दु:खमें भी भगवान‍्की दया

मनुष्यकी दृष्टि अत्यन्त सीमित है। वह अपनी आँखोंके सामने घटनेवाली कुछ घटनाओंको ही केवल देख सकता है। उसकी दृष्टिमें केवल स्थूल देह ही सत्य है और वह ममता-मोहके चक्‍करमें फँसकर चाहता है कि मेरा और मेरे सम्बन्धियोंके स्थूल शरीर मुझसे अलग न हो। यदि कहीं उसकी इच्छाके विपरीत कोई घटना घटित हुई तो वह बहुत दु:खी होता है और विक्षिप्त होकर भगवान‍्की सत्ता, महत्ता और उनकी दयालुतापर ही आक्षेप करने लगता है। परंतु इससे भगवान‍्की दयापूर्ण दृष्टिमें कोई अन्तर नहीं पड़ता। वे सदासे सबका कल्याण करते आये हैं और कल्याण ही करते रहते हैं।

इसे इस प्रकार समझिये—कोई दयालु स्वामी अपने किसी कर्मचारीको कोई उच्चपद देना चाहता हो और इसीके लिये उसे एक स्थानसे दूसरे स्थानके लिये परिवर्तन कर रहा हो—परन्तु वह कर्मचारी और उसके घरवाले उच्चपद पानेकी बात न जानें, उस परिवर्तनका विरोध करें और रोयें-पीटें, पर दयालु स्वामी उनके रोने-गिड़गिड़ानेपर तनिक भी ध्यान न देकर अपनी दयाकी वर्षा करता है। आपके सुपुत्र होनहार थे। उनके कर्म उज्ज्वल और साधना ऊँची थी—इस बातका यह प्रबल प्रमाण है कि अन्तिम श्वासतक उन्होंने भगवन्नामका उच्चारण किया। इससे सिद्ध होता है कि भगवान‍्ने उन्हें इससे भी उत्तम स्थिति देनेके लिये आपसे अलग किया और अपने पास बुलाया। भगवान् अपनी वस्तुको अपना लें, उसे बुलाकर सर्वदाके लिये अपने पास रख लें—यह हमारे लिये प्रसन्नताकी बात होनी चाहिये। परन्तु हमारी ममता, हमारे जन्म-जन्मान्तरोंका अभ्यस्त मोह हमें बार-बार कष्ट देता है और वही हमें इस बातके लिये प्रेरित करता है कि हम भगवान‍्की इच्छा पूरी न होने दें—अपनी इच्छा पूरी करें।

केवल आपके पुत्रको सुख हो और आपको दु:ख—यह भी इस घटनाका उद्देश्य नहीं समझना चाहिये। क्योंकि आपकी पूरी ममता भगवान् पर ही होनी चाहिये। जैसे भगवान् जीवके अनन्य प्रेमी हैं वैसे ही वे उसके अनन्य प्रियतम भी हैं। वे चाहते हैं कि जीव मुझसे ही हँसे, मुझसे ही खेले और मुझसे ही प्रेम करे। जब जीव उनके दिये हुए खिलौनोंसे इतना उलझ जाता है कि स्वयं उनको भी भूल जाता है तब वे उन खिलौनोंको छीनकर उसकी पूरी ममता अपनी ओर आकर्षित कर लेते हैं। इस घटनाको पूर्णरूपसे आपके और आपके पुत्र—दोनोंके लिये ही हितकर समझिये। इसपर विचार कीजिये और अपने एकमात्र सुहृद्, पूर्ण हितैषी भगवान‍्के प्रेम और श्रद्धासे सराबोर होकर उनके भजनमें लगे रहिये।