‘अर्थ’ और ‘अनर्थ’
आपका कृपापत्र मिला। आपने ‘अर्थ’ और ‘अनर्थ’ का भाव एवं अनर्थकी निवृत्तिका उपाय पूछा सो आपकी कृपा है। ‘अर्थ’ शब्दका अर्थ है ‘प्रयोजन’। मनुष्यका प्रयोजन—उसकी चाह एक ही है, वह है असीम अपार अनन्त नित्य और पूर्ण आनन्द। इस आनन्दके बिना उसकी कभी तृप्ति नहीं होती। इसीलिये वह हर अवस्थामें अभावका अनुभव करता है। ऐसा पूर्ण आनन्द है एकमात्र भगवान् में। भगवान् ही विशुद्ध आनन्दमय हैं। अतएव भगवत्प्राप्ति ही वस्तुत: ‘अर्थ’ है। यही परमार्थ है। एक संतने कहा है कि गीताका अर्थार्थी भक्त वस्तुत: इसी ‘अर्थ’ की कामना करता है। इसके विपरीत जो कुछ भी है सो सभी ‘अनर्थ’ है चाहे वह संसारकी दृष्टिमें अच्छा हो या बुरा। भगवान्को भूलकर जो कुछ भी पुण्य-पाप, सुख-दु:ख, लाभ-हानि, हर्ष-शोक, प्राप्ति-विनाश और जीवन-मरण है—सभी अनर्थरूप है। भगवान्की प्राप्ति होती है भगवत्तत्त्वका यथार्थ रहस्य जानकर उनकी भक्ति करनेसे—‘भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया’ (गीता ८। २२) ‘भक्त्याहमेकया ग्राह्य:’ ‘भक्त्या मामभिजानाति’ (गीता १८। ५५) आदि भगवद्वाक्य प्रसिद्ध हैं। भक्ति जब पूर्णत्वको प्राप्त हो जाती है तब इसीका नाम पराभक्ति या भगवत् -प्रेम हो जाता है। इस प्रेममें भगवान्के साथ कभी विछोह नहीं होता। यह प्रेम ही पूर्ण परम अर्थ है इससे विपरीत ले जानेवाले या इस ओर आनेमें बाधा पहुँचानेवाले जितने भी काम या पदार्थ हैं वे सभी अनर्थ हैं। ‘माधुर्यकादम्बरी’ में चार प्रकारके अनर्थ बतलाये गये हैं—
(१) दुष्कृतोत्थ—(पापोंके परिणामस्वरूप पापमूलक विषयासक्ति बढ़ जाती है। उससे मनुष्य सांसारिक भोगोंकी प्राप्ति तथा उनके भोगमें इतना उन्मत्त हो जाता है कि वह नित्य नये-नये पाप करनेमें गौरवका अनुभव करता है।)
(२) सुकृतोत्थ—(पुण्योंके फलस्वरूप मनुष्यको धन, जन, सम्मान, आराम आदि अनित्य भोगोंकी प्राप्ति होती है। तब उनमें उसकी ममता और आसक्ति इतनी बढ़ जाती है कि वह उन्हींमें रमा रहता है तथा केवल उन्हींके भरण-पोषणकी चिन्ता करता है। भगवान्की ओर प्रवृत्त नहीं होना चाहता।)
(३)अपराधोत्थ—(भगवान्के नाम और स्वरूप आदिका अपराध होनेपर साधनमें विघ्न और प्रत्यवाय (विपरीत फल) उत्पन्न हो जाते हैं।)
(४) भवत्युत्थ—(भक्तिमें लगनेपर मनुष्यकी कुछ प्रतिष्ठा बढ़ती है, लोगोंमें उसके प्रति श्रद्धा उत्पन्न होने लगती है। इधर उसकी भोगवासना अभी मिटी नहीं, ऐसी हालतमें वह धन, मान, पूजा, प्रतिष्ठा आदिको स्वीकार करके उन्हींमें रत हो जाता है।)
इन चारों ही प्रकारके ‘अनर्थों’ की निवृत्ति, सत्संग, सत्कर्म, नाम-जप और विनय तथा श्रद्धापूर्ण भगवत्सेवनसे होती है। अनर्थनिवृत्ति पाँच प्रकारकी मानी गयी है—‘एकदेशवर्तिनी’, ‘बहुदेशवर्तिनी’, ‘प्रायिकी’, ‘पूर्णा’ और ‘आत्यन्तिकी’। स्वल्प सत्संग आदिके प्रभावसे कुछ अंशमें जो अनर्थ छूटते हैं, यह ‘एकदेशवर्तिनी’ निवृत्ति है। अधिक अंशमें छूटनेपर उसे ‘बहुदेशवर्तिनी’ कहते हैं। बहुत ही थोड़े-से अनर्थ शेष रह जायँ इसे ‘प्रायिकी’ कहते हैं और अनर्थोंकी पूर्ण निवृत्ति हो जानेपर उसे ‘पूर्णा’ कहते हैं। पूर्णा निवृत्ति हो जानेपर भी जबतक भगवत्प्राप्ति नहीं हो जाती तबतक अनर्थका बीज नष्ट नहीं होता, इसलिये अभिमानजनित भक्तापराध आदि दुष्कर्मोंसे पुन: ‘अनर्थ’ की उत्पत्ति हो सकती है। परंतु ‘आत्यन्तिकी’ निवृत्ति होनेपर ‘अनर्थ-बीज’ का नाश हो जाता है। वह आत्यन्तिकी निवृत्ति है— प्रेमस्वरूप भगवान्की प्राप्ति। यह पंचम यथार्थ पुरुषार्थ है और यही यथार्थ परमार्थ है।