गम्भीरता या प्रसन्नता
पत्र मिला, धन्यवाद! निवेदन यह है कि एक ऐसी भी आध्यात्मिक स्थिति होती है और वह अच्छी होती है जिसमें अन्तरमें उदासी न होनेपर भी चेहरेपर उदासी-सी मालूम होती है। यह वैराग्यकी एक अवस्था है। परंतु चेहरेकी उदासी और गम्भीरता ही आध्यात्मिक उन्नति या स्थितिकी पहचान नहीं है। गम्भीरता होनी चाहिये भीतर, इतनी कि जो किसी भी प्रकारसे किसी भी बाह्य परिस्थितिमें चित्तको क्षुब्ध न होने दे। बाहर तो सदा प्रसन्नता और हँसी ही होनी चाहिये। समुद्रका अन्तस्तल कितना गम्भीर होता है, उसमें कभी बाढ़ आती ही नहीं, परंतु उसके वक्ष:स्थलपर असंख्य तरंगें नित्य-निरन्तर नाचती रहती हैं—अठखेलियाँ करती रहती हैं। इसी प्रकार हृदय विशुद्ध, विकाररहित, स्थिर, गम्भीर और भगवत्संयोगयुक्त होना चाहिये, और बाहर उनकी विविध लीलाओंको देख-देखकर पल-पलमें परमानन्दमयी हँसीकी लहरें लहराती रहनी चाहिये। मुर्दे-सा मुर्झाया हुआ मुँह किस कामका? जिसे देखते ही देखनेवालोंका हृदय हँस उठे, मुखकमल खिल उठे, मुख-मुद्रा तो ऐसी प्रसन्न ही होनी चाहिये।
इसका यह अर्थ भी नहीं कि विनोदके नामपर मर्यादारहित अनर्गल, असत्य प्रलाप किया जाय। उसका तो त्याग ही इष्ट है।