, ११ अत्यन्त प्यारोंमें भी अविश्वास, १२ स्पर्धा, १३ लम्पटता, १४ जुआ और १५ शराब—ये पंद्रह अनर्थ मनुष्योंमें धनसे ही पैदा होते हैं। इसलिये अपना कल्याण चाहनेवाले पुरुषोंको ऐसे अर्थ नामधारी अनर्थ करनेवाले अर्थको दूरसे ही प्रणाम कर लेना (त्याग देना) चाहिये। स्नेह-बन्धनमें बँधकर सदा एक रहनेवाले सगे भाई-बन्धु, स्त्री-पुत्र, माता-पिता और सगे-सम्बन्धियों आदिमें भी धनकी कौड़ियोंके कारण इतनी फूट पड़ जाती है कि वे एक-दूसरेके वैरी बन जाते हैं। थोड़े-से धनके लिये क्षुब्ध हो जाते हैं, उनके क्रोधकी आग भड़क उठती है। वे आपसमें लड़ने लगते हैं और पुराने प्रेम-बन्धनको तोड़कर सहसा एक-दूसरेका गला काटनेको तैयार हो जाते हैं।
‘इसपर टीका-टिप्पणी व्यर्थ है। धनासक्ति, धनकामना, धनप्राप्ति और धनसंग्रहका यह परिणाम जगत्में आज प्रत्यक्ष हो रहा है! यह सत्य है—धन आवश्यक है, धनकी सार्थकता भी है और धन कमाना भी चाहिये, परन्तु कमाना चाहिये उसे भगवान्की सेवाके लिये, भगवान्के नियमोंकी रक्षा करते हुए, भगवान्के अनुकूल उपायोंसे ही; और धनके प्राप्त होनेपर उसका भगवान्के आज्ञानुसार सदुपयोग करना चाहिये। अपने धनपर जो गरीबोंका अधिकार समझता है और उनके हितार्थ उसका यथायोग्य उपयोग करता है, वही सच्चा धनी है। शेष धनसंग्रह करनेवाले लोग तो धनके रूपमें पापका संग्रह करते हैं और सदा दरिद्र ही रहते हैं। धनका वही उपयोग उत्तम है, जो परिणाममें शान्ति, प्रसन्नता और सुख उत्पन्न करनेवाला हो। जो किसीको कुछ देकर पछताता है, वह या तो धनका दुरुपयोग करता है अथवा धनासक्तिमें फँसा हुआ प्राणी है, जो धनके नामपर पाप कमाता रहता है!
मेरी स्पष्ट बातोंसे आपको दु:ख नहीं होगा, ऐसी आशा है। और यह भी आशा है कि आप अबसे अपनेको धनका स्वामी नहीं, परन्तु ईमानदार तथा सावधान ट्रस्टी समझेंगे और नियमानुसार उसका सदुपयोग करनेकी चेष्टा करेंगे।