दु:खनाशके साधन
प्रेमसहित राम-राम, तुम्हारा पत्र मिले बहुत दिन हो गये। मैं समयपर उत्तर नहीं दे सका, इसका मुझे स्वयं बड़ा खेद है। तुम कभी यह न समझना कि तुम्हारी ‘वर्तमान स्थिति मुझसे कोई लापरवाही करवा रही है। प्रेमकी पवित्र भावनापर किसी बाह्य स्थितिका कोई प्रभाव नहीं पड़ सकता। धन-सम्पत्ति, रूप-गुण, मान-प्रतिष्ठा आदिकी न्यूनाधिकताको लेकर जिस प्रेममें घटा-बढ़ी होती है, वह तो प्रेमका अति बाह्य विकृत रूप है। यथार्थमें वह प्रेम ही नहीं है। धन-मानके कारण जो प्रेम होता है, वह तो एक प्रकारका स्वार्थसाधनमात्र है। अपने पास धन न रहे या अपना कहीं अत्यन्त अपमान हो जाय तो क्या कोई अपने प्रति प्रेम कम कर देता है? जहाँ आत्मभाव है वहीं वास्तविक प्रेम है और उस प्रेममें किसी अवस्थाविशेषसे कोई रूपान्तर हो नहीं सकता। जो अपना है, वह तो अपना ही है, चाहे वह कितना ही दरिद्र और अपमानित क्यों न हो। सत्पुरुष तो यह कहते हैं कि विपत्तिकालमें सौगुने प्रेमका व्यवहार होना चाहिये—‘बिपतिकाल कर सतगुन नेहा।’
यह सत्य है कि प्रेमका स्वरूप जो कुछ मैंने लिखा है, यही यथार्थ नहीं है; प्रेम तो अनिर्वचनीय है और अनुभवस्वरूप है। भगवान्की कृपासे ही उसकी प्राप्ति होती है। अपने मनमें प्रेमके जिस स्वरूपकी कल्पना होती है, वह भी कहने और लिखनेसे परेकी चीज है और जो कुछ लिखा जाता है, उतना भी वस्तुत: पालन नहीं किया जाता। इसलिये यही कहना पड़ता है कि मैं प्रेमकी केवल बातें ही बनाता हूँ, हूँ उससे बहुत दूर। इतनेपर भी तुम्हारे प्रति मेरे मनमें जैसे कुछ भाव हैं, उनको देखते यह निश्चयपूर्वक कहा जा सकता है कि तुम्हारी वर्तमान स्थितिने मुझको तुम्हारी ओर अधिक खींचा है, दूर नहीं किया। तथापि यह तो मेरी भूल ही है कि मैंने महीनोंतक तुम्हारे पत्रका उत्तर नहीं दिया। मेरी इस भूलके कारण तुम्हारे मनमें सन्देहकी छाया दीख पड़े तो कोई आश्चर्य नहीं। मेरा यह कसूर है और इसके लिये मैं कम पश्चात्ताप नहीं कर रहा हूँ।
सचमुच लौकिक दृष्टिसे तुम्हारी अवस्था बड़ी शोचनीय है।
कुछ ही दिनों पहले जो सब ओरसे सम्मान और इज्जत पाता रहा हो, अभावका अनुभव होते ही अभावको मिटा देनेवाली वस्तुएँ सहज ही जिसके सामने आ जाती हों तथा धन-मान और आराममें ही जिसकी जिंदगी कटी हो—कुछ ही दिनों बाद उसका अपमानित, अभाव-पीड़ित और समाजमें लांछित होना उसे कैसी भयानक व्यथा देनेवाला होता है, इसे भुक्तभोगी ही जानता है। जिसकी ऐसी अवस्था कभी नहीं हुई वह तो इसका अनुमान ही नहीं कर सकता।
परंतु भैया! यह सारी व्यथा है मोहजनित ही। तुम जो पहले थे, वही अब हो और वही आगे भी रहोगे। मनुष्य मोहवश कुछ वस्तुओंमें और स्थितियोंमें ममत्व कर बैठता है और ममत्वकी वे चीजें और स्थितियाँ जब दूर हट जाती हैं, तब वह दु:खी होता है। संसारके इन अनित्य पदार्थोंमें यदि मनुष्य ममत्वका आरोप न करे तो इनके आने-जानेमें उसे हर्ष और शोकके विकारसे सहज ही छुटकारा मिल जाय।
कुछ ऐसी चीजें थीं, ऐसी अवस्थाएँ थीं—जिनको तुमने अपनी मान लिया था, आज वे तुम्हारे अधिकारमें नहीं हैं, इसीसे तुम अपनेको दु:खी मान रहे हो। दु:खी उस समय भी थे, क्योंकि उस समय तुम्हें नित्य नये-नये अभावोंका अनुभव हुआ करता था और तुम उन्हींकी पूर्तिमें सदा व्यस्त रहते थे। अवश्य ही उन अभावोंका स्वरूप आजके अभावों-जैसा न था—दूसरा था।
संसार तो दु:खालय है ही। इसमें एक आनन्दस्वरूप भगवान्को छोड़कर और कहाँ सुख है? धनी हो या गरीब, सम्मानित हो या अपमानित, जबतक उसके जीवनकी गति भगवान्की ओर नहीं होती, तबतक किसी भी अवस्थामें उसे सुख नहीं मिल सकता, वह जलता ही रहता है। दु:खकी यन्त्रणामयी ज्वालासे बचनेका एक ही उपाय है—‘भगवान्की ओर जीवनको मोड़ देना।’ मनुष्य इसे तो करता नहीं, और कर्मोंकी नयी-नयी गाँठ बाँधकर पुरानी गाँठोंको सुलझाना और खोलना चाहता है, फलत: और भी बँध जाता है।
रही धननाश और अपमानादिकी बात, सो ये तो हमारे ही पूर्वकृत कर्मोंके फल हैं, जो हमें कर्मबन्धनसे मुक्त करनेके लिये आते हैं। इस दृष्टिसे भी दु:ख न मानकर सुख ही मानना चाहिये।
कर्मफलका समस्त विधान दयामय भगवान्के द्वारा होता है, उनका कोई भी विधान अमंगलकारी हो नहीं सकता। इस दृष्टिसे भी हमें धननाश और अपमानादिकी अवस्थामें दु:खी न होकर सुखी होना चाहिये।
भगवान् हमारे परम सुहृद् हैं, परमप्रियतम हैं और हमारी सारी व्यवस्थाको जानकर हमारे मंगलके लिये ही उचित व्यवस्था करते हैं। इसीमें उन्हें आनन्द मिलता है। हमारा मंगल हो और आनन्द उन्हें मिले, इससे अधिक सुखकी बात क्या हो सकती है। इस दृष्टिसे भी हमें सुखी ही होना चाहिये।
जगत्के निमित्त और उपादान-कारण भगवान् ही हैं। यह सारा जगत् उन्हींमें और उन्हींसे स्थित, निर्मित और संचालित है। प्रत्येक विधानमें आत्मगोपन करके वस्तुत: वे विधाता ही प्रकट हैं। अतएव हमें प्रत्येक स्थितिमें उनके दर्शन पाकर, उनका स्पर्श पाकर, उनमें मिलकर सुखी होना चाहिये।
यह सब कुछ भगवान्की मंगलमयी लीला है, जो एक अखण्ड, सनातन, दिव्य भगवदीय नियमके अनुसार नित्य होती रहती है। यह अनादि है, अनन्त है और पहलेसे ही भलीभाँति रची हुई है। इसमें कोई बात अनहोनी नहीं, अनियमित नहीं और बेठीक नहीं। सब ठीक, सब नियमित, सब कल्याणमयी और सब अवश्यम्भावी है। होता वही है जो पहलेसे उनका रचा हुआ है—‘होइहैं सोइ जो राम रचि राखा।’ फिल्ममें सब कुछ पहलेसे ही अंकित है; बस, सामने आना है। जो सामने आवे, वही ठीक है। उसीमें भगवान्की मधुर लीलाके दर्शन कर सुखी होना चाहिये।
वेदान्तवाले तो जगत्को असत् —रज्जुसर्पवत्, आकाश-कुसुमवत् और स्वप्नवत् मिथ्या ही मानते हैं। मिथ्यामें दु:ख कैसा? इस दृष्टिसे भी अज्ञानसे दीखनेवाले जगत्को वस्तुत: सच्चिदानन्दघन ब्रह्ममय देखकर सुखी ही होना चाहिये।
यदि तुम भलीभाँति विचार करो, आजतकके इतिहासपर ध्यान दो तथा साथ ही पारमार्थिक दृष्टिसे देखो तो तुम्हें पता लगेगा कि धन और मानादिमें वस्तुत: सुख-शान्ति और कल्याण है ही नहीं। यहाँ मैं पद्मपुराणसे प्रसिद्ध महर्षियोंके कुछ वचन उद्धृत कर रहा हूँ, इनसे तुम अच्छी तरह इस विषयको समझ सकोगे—
अकिञ्चनत्वं राज्यं च तुलया समतोलयत्।
अकिञ्चनत्वमधिकं राज्यादपि हितात्मन:॥
(वसिष्ठ)
‘अकिंचनता और राज्य दोनों काँटेपर रखकर तौले गये थे (परमज्ञानी महर्षियोंने दोनोंके परिणामपर विचार करके निश्चय किया था) तो यही पता लगा था कि अपना हित चाहनेवाले मनुष्यके लिये राज्यकी अपेक्षा अकिंचनता (धनका सर्वथा अभाव) ही श्रेष्ठ है।’
अर्थसम्पद्विमोहाय विमोहो नरकाय च।
तस्मादर्थमनर्थाख्यं श्रेयोऽर्थी दूरतस्त्यजेत्॥
यस्य धर्मार्थमर्थेहा तस्यानीहा गरीयसी।
प्रक्षालनाद्धि पङ्कस्य दूरादस्पर्शनं वरम्॥
(कश्यप)
‘अर्थ-सम्पत्ति विशेषरूपसे मोहका कारण है और विमोहसे नरककी प्राप्ति होती है। इसलिये कल्याण चाहनेवाले मनुष्यको इस अनर्थरूप अर्थका दूरसे ही त्याग कर देना चाहिये। जो धर्मके लिये अर्थकी इच्छा करता है, उसके लिये भी अनिच्छा ही श्रेष्ठ है। कीचड़ लपेटकर उसे धोनेकी अपेक्षा दूर रहकर उसे न छूना ही अच्छा है।’
इहैवेदं वसु प्रीत्यै प्रेत्य वै कुण्ठितोदयम्।
तस्मान्न ग्राह्यमेवैतत्सुखमानन्त्यमिच्छता॥
(अत्रि)
‘धन यहीं अच्छा लगता है, परलोकमें तो यह उन्नतिमें प्रतिबन्धक है, इसलिये अनन्त सुख चाहनेवाले पुरुषके लिये यह किसी प्रकार भी ग्रहण करनेयोग्य नहीं है।’
अनन्तपारा दुष्पूरा कृष्णा दु:खशतावहा।
अधर्मबहुला चैव तस्मात्तां परिवर्जयेत्॥
(भरद्वाज)
‘(धन-मानकी) तृष्णाका पार नहीं है और उसका पूरा होना भी दु:साध्य है। तृष्णामें सैकड़ों दु:ख हैं और बहुत-से अधर्मोंसे युक्त है। इसलिये तृष्णाका त्याग ही करना चाहिये।’
न जातु काम: कामानामुपभोगेन शाम्यति।
हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्द्धते॥
कामानभिलषन्मोहान्न नर: सुखमेधते।
श्येनालयतरुच्छायां व्रजन्निव कपिंजल:॥
चतु:सागरपर्यन्तां यो भुङ्क्ते पृथिवीमिमाम्।
तुल्याश्मकांचनो यश्च स कृतार्थो न पार्थिव:॥
(विश्वामित्र)
विषयोंके भोगसे कामनाकी शान्ति कदापि नहीं होती। आगमें घीकी आहुति देनेपर जैसे वह एक बार बुझती-सी दीखती है परंतु तुरन्त ही बढ़ जाती है, इसी प्रकार विषयभोगसे कामना बढ़ जाती है। मोहवश भोगोंकी कामना करनेवाला मनुष्य कभी सुख नहीं पा सकता, उसकी वैसी ही दशा होती है जैसे बाजके घोंसलेवाले पेड़की छायामें जानेवाले कपिंजल पक्षीकी होती है। (इसलिये अनर्थमयी अर्थकी इच्छा न रखकर सन्तोष करना चाहिये।) एक मनुष्य, जो चारों समुद्रोंतककी पृथ्वीके राज्यका उपभोग करता है तथा दूसरा जो सुवर्ण और पत्थरको समान दृष्टिसे देखता है—इन दोनोंमें दूसरा (सोने और पत्थरको समान समझनेवाला) ही कृतार्थ होता है; विशाल भूमण्डलका स्वामी राजा नहीं।’
सन्तोषामृततृप्तानां यत्सुखं शान्तचेतसाम्।
कुतस्तद्धनलुब्धानामितश्चेतश्च धावताम्॥
असन्तोष: परं दु:खं सन्तोष: परमं सुखम्।
सुखार्थी पुरुषस्तस्मात्सन्तुष्ट: सततं भवेत्॥
(गौतम)
‘सन्तोषरूपी अमृतके पानसे तृप्त शान्तचित्त पुरुषोंको जो सुख है, धनके लोभसे इधर-उधर दौड़नेवालोंके नसीबमें वह सुख कहाँ है। असन्तोष ही परम दु:ख है और सन्तोष ही परम सुख है। इसलिये सुख चाहनेवाले पुरुषको (भगवान्की दी हुई प्रत्येक स्थितिमें) सदा सन्तुष्ट रहना चाहिये।’
अपमानात्तपोवृद्धि: सम्मानाच्च तप:क्षयः।
अर्चित: पूजितो विप्रोऽदुग्धा गौरिव गच्छति॥
अमृतस्येव तृप्येत अपमानस्य योगवित्।
विषवच्च जुगुप्सेत सम्मानस्य सदा नर:॥
‘अपमानसे तपकी वृद्धि और सम्मानसे तपका क्षय होता है। जिसका दूध निकाल लिया गया है, उस गायकी तरह वह अर्चा-पूजा करानेवाला (बहुत बड़े मानको प्राप्त) विप्र भी निस्सार होकर ही चला जाता है। योगवित् पुरुषको अपमानसे अमृतपानकी तरह तृप्त होना चाहिये; और सम्मानको विषके समान हेय समझना चाहिये।’
धन और मानकी वृद्धिसे मनुष्यमें प्राय: असंयम, दर्प, अभिमान, क्रोध, लोभ, हिंसा, भोगपरायणता, कुसंगति, असूया और अविवेक आदि दोष बढ़ जाते हैं। धन और मानके अभावमें इन दोषोंका ह्रास होता है। सच्ची बात कड़वी तो लगती है, परंतु प्रसंग आ पड़नेपर कहे बिना काम नहीं चलता। बात यह है कि धन और मानके अभावमें ही जीवका कल्याण है, इनकी प्राप्ति और वृद्धिमें नहीं। बुरा न मानना भैया! मुझे तो सूर्यके प्रकाशकी-ज्यों यह स्पष्ट दीख पड़ता है कि श्रीभगवान्ने बड़ी कृपा करके तुमको यह स्थिति दान की है। निश्चय ही परिणाममें यह तुम्हारा कल्याण करनेवाली होगी। यदि तुम अभी इन बातोंका अनुभव कर सको तो तुम्हारे सब दु:ख आज ही दूर हो सकते हैं।
‘नहिं दरिद्र सम दुख जग माहीं’ ‘सबसे कठिन जाति अवमाना’ आदि वाक्य परमार्थदृष्टिवाले पुरुषके लिये नहीं हैं। भगवान्के दिये हुए दारिद्रॺ और अपमानको सिर चढ़ाकर अम्लान मनसे इन्हें स्वीकार करना चाहिये। यदि ये हमारे मोहको भंग कर दें और हमें भगवान्की ओर मोड़ दें तो इनसे अधिक हमारा हितकारी और कौन होगा? भैया! अपनी इस स्थितिमें श्रीभगवान्की कृपाका प्रत्यक्ष अनुभव करो। व्यर्थके आराम और भोगोंको भूल जाओ। धीर पुरुष तो अपने जीवनके उद्देश्यकी सिद्धिके लिये तपरूपमें विपत्तियोंको बुलाया करते हैं और सहर्ष उनका स्वागत और स्वीकार कर उन्हें चिपटाये रखते हैं। ध्रुवने भीषण तप किया था। पार्वतीने शिवकी प्राप्तिके लिये घोर तपस्या की थी। हजारों उदाहरण हैं। अभी हालमें महाराणाप्रताप राज्य-सुखको त्यागकर अपने व्रतपालनके लिये सुकुमार बाल-बच्चोंको साथ लिये, वन-वन भटके और पहाड़ोंकी गुफाओंमें रहे थे।
‘लोग सम्मान करते थे, अब नहीं करते; धनसे अमुक-अमुक आराम थे, अब नहीं हैं। खाने-पीनेको बढ़िया पदार्थ और रहनेको सुन्दर स्थान मिलते थे, अब वैसे नहीं मिलते हैं; बहुत लोग मिलनेको आते थे, अब कोई बोलना भी नहीं चाहता; देखते ही सब मुँह मोड़ लेते हैं।’ यही तो दु:खका रूप है। विचार करके देखो—इसमें कल्पनाके सिवा और कहाँ दु:ख है? दु:खकी कल्पनाको दूर करके—उसके स्थानमें भगवत्कृपाजनित कल्याणकी कल्पना करो। भगवान्ने ही तुमको यह त्यागपूर्ण अकिंचन स्थिति प्रदान की है। तुम सारे झंझटोंसे मुक्त हो गये। बड़ा बोझा उतर गया तुम्हारे सिरसे। चेष्टा करनेपर भी एकान्त मिलना मुश्किल था। अपने-आप ही सब प्रपंच मिट गये। अब बस, निष्कण्टक होकर भजन करो।
तुम्हारा प्रत्येक प्रयत्न जो असफल हो रहा है, इसमें भी भगवान्की कृपाका ही हाथ समझो। वे तुम्हें मोहमें डालनेवाली स्थितिसे निकालकर अपनी सेवामें रखना चाहते हैं। यह सब उसीका आयोजन है। ऐसा न होता तो पता नहीं, धन-मानका मद तुम्हें कहाँ—भगवान्से कितनी दूर—ले जाकर किस नरकमें पटकता। बड़े भाग्यवान् और भगवान्के कृपापात्र हो तुम—जो इस समय भगवान्की कृपादृष्टिके पात्र हो रहे हो और भगवान्ने तुम्हारे कल्याणका कार्य अपनी कृपाशक्तिके हाथोंमें सौंप दिया है। श्रीभगवान्ने स्वयं कहा है—
यस्याहमनुगृह्णामि हरिष्ये तद्धनं शनै:।
ततोऽधनं त्यजन्त्यस्य स्वजना दु:खदु:खितम्॥
स यदा वितथोद्योगो निर्विण्ण: स्याद् धनेहया।
मत्परै: कृतमैत्रस्य करिष्ये मदनुग्रहम्॥
(श्रीमद्भा० १०। ८८। ८-९)
(भोगोंमें रचा-पचा हुआ जो मनुष्य मेरा भजन नहीं कर पाता, चाहनेपर भी नहीं कर पाता। धन-मानरूपी विघ्न जिसे बार-बार मेरे कल्याणकारी मार्गसे हटाते और दु:खदायी भोगोंमें लगाते रहते हैं, उसे निर्विघ्न करके अपनी ओर खींचनेके लिये) ‘जिसपर मैं अनुग्रह करता हूँ, उसके सारे धनको धीरे-धीरे हर लेता हूँ। तब उस निर्धन और अनेकों दु:खोंसे दु:खित मनुष्यको उसके स्वजन-बान्धवलोग छोड़ देते हैं। (कोई भी घरवाले, मित्र-बन्धु या सगे-सम्बन्धी उससे प्रेमका और सहानुभूतिका सम्बन्ध नहीं रखना चाहते) वह कहीं धनके लिये उद्योग भी करता है; तो मेरी कृपासे उसके सारे उद्योग निष्फल हो जाते हैं, फिर वह सब ओरसे निराश होकर मेरे परायण रहनेवाले भक्तोंके साथ मित्रता करता है (वे उसे प्रेमसे अपनाते हैं) तब मैं उसपर अनुग्रह करता हूँ (वह सब दु:खोंसे छूटकर मुझको पा जाता है)।’