दोषनाशके उपाय
आपका लम्बा पत्र मिला। आपने ‘काम’ और ‘मान’ इन दो दोषोंकी बात लिखी, सो मेरी समझमें ये दोष आपमें ही नहीं, न्यूनाधिकरूपमें अधिकांश लोगोंमें रहते हैं। वेष-भूषा तो बहुत मोटी बात है; भजन, कीर्तन, ध्यान, वैराग्यका स्वाँग, वेष-भूषाका त्याग और अन्य भाँति-भाँतिके त्याग भी कहीं-कहीं ‘काम’ और ‘मान’ के लिये ही होते हैं। स्त्रियाँ समझें—ये बड़े भक्त हैं, महात्मा हैं, त्यागी हैं और हमारी ओर आकर्षित हों; लोग समझें ये वैराग्यवान्, ध्यानके अभ्यासी सत्पुरुष हैं और हमें सम्मान प्राप्त हो; इसलिये शुभ चेष्टाएँ की जाती हैं। फिर स्त्रीको देखनेपर, मनमें विकार होनेमें और मान न मिलनेपर विषाद होनेमें कौन बड़ी बात है? इसका कारण है—विषयासक्ति। मनुष्य बहुत ही कम समय अपने चित्तको वस्तुत: भगवच्चिन्तनमें लगाता है। उसका अधिकांश समय केवल विषय-चिन्तनमें जाता है। जैसा चिन्तन होता है वैसे ही पदार्थोंसे वह घिर जाता है। विषय-चिन्तन ही अशुभ-चिन्तन है; इसीसे उसकी अशुभमें आसक्ति उत्पन्न होती और दृढ़तर होती जाती है। अशुभ-चिन्तनके समान मनुष्यका पतन करनेवाला और शत्रु नहीं है। इसीसे सारे दोष उत्पन्न होते हैं। अतएव मनुष्यको निरन्तर बड़ी सावधानीके साथ ऐसी चेष्टा करनी चाहिये जिसमें मन भगवच्चिन्तनके अभ्यासमें लगे। इसके लिये दृढ़ निश्चय और लगनकी आवश्यकता है। भगवत्कृपापर विश्वास और आत्मशक्तिका दृढ़ निश्चय हो जानेपर कोई भी बाधा टिक नहीं सकती। लोग विषय-चिन्तन करते हैं, मनमें विषयोंके प्रति आसक्ति है और यह निश्चय नहीं है कि भगवान्की अनन्त शक्ति सदा हमारी रक्षा करनेके लिये हमारे साथ मौजूद है। इसीसे वे काम, क्रोध और मानादि शत्रुओंके सामने आनेपर उनके वश हो जाते हैं और उनसे हारकर पतनके गड्ढेमें गिर जाते हैं। हार पहले ही माने हुए हैं—क्योंकि मनमें दृढ़ निश्चय नहीं है। भगवान्की रक्षा करनेवाली चिरसंगिनी आत्मशक्तिपर विश्वास नहीं है। आत्मशक्तिपर विश्वास हो और यह दृढ़ धारणा हो कि यह आत्मशक्ति भगवान्की है—हमारी बुद्धि, हमारे मन, प्राण, इन्द्रियाँ सब आत्मशक्तिके द्वारा भगवान्के साथ सम्बन्धित हैं—भगवान् ही इनके स्वामी हैं और भगवान्के अनन्त शक्तिमान् होनेसे उनकी यह शक्ति भी अनन्त शक्तिमती है, तो फिर कभी काम, मानादि आक्रमण न कर सकें—वे दूरसे ही भाग जायँ, चित्तमें तो कभी प्रवेश करें ही नहीं। यह स्मरण रखना कि जो वस्तु भगवान्के समर्पित हो गयी, वह सुरक्षित हो गयी। उसको भगवान् ही दूसरे रूपमें बदलना चाहें तो भले ही बदल दें—किसी अन्य शक्तिकी ताकत नहीं कि उसकी ओर देख भी सके। अम्बरीषका देह भी भगवान्के अर्पण था, इससे दुर्वासाकी क्रोधाग्नि उसका कुछ भी न बिगाड़ सकी। घोररूपा कृत्याके सामने अम्बरीष स्थिर खड़े रहे—न पीछे हटे, न बचनेकी कोशिश की, न उसपर कोई प्रहार ही किया। भगवान्की शक्तिने अपने-आप कृत्याका काम समाप्त कर दिया। भगवान्की शक्ति सुदर्शनके रूपमें पहले ही अम्बरीषके देहकी रक्षाके लिये नियुक्त थी। इसीलिये थी कि अम्बरीषने उसको पहलेसे ही भगवान्की सम्पत्ति बना दिया था। मेरी समझसे दोषोंसे बचनेका एक प्रधान उपाय यह भी है कि जिन अंगोंमें ये दोष आते हैं, उन्हें भगवान्के अर्पण कर दिया जाय और उनके द्वारा भगवान्की ही सेवा की जाय। अपने प्रयत्नमें त्रुटि न हो और अपनी ईमानदारीमें—अर्पणकी इच्छामें त्रुटि न हो फिर जो कमी होगी उसे भगवान् अपनी शक्तिसे आप ही पूरा कर लेंगे। और जो चीज भगवान्की हो जायगी, उसकी रक्षा पाप-तापसे वे आप ही करेंगे। अत: भगवान् पर निर्भर किया जाय—पूरे भरोसेके साथ। यह निश्चित बात है कि यदि हमारी निर्भरता सच्ची होगी तो भगवान्की सहायता हमें ठीक समयपर, ऐन मौकेपर अवश्य ही प्राप्त होगी। हाँ, प्राप्त होगी उसी अनुपातसे, जिस अनुपातमें हमारी निर्भरता होगी। सच्ची बात तो यही है। आप इतना काम कीजिये—
१—यथासाध्य चेष्टा कीजिये कि अधिक-से-अधिक समय चित्तके द्वारा भगवच्चिन्तन हो।
२—भगवान्की कृपापर भरोसा बढ़ाइये।
३—मनमें दृढ़ निश्चय कीजिये कि भगवान् सदा अपनी पूरी शक्तिके सहित मेरे साथ हैं। मुझपर कामादिके आक्रमण नहीं हो सकते। यदि कभी ये दोष सामने आवेंगे तो निश्चय ही भगवान्की शक्तिसे मारे जायँगे।
४—मन, बुद्धि, इन्द्रिय, अहंकार आदि सभीको प्रतिक्षण सावधानीके साथ भगवान्के अर्पण करते रहिये—जिस समय वे सच्ची पूरी बात देखेंगे, उसी क्षण इनको ग्रहण कर लेंगे।
५—भगवान्की कृपापर निर्भर होनेका अभ्यास कीजिये।
ये पाँच बातें कीजिये, फिर देखिये कितनी जल्दी इन दोषोंका नाश होता है। और भी उपाय हैं—
आत्मशक्तिके द्वारा पूरा निश्चय—दृढ़ संकल्प कर लिया जाय कि ये दोष मुझमें नहीं आ सकते, तो फिर कम आवेंगे। आवें तब आत्माके द्वारा उनका तिरस्कार—अपमान किया जाय, उनपर तीव्र प्रहार किये जायँ, उन्हें एक क्षणके लिये भी सुखसे न टिकने दिया जाय, तो वे आना छोड़ देंगे। दूरसे सताना भी छोड़ देंगे। आत्माकी मूक अनुमतिसे ही पाप होते हैं, जो आत्माकी कल्पित दुर्बलता और दृढ़ अध्यवसायके अभावसे इन्हें मिलती रहती है। यदि आत्मा बलपूर्वक पापोंको रोकना चाहे तो पाप नहीं आ सकते।
आपसे हो सके तो एक उपाय बहुत उत्तम है—प्रतिज्ञा कर लीजिये प्रतिक्षण लगातार नाम-जपकी। नाम-जपका तार यदि जाग्रत्-अवस्थामें कभी नहीं टूटेगा तो निश्चय ही ये सब पाप मर जायँगे। यह महात्माओंका अनुभूत सरल प्रयोग है।
आपने लिखा कि ‘मैं कई बार सुन चुका हूँ, परन्तु दोष छूटते ही नहीं—इस बार ऐसा बल दीजिये जिससे मैं इन्हें फटकार बतला सकूँ।’ इसका उत्तर यह है—वस्तुत: कई बार सुननेसे कुछ विशेष लाभ नहीं होता। कहनेवाला यदि हृदयसे कहता हो अर्थात् जो बात वह कहता हो वह उसके द्वारा अनुभूत आचरित और सत्य हो, एवं सुननेवाला भी हृदयसे सुनता हो—उसके चित्तमें पूर्ण श्रद्धा हो और उसी प्रकार करनेका दृढ़ संकल्प हो और सुनते ही वैसा ही करने लगे तो एक ही बारके सुननेसे काम हो जाता है। हम सुनते हैं मुर्दा वाणीको—मुर्दा मनसे, इसीसे इसका कोई असर नहीं होता। बल्कि अधिक सुनते-सुनते मन और कान बहरे हो जाते हैं। सुनना चाहिये जीवित मनसे और कहना भी चाहिये जीवित मनसे। जीवित मन वही है जिसके साथ परम श्रद्धा है और सत्यरूपसे आत्माके दृढ़ अध्यवसायका संकल्प है और जिसके करनेके लिये प्राण आतुर हैं।
रही मेरे बल देनेकी बात सो......मेरे पास एक ही बल है— ‘हारेको हरिनाम’ और आपसे भी यही कहता हूँ, उसका आश्रय लीजिये। सारे पाप-तापोंसे छुड़ानेमें वह पूरा समर्थ है। अधिक क्या लिखूँ।