गीतोक्त सांख्ययोग एवं कर्मयोग

गीताके पाँचवें अध्यायके चौथे, पाँचवें श्लोकोंके सम्बन्धमें आपने लिखा कि इन श्लोकोंका जो भावार्थ है, उससे मैं पूर्णतया सहमत हूँ, किन्तु शब्दोंसे नहीं। और गीता-जैसे ग्रन्थमें तो शब्द भी निरापत्ति ही होने चाहिये। इसके उत्तरमें यही निवेदन है कि यदि मूलके शब्द ही आपत्तिजनक प्रतीत होते हैं, तब भावार्थका कोई मूल्य नहीं है। परन्तु गीतामें एक भी शब्द आपत्तिजनक नहीं है, ऐसा विद्वानों और गीताके मर्मज्ञोंका मत है।

गीताका प्रधान लक्ष्य है भगवान‍्की उपलब्धि। उसके मुख्य दो भाग हैं—ज्ञानयोग (सांख्य, संन्यास) और कर्मयोग, ज्ञानयोग सांख्ययोगियोंके लिये और कर्मयोग कर्मयोगियोंके लिये है (गीता ३। ३)। लक्ष्य दोनोंका एक ही है—भगवत्प्राप्ति। चौथे श्लोकमें भगवान् कहते हैं—‘सांख्य और ‘योग’ को बालक (अज्ञजन) पृथक्-पृथक् बतलाते हैं, पण्डित नहीं। (दोनोंमेंसे) एकमें भी सम्यक् प्रकारसे स्थित पुरुष दोनोंके फलको प्राप्त होता है।’ पाँचवेंमें कहते हैं— ‘सांख्ययोगियोंद्वारा (सांख्यमार्गसे) जो स्थान (फल) प्राप्त किया जाता है, कर्मयोगियोंद्वारा (कर्मयोगसे) भी वही प्राप्त होता है। (अतएव) जो सांख्य और योगको एक देखता है, वही (यथार्थ) देखता है।’ यह शब्दार्थ है। भावार्थ भी इसीके अनुकूल होना चाहिये। ध्यान देकर देखनेपर स्पष्ट प्रतीत होता है कि भगवान् दोनों निष्ठाओंको एक नहीं बतलाते, दोनोंको फलरूपमें एक बतलाते हैं। निष्ठाएँ तो पृथक्-पृथक् हैं ही। और फल एक होनेसे, समान फल देनेवाली—एक बतलाना उचित ही है।

रही सांख्ययोग और कर्मयोगके अर्थकी बात, सो इसमें कुछ मतभेद है। जहाँतक मेरी समझ है, न तो गीताके सांख्ययोगका अर्थ स्वरूपत: सर्वकर्मत्याग है और न कर्मयोगका अर्थ केवल लोक-कल्याणके लिये ही किये जानेवाले कर्म हैं। युद्ध-सरीखा कर्म भी कर्मयोगके अन्दर आ सकता है।

सांख्ययोगका अर्थ है मन-वाणी-शरीरसे होनेवाले समस्त कर्मोंमें कर्तृत्वाभिमानका त्याग और शरीर तथा संसारमें अहंता-ममताका त्याग। गुणोंके द्वारा गुणोंमें व्यवहारका ही नाम कर्म है और कर्मयोगका अर्थ है—फल और आसक्तिका त्याग करके भगवदर्पण-बुद्धिसे प्रत्येक कर्तव्य-कर्मका सम्पादन। यज्ञ, दान, तप, स्वाध्याय, देशसेवा, धर्मसेवा, कुटुम्बपालन, शरीर और परिवारका पोषण आदि सभी कर्मयोग हो सकते हैं—यदि वे फल और आसक्तिका त्याग करके केवल भगवदर्थ किये जायँ। इसी प्रकार ये सभी कर्म अकर्मस्वरूप (सर्वथा त्याग किये हुए) समझे जाते हैं, यदि कर्तापनके अभिमानसे रहित पुरुषके द्वारा सम्पन्न हों। सांख्य अभेदका साधन है, कर्मयोग भेदका। दोनोंका लक्ष्य और फल एक ही है—‘भगवान‍्की उपलब्धि।’ कर्मयोगी तो कर्म करता ही है। सांख्ययोगीके लिये भी कर्मका निषेध नहीं है। (पाँचवें अध्यायका ८वाँ, ९वाँ श्लोक देखिये) ‘इन्द्रियाँ ही अपने-अपने अर्थोंमें बरत रही हैं, मैं कुछ भी नहीं करता।’ इस प्रकार कर्तृत्वाभिमानका त्यागी सांख्ययोगी देखना, सुनना, स्पर्श करना, सूँघना, खाना, आना-जाना, ग्रहण-त्याग करना आदि सभी कर्म कर सकता है। ऐसी स्थितिमें यह नहीं कहा जा सकता कि कर्मयोगीका आदर्श नि:स्वार्थ है और सांख्ययोगीका स्वार्थमय। दोनोंका ही ध्येय एक है। भावभेदसे निष्ठाभेदमात्र है। कठिनाईकी ओर देखें तो गीताके मतसे कठिनाई सांख्ययोगीके मार्गमें अधिक है—क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम्।’ (गीता १२। ५) भगवान‍्ने स्पष्ट ही इस मार्गमें क्लेशोंकी अधिकता बतलायी है। आत्मोन्नतिका प्रयत्न दोनों करते हैं—अन्त:करणकी शुद्धि ही आत्मोन्नति है। अन्त:करण शुद्ध होनेपर मानसिक और शारीरिक सभी क्रियाओंमें ऊँचापन, श्रेष्ठभाव और स्वाभाविक लोक-कल्याण आ जाता है। यह याद रखना चाहिये कि लोकका अकल्याण अशुद्ध अन्त:करणवाले मनुष्योंद्वारा ही हुआ करता है। इस अन्त:करणशुद्धिके बिना दोनोंमेंसे किसी भी मार्गमें आगे नहीं बढ़ा जा सकता। इसलिये इनमें छोटा-बड़ा कोई-सा नहीं है। हाँ, कठिनता और सुगमताके खयालसे छोटे-बड़ेका भेद है और इस अर्थमें भगवान‍्ने कर्मयोगको ज्ञान (सांख्य) योगसे श्रेष्ठ बतलाया भी है—

संन्यास: कर्मयोगश्च नि:श्रेयसकरावुभौ।

तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते॥

(गीता ५।२)

यह बात भूलसे मानी जाती है कि लोक-कल्याणके लिये कर्म करनेवाला ही कर्मयोगी है। अवश्य ही व्यक्तिगत स्वार्थसे ऊँचे उठकर लोक-कल्याणार्थ कर्म करनेवाला श्रेष्ठ है, परंतु यदि उसमें भोगमयी लोक-कल्याणकी कामना है, तो वह भी गीतोक्त कर्मयोगी नहीं है। आजकल तो यहाँतक माना जाता है कि जो किसी प्रकारसे भी आर्थिक भोग-सम्बन्धी सुविधा कर सके, वही कर्मयोगी है। इधर भगवान् कहते हैं—‘जय-पराजय, हानि-लाभ, सुख-दु:खको समान समझकर युद्ध करो (२। ३८), प्रिय और अप्रियकी प्राप्तिमें हर्षित और उद्विग्न न होनेवाला ही स्थिरबुद्धि है (५। २०)। सब कर्मोंको अध्यात्मचित्तसे मुझमें समर्पण करके आशा, ममता और सन्तापसे रहित होकर युद्ध करो (३। ३०)। जितने संस्पर्शज भोग हैं, सभी दु:खयोनि हैं। (दु:खोंको उपजानेवाले हैं) तथा अनित्य हैं। बुद्धिमान् पुरुष उनमें रमता ही नहीं (५। २२)।’ कहाँ तो यह आदर्श और कहाँ धन-मान आदिकी प्राप्तिके लिये—भगवान‍्को प्राप्त करनेकी कल्पना भी न करके दिन-रात आसक्तिपूर्ण कर्म करना! जो दु:खयोनि है, जिनमें बुद्धिमान् पुरुष भी प्रीति नहीं रखते, उन भोगोंमें आसक्ति तथा कामना भी रहे—चाहे वह समष्टिके लिये ही हो—और वह गीतोक्त कर्मयोगी—निष्काम कर्मयोगी भी कहलावे! यह तो कर्मयोगकी विडम्बनामात्र है। गीतोक्त कर्मयोगका स्वरूप है—

योगस्थ: कुरु कर्माणि संगं त्यक्त्वा धनंजय।

सिद‍्ध्यासिद‍्ध्यो: समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥

(गीता २।४८)

‘हे अर्जुन! आसक्तिको त्यागकर और सिद्धि-असिद्धिमें समबुद्धि होकर, योगमें स्थित होकर (भगवान‍्में चित्त जोड़कर) कर्तव्य कर्म कर। समत्व ही योग कहलाता है।’

गीतोक्त कर्मयोगी कर्तव्यप्राप्त धन, मान आदिके लिये भी कर्म करता है, परंतु उसका लक्ष्य इस कर्मके द्वारा भगवत्प्राप्ति है। उसका ध्येय भगवान् है, भोग नहीं; इसीसे भगवान‍्ने कहा है—

‘निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वर:॥’

(गीता ३। ३०)

इसी प्रकार गीतोक्त ‘संन्यासी’ भी केवल कर्मत्यागी हो, सो बात नहीं है। वह भी ‘सर्वभूतहिते रता:’ रहता है। लक्ष्य उसका भी भगवत्प्राप्ति है। थोड़ी देरके लिये यह मान लें कि गीतोक्त संन्यासीका अर्थ कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करके एकान्तमें साधन करनेवाला संन्यासी है, तो क्या उसको हम स्वार्थी कहेंगे? सारा संसार भगवान‍्से भरा है, भगवान‍्में है, भगवान‍्से निकला है, फिर भगवान‍्को प्रसन्न करनेके लिये साधन करनेवाला क्या प्रकारान्तरसे जगत्-रूप भगवान‍्को सुखी करनेकी चेष्टा नहीं कर रहा है? राग-द्वेषका त्याग करके एकान्तमें साधन करनेवाला महापुरुष जगत‍्को अपने शुभ विचारोंसे, मंगलमयी कल्याण-भावनासे अपने अस्तित्वमात्रसे जो कल्याणदान करते हैं, वह तो अनुपम होता है। आज हमारे देखनेमें ऐसे संन्यासी प्राय: नहीं हैं तो इसका अर्थ यह नहीं कि यह चीज ही खराब है। गीतोक्त कर्मयोगी ही कितने देखनेमें आते हैं? और जो ऐसे हैं, वे अपनेको ऐसा सिद्ध करने आपके-हमारे सामने क्यों आने लगे? उन्हें हमारे द्वारा प्रमाण प्राप्त करनेकी क्या आवश्यकता है? मेरा तो यह विनम्र निवेदन है कि वैसे एकान्तवासी महात्मा संन्यासी स्वाभाविक ही जगत‍्का अशेष कल्याण करते हैं। वे बड़ी ही ठोस चीज हमें देते हैं। अतएव यदि इस अर्थमें भी कर्मयोगीको और सांख्ययोगीको एक मानें तो कोई हर्ज नहीं है, यद्यपि गीताका यह भाव बिलकुल ही नहीं मालूम होता।

पत्र बहुत लम्बा हो गया। मेरी अन्तमें हाथ जोड़कर प्रार्थना है—मैं गीताका मर्मज्ञ नहीं हूँ। साधारण विद्यार्थीमात्र भी हूँ या नहीं, नहीं कह सकता। ऐसी स्थितिमें मैंने जो कुछ लिखा है, यह ठीक ही है—ऐसा मेरा दावा नहीं मानना चाहिये। आपके प्रश्नोंका उत्तर देनेके प्रसंगमें प्रसंगवश कुछ और भी लिख गया हूँ। इसके लिये आप-सरीखे सहृदय पुरुषसे क्षमाकी प्रार्थना और आशा करना अनुचित न होगा।