गोपीभावकी साधना

आपने गोपीभावकी साधना और युगलसरकारकी प्राप्तिके साधन पूछे हैं, आपके सन्तोषके लिये यह उत्तर लिखा गया है। सन्तोष होगा या नहीं, यह तो भगवान् जानें, आपकी जिज्ञासाके कारण इतना समय भगवच्चिन्तनमें बीता, इसके लिये तो मैं आपका कृतज्ञ हूँ ही।

गोपीभावमें प्रधान बातें पाँच हैं—

१—श्रीभगवान‍्के स्वरूपका पूर्ण ज्ञान, २—श्रीभगवान‍्में प्रियतमभाव, ३—श्रीभगवान‍्के प्रति सर्वस्व अर्पण, ४—निजसुखकी इच्छाका पूर्ण त्याग, ५—भगवत्प्रीत्यर्थ जीवनधारण।

आनन्दचिन्मयरस-प्रतिभाविता, श्रीकृष्णप्रेमरसभावितमति, श्रीकृष्णगतप्राणा, श्रीकृष्णसुखपरायणा, व्रज गोपियोंमें ये पाँचों बातें पूर्णरूपसे थीं।

जिनका मन विषयोंमें फँसा है, जिन्हें भौतिक सौन्दर्य अपनी ओर खींचता है, जिनकी भोग्यपदार्थोंमें आसक्ति है; शरीर और शरीरसम्बन्धी वस्तुओंपर जिनकी ममता है, जो शरीरके आराम और विषय-भोगकी चाह रखते हैं और जिनका जीवन-प्रवाह निरन्तर भगवान‍्की ओर नहीं बहने लगा है, वे लोग गोपीभावकी साधनाके अधिकारी नहीं हैं। ऐसे लोग भगवान‍्के अप्राकृत प्रेम-तत्त्वको सर्वोच्च दिव्य-मधुररसको स्थूल कामतत्त्व या लौकिक आदिरस ही समझेंगे और भगवान् तथा श्रीगोपीजनोंका अनुकरण करने जाकर भयानक नरककुण्डमें गिर पड़ेंगे!

जिनके हृदयमें भोगोंसे सच्चा वैराग्य है, जिनका चित्त काम-सुखसे हट गया है और जिनकी इन्द्रियाँ अन्तर्मुखी होकर चिन्मय भगवद्- रसका आस्वादन करनेके लिये आतुर हैं—वे ही महाभाग पुरुष गोपीभावका अनुसरण कर सकते हैं।

श्रीभगवान‍्की तीन स्वरूपा शक्तियाँ हैं—संवित्, सन्धिनी, और ह्लादिनी। भगवान‍्का मधुर अवतार ह्लादिनी नामक आनन्दमयी प्रेमशक्तिके निमित्तसे ही हुआ करता है। वे ह्लादिनी शक्ति साक्षात् श्रीराधिकाजी ही हैं। समस्त गोपीजन उन ह्लादिनी शक्तिकी ही अनन्त विभिन्न प्रतिमूर्तियाँ हैं। उनका जीवन स्वाभाविक ही भगवदर्पित है। उनकी प्रत्येक क्रिया स्वाभाविक ही भगवत्सेवारूप होती है। उनकी कोई भी चेष्टा ऐसी नहीं होती—जिसमें भगवत्प्रीति-सम्पादनके सिवा, श्रीकृष्ण-राधिकाके मिलन-सुखकी साधनाके सिवा अन्य कोई उद्देश्य हो। उनके बुद्धि, मन, इन्द्रिय, शरीर आत्माके सहित सदा श्रीकृष्णके ही अर्पण हैं। उनके द्वारा निरन्तर श्रीकृष्णकी ही सेवा बनती है। कभी भूलकर भी उनका चित्त दूसरी ओर नहीं जाता, दूसरे विषयको ग्रहण नहीं करता, वे श्रीकृष्णमें ही सुखी रहती हैं, उनको सुखी देखकर ही परमसुखका अनुभव करती हैं। उनका निज सुख श्रीकृष्णसुखमें ही समाया रहता है। श्रीमद्भागवतमें कहा है—

तन्मनस्कास्तदालापास्तद्विचेष्टास्तदात्मिका:।

तद‍्गुणानेव गायन्त्यो नात्मागाराणि सस्मरु:॥

(१०।३०।४४)

उनके चित्त भगवान‍्के चित्त हो गये थे अर्थात् उनके चित्तोंमें भगवद्भावके सिवा अन्य किसी संकल्पका उदय ही नहीं होता था। वे उन्हींके लिये उनकी सारी चेष्टाएँ होती थीं, इस प्रकार वे भगवन्मयी हो गयी थीं और भगवान‍्का गुण-गान करते हुए उन्हें अपने घरोंकी भी सुधि नहीं रही थी। वे जब घरोंका काम करतीं, तब भी वे अपने मनमें, अपनी वाणीमें और अपनी आँखोंमें निरन्तर श्रीभगवान‍्का ही स्पर्श पाती थीं, उन्हींके दर्शन करती थीं। उनके लिये कहा गया है—

या दोहनेऽवहनने मथनोपलेप-

प्रेङ्खेङ्खनार्भरुदितोक्षणमार्जनादौ।

गायन्ति चैनमनुरक्तधियोऽश्रुकण्ठ्यो

धन्या व्रजस्त्रिय उरुक्रमचित्तयाना:॥

(श्रीमद्भा० १०।४४।१५)

उन व्रजगोपियोंको धन्य है, जिनका चित्त निरन्तर श्रीकृष्णमें ही लगा रहता है और जो गाय दुहते, धान आदि कूटते, दही बिलोते, आँगन लीपते, बच्चोंको झूला झुलाते, रोते हुए बच्चोंको पुचकारकर चुप कराते और नहलाते-धुलाते तथा घरोंको झाड़ते-बुहारते—सभी कामोंके करते समय श्रीकृष्णमें ही तन्मय रहकर सजल नेत्रोंसे और गद‍्गद कण्ठसे निरन्तर उन्हींके गुण गाया करती हैं।

इसीलिये भगवान‍्के अत्यन्त प्रिय भक्त उद्धवजीने गोपीप्रेमकी महान् महिमासे प्रभावित होकर व्रजमें लता-गुल्म बननेकी अभिलाषा करते हुए गोपियोंके चरणरजकी वन्दना की है—

आसामहो चरणरेणुजुषामहं स्यां

वृन्दावने किमपि गुल्मलतौषधीनाम्।

या दुस्त्यजं स्वजनमार्यपथं च हित्वा

भेजुर्मुकुन्दपदवीं श्रुतिभिर्विमृग्याम्॥

या वै श्रियार्चितमजादिभिराप्तकामै-

र्योगेश्वरैरपि यदात्मनि रासगोष्ठ्याम्।

कृष्णस्य तद्भगवतश्चरणारविन्दं

न्यस्तं स्तनेषु विजहु: परिरभ्य तापम्॥

वन्दे नन्दव्रजस्त्रीणां पादरेणुमभीक्ष्णश:।

यासां हरिकथोद‍्गीतं पुनाति भुवनत्रयम्॥

(श्रीमद्भा० १०।४७।६१—६३)

‘अहो! कैसा सौभाग्य हो मेरा, यदि मैं वृन्दावनमें कोई बेल, वनस्पति या झाड़ियोंमेंसे कोई हो जाऊँ, जिनपर इन व्रज-बालाओंके चरणकी धूलि पड़े। धन्य हैं ये व्रज-गोपियाँ! जिन्होंने बड़ी कठिनतासे छोड़नेयोग्य बन्धुओंको और सनातन (मर्यादा) धर्मको त्यागकर उस मुकुन्द-पदवीका अनुसरण किया है, जो श्रुतियोंद्वारा खोजी जाती हैं (परंतु जिसकी प्राप्ति नहीं होती)। अहो! साक्षात् लक्ष्मीजी जिनकी पूजा करती हैं, तथा ब्रह्मा आदि आप्तकाम योगेश्वरगण भी जिनका अपने चित्तमें ही चिन्तन करते हैं (परंतु पाते नहीं), भगवान् श्रीकृष्णके उन चरणकमलोंको रास-साधनाके समय जिन्होंने अपने वक्ष:स्थलपर रखकर अपने विरह-तापको बुझाया। जिनका हरिकथामय गान तीनों लोकोंको पवित्र करनेवाला है, नन्दव्रजकी उन गोपरमणियोंकी चरण-धूलिको मैं बार-बार प्रणाम करता हूँ।’

गोपियोंका हृदय प्रतिक्षण यही पुकारा करता है, ‘कैसे हमारे प्रियतम श्रीकृष्णकी इच्छा पूर्ण हो! ये धन-धाम, ये मन-प्राण, ये देह-गेह कैसे प्यारे कन्हैयाको सुख पहुँचानेवाले हों। अरे, ये तो उन्हींकी सामग्री है, फिर यह चाहा भी कैसे जाय कि इनको लेकर, इन्हें अपनी सेवामें लगाकर तुम सुखी हो जाओ। दी तो जाती है वह वस्तु, जो अपनी होती है यहाँ तो सब कुछ उन्हींका है, अहा! मुझपर भी तो उन्हींका एकाधिकार है। फिर मैं कैसे कहूँ, तुम मुझे ले लो, मुझे अपनी सेवामें लगा लो। क्या मुझपर मेरा अधिकार है? बहुत ठीक, अब कुछ नहीं कहना है, तुम यन्त्री हो—मैं यन्त्र हूँ; तुम नचानेवाले हो, मैं कठपुतली हूँ। तुम्हारी जो इच्छा हो, वही करो बस, वही करो।’

कैसी ऊँची स्थिति है। इन्हें किसी भी वस्तु, किसी भी स्थितिकी जरा भी परवा नहीं है। शास्त्रोंमें आठ फाँसियाँ बतलायी गयी हैं, जिनमें बँधा हुआ मनुष्य निरन्तर कष्ट भोगता रहता है और प्रेममय, आनन्दमय भगवान‍्की ओर अग्रसर नहीं हो सकता—

घृणा शंका भयं लज्जा जुगुप्सा चेति पंचमी।

कुलं शीलं च मानं च अष्टौ पाशा: प्रकीर्तिता:॥

‘घृणा, शंका, भय, लाज, जुगुप्सा, कुल, शील और मान ये आठ जीवके पाश हैं।’ अब गोपियोंमें देखिये—इनमेंसे कहीं एक भी उनमें ढूँढ़े नहीं मिलता। वे इन आठ मजबूत फाँसियोंको तोड़कर स्वतन्त्र हो चुकी हैं। इसीसे वे सर्वस्व त्यागकर अपने जीवनकी गतिको सब ओरसे फिराकर भगवान् श्रीकृष्णमें लगा सकी हैं। मनुष्य भगवत्कृपासे प्राप्त अनुकूल साधना और तत्परताके फलस्वरूप जब इस अवस्थापर पहुँच जाता है, तब वह गोपीभावसे सम्पन्न होकर तुरंत ही भगवान‍्को प्राप्त करनेके लिये अभिसार करता है। फिर वह कुल-शील, लज्जा-भय, मानापमान, धर्माधर्म और लोक-परलोककी चिन्ता छोड़कर पागलकी तरह ‘हा प्रियतम, हा प्राणप्यारे, हा मेरे मनमोहन’ तुम्हारी मधुर छबिको देखे बिना अब एक पल भी मुझसे रहा नहीं जाता, मेरा एक-एक निमेष अब युगके समान बीत रहा है, पुकारता हुआ दौड़ पड़ता है अपने जीवनकी सारी चेष्टाओंको लेकर श्रीकृष्णकी ओर। जो ऐसा कर पाता है वह बड़ा ही भाग्यवान् है। उसीका जीवन धन्य है!

पाँच भाव हैं—शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुर। सारे जीव इन पाँच भावोंके अधीन हैं। जो भाग्यवान् पुरुष इन भावोंको इस अनित्य और दु:खपूर्ण संसारसे हटाकर भगवान‍्में लगा देता है, वही सच्चा साधक है ऐसा करना ही वस्तुत: परम पुरुषार्थ है। इन पाँच भावोंमें सबसे उत्तम ‘मधुर’ भाव है। ‘मधुर’ भावमें शान्त, दास्य, सख्य और वात्सल्य चारोंका ही समावेश है। मधुरभावापन्न पत्नीके लिये कहा गया है—

कार्येषु मन्त्री करणेषु दासी

धर्मेषु पत्नी क्षमया च धात्री।

भोज्येषु माता शयनेषु रम्भा

रंगे सखी लक्ष्मण सा प्रिया मे॥

पति-पत्नीके मधुरभावकी अपेक्षा भी भावकी दृष्टिसे ‘परकीया’ का भाव और भी ऊँचा है। वह सर्वस्वका त्यागकर अपने प्रियतमको भजती है। यह भाव जब लौकिक कामजन्य होता है; तब वह महान् दूषित और घोर यन्त्रणामय भयानक नरकोंकी प्राप्ति करानेवाला होता है और यही भाव जब रसराज रसेन्द्रशिरोमणि रसस्वरूप आनन्दकन्द व्रजेन्द्रनन्दनमें होता है, तब वह सर्वथा निर्दोष, परम उत्कृष्ट, अति उच्च साधनसाम्राज्यका उच्चतम स्तर होता है। इस भावका उदय भगवत्कृपासे ही होता है और उन्हीं महानुभावोंमें होता है, जो इस लोक और परलोकके देवदुर्लभ भोगोंकी ओर कैवल्य-मोक्षकी भी अभिलाषाको छोड़कर संयम-नियमपूर्वक श्रद्धा, विश्वासके साथ पूरी तत्परतासे साक्षात् भगवत्स्वरूपा श्रीराधिकाजीका या उन्हींकी घनीभूत मूर्ति तत्त्वत: अभिन्नस्वरूपा किसी गोपिजनकी आराधना करता है। इस रसका पूर्ण अनुभव करनेवाली श्रीकृष्णप्रेमरसभावितमति श्रीगोपियाँ हैं। उन्हींमें इसका पूर्ण प्रकाश है—वे कहती हैं—

तौक पहिरावो, पाँव बेड़ी लै भरावो, गाढ़े

बंधन बँधावो, औ खिंचावो काची खाल सों।

विष लै पिलावो, तापै मूठ भी चलावो,

मँझधारमें डुबाओ बाँधि पाथर कमाल सों॥

बिच्छू लै बिछावो तापै मोहि लै सुलावो, फेरि

आग भी लगावो, बाँध कापड़ दुसाल सों।

गिरितें गिरावो, काले नागसे डसावो, हा! हा!

प्रीति ना छुड़ावो प्यारे मोहन नंदलाल सों॥

कोऊ कहो कुलटा कुलीन अकुलीन कहो,

कोऊ कहो रंकिनी कलंकिनी कुनारी हौं।

कैसो नरलोक वरलोक लोक लोकनमें

लीन्हीं मैं अलीक लोक लीकनि तें न्यारी हौं॥

तन जाहु, मन जाहु, देव गुरुजन जाहु,

जीव किन जाहु टेक टरत न टारी हौं।

वृन्दावनवारी वनवारीकी मुकुटवारी

पीत पटवारी वाहि मूरति पै बारी हौं॥

नंदलाल सों मेरो मन मान्यो

कहा करेंगी कोय री।

हौं तो चरनकमल लपटानी

जो भावै सो होय री॥

गृहपति मातु-पिता मोहि त्रासत

हँसत बटाऊ लोग री।

अब तो ऐसी ही बनि आई

विधना रच्यो है संजोग री॥

जो मेरो यह लोक जायगी

अरु परलोक नसाय री।

नंदनँदनको तऊ न छाड़ूँ

मिलूँगी निसान बजाय री॥

यह तन फिरि बहुरो नहिं पैये

बल्लभ बेश मुरार री।

परमानन्द स्वामीके ऊपर

सरबस डारौं वार री॥

अवश्य ही ये कवियोंकी उक्तियाँ हैं, परंतु इनमें गोपीभावनाकी बाहरी रूप-रेखाका स्पष्ट दिग्दर्शन है। गोपीभावका यथार्थ रहस्य तो गोपीभावापन्न प्रेमी पुरुष ही जानते हैं, उसका वर्णन कोई कर नहीं सकता। यह तो उसका अति बाह्य स्थूल आंशिक प्रकाशमात्र है। न यही समझना चाहिये कि परकीया भाव ही गोपीप्रेमका यथार्थ उदाहरण है। वह प्रेम तो इतना अनिर्वचनीय और अनुपम है कि न तो वह कहा जा सकता है और न उसकी किसीके साथ तुलना ही हो सकती है।

गोपीभावकी प्राप्तिके लिये संक्षेपत: निम्नलिखित दस साधन करने आवश्यक हैं।

१—किसी ऐसे सद‍्गुरुका आश्रय, जो काम-क्रोध-लोभादिसे सर्वथा रहित हो, अन्तर-बाहरसे पवित्र और सदाचारपरायण हों, शान्त, निर्मत्सर और प्रेमी हों, श्रीकृष्णरसके तत्त्वज्ञ हों, कृष्णमन्त्रके ज्ञाता हों, कृष्णानुग्रहको ही श्रीकृष्णप्राप्तिका एकमात्र उपाय जानते हों, दयालु और परम वैराग्यवान् हों और श्रीकृष्णलीलागुणोंके श्रवण-कीर्तनमें जीवन बिताते हों। ऐसे गुरु न मिलें, तो जगद‍्गुरु श्रीकृष्णको ही परम गुरुरूपमें वरण करना चाहिये।

२—श्रीगुरुदेवमें जो गुण बतलाये गये हैं, इन्हीं गुणोंको अपने अंदर बढ़ानेका पूरा प्रयत्न करना चाहिये।

३—भगवान् श्रीकृष्ण ही पूर्ण परमेश्वर, सर्वोपरि, सर्वशक्तिमान्, सर्वव्यापी, सर्वमय, सर्वातीत, अचिन्त्यानन्तगुणसम्पन्न, अखिल-रसामृतसिन्धु, भक्तवांछाकल्पतरु, नित्यविहारी, अज, अविनाशी, परमब्रह्म, सर्वदेवपूज्य, सर्वदेवस्वरूप, परब्रह्मके भी परम आश्रय, नित्य, निर्गुण, निराकार, निर्विकार, निरंजन, अप्रमेय, अनवद्य, अकल, अचल, अनामय, सच्चिदानन्दघन और अचिन्त्य-चिन्मय विग्रह हैं ऐसा मानकर उन्हींको अपना परम आराध्य इष्टदेव बनाना चाहिये।

४—इस लोक और परलोकके तमाम भोगोंको भगवत्प्राप्तिके मार्गमें सर्वथा बाधक समझकर उनसे चित्तकी आसक्तिको बिलकुल हटा लेना चाहिये। और आवश्यकतानुकूल भोगोंका व्यवहार भगवत्प्रीत्यर्थ—उन्हें भगवत्पूजनकी सामग्री बनाकर ही करना चाहिये। किसी भी भोग्य वस्तुमें आसक्ति, ममता और कामना जरा भी नहीं रहनी चाहिये।

५—भगवान् श्रीकृष्णकी मधुर व्रजलीलाको प्राकृत स्त्री-पुरुषोंकी कामक्रीड़ा कभी नहीं मानना चाहिये। भगवान् श्रीकृष्णकी भगवत्तामें और उनकी प्रत्येक लीलाकी अप्राकृत सच्चिदानन्दमयतामें नित्य पूर्ण विश्वास होना चाहिये।

६—किसी भी प्राणीका जरा भी अहित न करके वैष्णवोचित सत्य, अहिंसा, प्रेम, विनम्रता, ब्रह्मचर्य, सेवा आदि सद‍्गुण और सत्कर्मोंका तथा श्रीतुलसीजी, गंगाजी, यमुनाजी, श्रीविग्रह, भक्त-संत आदिका भगवत्प्रीत्यर्थ श्रद्धापूर्वक यथायोग्य सेवन करना चाहिये।

७—श्रीयुगलमन्त्रका जाप विधिपूर्वक यथा समय अवश्य करना चाहिये और श्रीभगवन्नामका जप-कीर्तन निरन्तर करते रहना चाहिये।

८—श्रीश्रीराधिकाजी अथवा श्रीललिताजी आदिका भक्तिपूर्वक सेवन करना चाहिये।

९—नित्य-निरन्तर अपनेको सर्वतोभावसे भगवान‍्के चरणोंमें समर्पण करते रहना और उनसे सेवाधिकार दानके लिये करुण प्रार्थना करते रहना चाहिये।

१०—कामविकारके नाशके लिये विशेष प्रयत्नवान् होना चाहिये, क्योंकि जबतक जरा भी कामविकार रहता है तबतक गोपीभावकी साधनाका अधिकार किसी तरह भी नहीं मिल सकता।

पद्मपुराणमें भगवान् श्रीशंकरने देवर्षि नारदजीसे श्रीराधाकृष्णकी उपासना, उनके स्वरूप और मन्त्रादिके विषयमें बहुत रहस्यकी बातें बतलायी हैं—उनमेंसे पाठकोंके लाभार्थ कुछ यहाँ उद‍्धृत की जाती हैं। भगवान् शिवजी कहते हैं—

श्रीकृष्णके ‘मन्त्रचिन्तामणि’ नामक दो अत्युत्तम मन्त्र हैं—एक षोडशाक्षर है और दूसरा दशाक्षर!

मन्त्र

षोडशाक्षर मन्त्र है—

‘गोपीजनवल्लभचरणान् शरणं प्रपद्ये।’

और दशाक्षर है—

‘नमो गोपीजनवल्लभाभ्याम्’

इन मन्त्रोंके अधिकारी सभी वर्णोंके, सभी आश्रमोंके और सभी जातिके वे स्त्री-पुरुष हैं जिनकी सर्वेश्वरेश्वर भगवान् श्रीकृष्णमें भक्ति है—(‘भक्तिर्भवेदेषां कृष्णे सर्वेश्वरेश्वरे।’) श्रीकृष्णभक्तिसे रहित याज्ञिक, दानशील, तान्त्रिक, सत्यवादी, वेदवेदांगपारग, कुलीन, तपस्वी, व्रती और ब्रह्मनिष्ठ भी इनके अधिकारी नहीं हैं। इसलिये ये मन्त्र श्रीकृष्णके अभक्त, कृतघ्न, दुरभिमानी और श्रद्धारहित मनुष्योंको नहीं बतलाने चाहिये।

दम्भ, लोभ, काम और क्रोधादिसे रहित, श्रीकृष्णके अनन्य भक्तको ही ये मन्त्र देने चाहिये। इनका यथाविधि न्यास करके श्रीकृष्णकी पूजा करनी चाहिये। फिर उनका इस प्रकार ध्यान करना चाहिये—

ध्यान

सुन्दर वृन्दावनमें कल्पवृक्षके नीचे सुरम्य रत्नसिंहासनपर भगवान् श्रीकृष्ण श्रीप्रियाजीके साथ विराजमान हैं। श्रीकृष्णका वर्ण नवजलधरके समान नील श्याम है, पीताम्बर धारण किये हुए हैं, द्विभुज हैं, विविध रत्नोंकी और पुष्पोंकी मालाओंसे विभूषित हैं, मुखमण्डल करोड़ों चन्द्रमाओंसे भी सुन्दर है। तिरछे नेत्र हैं, ललाटपर मण्डलाकृति तिलक हैं, जो चारों ओर चन्दनसे और बीचमें कुंकुम-बिन्दुसे बनाये हुए हैं। कानोंमें सुन्दर कुण्डल शोभायमान हैं, उन्नत नासिकाके अग्रभागमें मोती लटक रही है। पके बिम्बफलके समान अरुण वर्ण अधर हैं, जो दाँतोंकी प्रभासे चमक रहे हैं। भुजाओंमें रत्नमय कड़े और बाजूबन्द हैं और अँगुलियोंमें रत्नोंकी अँगूठियाँ शोभा पा रही हैं। बायें हाथमें मुरली और दाहिनेमें कमल लिये हुए हैं। कमरमें मनोहर रत्नमयी करधनी है, चरणोंमें नूपुर सुशोभित है। बड़ी ही मनोहर अलकावली है, मस्तकपर मयूरपिच्छ शोभा पा रहा है। सिरमें कनेरके पुष्पोंके आभूषण हैं। भगवान‍्की देहकान्ति नवोदित कोटि-कोटि दिवाकरोंके सदृश स्निग्ध ज्योतिर्मय है, उनके दर्पणोपम कपोल स्वेदकणोंसे सुशोभित हैं, चंचल नेत्र श्रीराधिकाजीकी ओर लगे हुए हैं। वामभागमें श्रीराधिकाजी विराजती हैं, तपे हुए सोनेके समान उनकी देहप्रभा है, नील वस्त्र धारण किये हैं, मन्द-मन्द मुसकरा रही हैं। चंचल नेत्रयुगल स्वामीके मुखचन्द्रकी ओर लगे हुए हैं और चकोरकी भाँति उनके द्वारा वे श्याम-मुख चन्द्र-सुधाका पान कर रही हैं। अँगुष्ठ और तर्जनी अँगुलियोंके द्वारा वे प्रियतमके मुखकमलमें पान दे रही हैं। उनके गलेमें दिव्य रत्नोंके और मुक्ताओंके हार हैं। क्षीण कटि करधनीसे सुशोभित है। चरणोंमें नूपुर, कड़े और चरणांगुलियोंमें अँगुरीय आदि शोभा पा रहे हैं। उनके प्रत्येक अंग-प्रत्यंगसे लावण्य छिटक रहा है। उनके चारों ओर तथा आगे-पीछे यथास्थान खड़ी हुई सखियाँ विविध प्रकारसे सेवा कर रही हैं।

श्रीराधिकाजी कृष्णमयी हैं, वे श्रीकृष्णकी आनन्दरूपिणी ह्लादिनी शक्ति हैं। त्रिगुणमयी दुर्गा आदि शक्तियाँ उनकी करोड़वीं कलाके करोड़वें अंशके समान हैं। सब कुछ वस्तुत: श्रीराधाकृष्णसे ही भरा है, उनके सिवा और कुछ भी नहीं है। यह जड़-चेतन-अखिल जगत् श्रीराधाकृष्णमय है—

चिदचिल्लक्षणं सर्वं राधाकृष्णमयं जगत्।

परंतु वे इतने ही नहीं हैं। अनन्त अखिल ब्रह्माण्डसे परे हैं, सबसे परे हैं, सबके अधिष्ठान हैं, सबमें हैं और सबसे सर्वथा विलक्षण हैं। यह श्रीकृष्णका किंचित् ऐश्वर्य है।

साधन

बहुत दिनोंसे विदेश गये हुए पतिकी पतिपरायणा पत्नी जैसे एकमात्र अपने पतिमें ही अनुरागिणी होकर एकमात्र पतिका ही संग चाहती हुई दीनभावसे सदा-सर्वदा स्वामीके गुणोंका चिन्तन, गान और श्रवण किया करती है; वैसे ही श्रीकृष्णमें आसक्तचित्त होकर साधकको श्रीकृष्णके गुण-लीलादिके चिन्तन, गायन और श्रवण करते हुए ही समय बिताना चाहिये। और बहुत लम्बे समयके बाद पतिके घर आनेपर जैसे पतिव्रता स्त्री अनन्य प्रेमके साथ दत्तचित्त होकर पतिकी सेवा, उसका आलिंगन आदि तथा नयनोंके द्वारा उसके रूप सुधामृतका पान करती है, वैसे ही साधकको उपासनाके समय शरीर, मन, वाणीसे परमानन्दके साथ श्रीहरिकी सेवा करनी चाहिये।

एकमात्र श्रीकृष्णके ही शरणापन्न होना चाहिये और वह भी श्रीकृष्णके लिये ही; दूसरा कोई भी प्रयोजन न रहे। अनन्य मनसे श्रीकृष्णकी सेवा करनी चाहिये। श्रीकृष्णके सिवा न किसीकी पूजा करनी चाहिये और न किसीकी निन्दा। किसीका जूठा नहीं खाना चाहिये और न किसीका पहना हुआ वस्त्र ही पहनना चाहिये। भगवान‍्की निन्दा करनेवालोंसे न तो बातचीत करना चाहिये और न भगवान् और भक्तोंकी निन्दा सुननी ही चाहिये।

जीवनभर चातकीवृत्तिसे अर्थ समझते हुए युगलमन्त्रकी उपासना करनी चाहिये। चातक जैसे सरोवर, नदी और समुद्र आदि सहज ही मिले हुए जलाशयोंको छोड़कर एकमात्र मेघजलकी आशासे प्याससे तड़पता हुआ जीवन बिताता है; प्राण चाहे चले जायँ पर मेघके सिवा किसी दूसरेसे जलकी प्रार्थना नहीं करता। इसी प्रकार साधकको एकाग्र मनसे एकमात्र श्रीकृष्णगतचित्त होकर साधना करनी चाहिये।

परम विश्वासके साथ श्रीयुगलसरकारसे निम्नलिखित प्रार्थना करनी चाहिये—

संसारसागरान्नाथौ पुत्रमित्रगृहाकुलात्।

गोप्तारौ मे युवामेव प्रपन्नभयभंजनौ॥

योऽहं ममास्ति यत्किंचिदिहलोके परत्र च।

तत्सर्वं भवतोरद्य चरणेषु समर्पितम्॥

अहमस्म्यपराधानामालयस्त्यक्तसाधन:।

अगतिश्च ततो नाथौ भवन्तावेव मे गति:॥

तवास्मि राधिकाकान्त कर्मणा मनसा गिरा।

कृष्णकान्ते तवैवास्मि युवामेव गतिर्मम॥

शरणं वां प्रपन्नोऽस्मि करुणानिकराकरौ।

प्रसादं कुरुतं दास्यं मयि दुष्टेऽपराधिनि॥

(पद्मपुराण, पातालखण्ड)

‘नाथ! पुत्र, मित्र और घरसे भरे हुए इस संसारसागरसे आप ही दोनों मुझको बचानेवाले हैं, आप ही शरणागतके भयका नाश करते हैं। मैं जो कुछ भी हूँ और इस लोक तथा परलोकमें मेरा जो कुछ भी है वह सभी आज मैं आप दोनोंके चरणकमलोंमें समर्पण कर रहा हूँ। मैं अपराधोंका भण्डार हूँ। मेरे अपराधोंका पार नहीं है। मैं सर्वथा साधनहीन हूँ, गतिहीन हूँ। इसलिये नाथ! एकमात्र आप ही दोनों प्रिया-प्रियतम मेरे गति हैं। श्रीराधिकाकान्त श्रीकृष्ण! और श्रीकृष्णकान्ते राधिके! मैं तन-मन-वचनसे आपका ही हूँ और आप ही मेरे एकमात्र गति हैं। मैं आपकी शरण हूँ। आपके चरणोंपर पड़ा हूँ। आप अखिल कृपाकी खान हैं। कृपापूर्वक मुझपर दया कीजिये और मुझ दुष्ट अपराधीको अपना दास बना लीजिये।’

जो भगवान् श्रीराधाकृष्णकी सेवाका अधिकार बहुत शीघ्र प्राप्त करना चाहते हैं उन साधकोंको भगवान‍्के चरणकमलोंमें स्थित होकर इस प्रार्थनामय मन्त्रका नित्य जप करना चाहिये।

भगवान् शंकरने फिर नारदजीसे कहा कि—

‘देवर्षि! मैं भगवान‍्के मन्त्रका जप और उनका ध्यान करता हुआ बहुत दिनोंतक कैलासपर रहा, तब भगवान‍्ने प्रकट होकर मुझे दर्शन दिये और वर माँगनेके लिये कहा। मैंने बार-बार प्रणाम करके उनसे प्रार्थना की—‘कृपासिन्धो! आपका जो सर्वानन्ददायी समस्त आनन्दोंका आधार नित्य मूर्तिमान् रूप है, जिसे विद्वान् लोग निर्गुण, निष्क्रिय शान्त ब्रह्म कहते हैं, हे परमेश्वर! मैं उसी रूपको अपनी आँखोंसे देखना चाहता हूँ।’

भगवान‍्ने कहा—‘आप श्रीयमुनाजीके पश्चिम तटपर मेरे वृन्दावनमें जाइये, वहाँ आपको मेरे स्वरूपके दर्शन होंगे।’ इतना कहकर भगवान् अन्तर्धान हो गये। मैंने उसी क्षण मनोहर यमुनातटपर जाकर देखा—समस्त देवताओंके ईश्वरोंके ईश्वर भगवान् श्रीकृष्ण मनोहर गोपवेष धारण किये हुए हैं। उनकी सुन्दर किशोर अवस्था है। श्रीराधाजीके कन्धेपर अपना अति मनोहर बायाँ हाथ रखे वे सुन्दर त्रिभंगी-से खड़े मुसकरा रहे हैं। आपके चारों ओर गोपियोंका मण्डल है। शरीरकी कान्ति सजल जलदके सदृश स्निग्धश्यामवर्ण है। आप अखिल कल्याणके एकमात्र आधार हैं।

इसके बाद भगवान् श्रीकृष्णने अमृतोपम मधुर वाणीमें मुझसे कहा—

यदद्य मे त्वया दृष्टमिदं रूपमलौकिकम्।

घनीभूतामलप्रेमसच्चिदानन्दविग्रहम्॥

नीरूपं निर्गुणं व्यापि क्रियाहीनं परात्परम्।

वदन्त्युपनिषत्सङ्घा इदमेव ममानघ॥

प्रकृत्युत्थगुणाभावादनन्तत्वात्तथेश्वर।

असिद्धत्वान्मद‍्गुणानां निर्गुणं मां वदन्ति हि॥

अदृश्यत्वान्ममैतस्य रूपस्य चर्मचक्षुषा।

अरूपं मां वदन्त्येते वेदा: सर्वे महेश्वर॥

व्यापकत्वाच्चिदंशेन ब्रह्मेति च विदुर्बुधा:।

अकर्तृत्वात्प्रपंचस्य निष्क्रियं मां वदन्ति हि॥

मायागुणैर्यतो मेंऽशा: कुर्वन्ति सर्जनादिकम्।

न करोमि स्वयं किंचिंत् सृष्ट्यादिकमहं शिव॥

(पद्मपुराण, पातालखण्ड)

‘शंकरजी! आपने आज मेरा यह परम अलौकिकरूप देखा है। सारे उपनिषद् मेरे इस घनीभूत निर्मल प्रेममय सच्चिदानन्दघन रूपको ही निराकार, निर्गुण, सर्वव्यापी, निष्क्रिय और परात्पर ‘ब्रह्म’ कहते हैं। मुझमें प्रकृतिसे उत्पन्न कोई गुण नहीं है और मेरे गुण अनन्त हैं—उनका वर्णन नहीं हो सकता। और मेरे वे गुण प्राकृत दृष्टिसे सिद्ध नहीं होते, इसलिये सब मुझको ‘निर्गुण’ कहते हैं। महेश्वर! मेरे इस रूपको चर्मचक्षुओंके द्वारा कोई देख नहीं सकता, इसलिये वेद इसको अरूप या ‘निराकार’ कहते हैं। मैं अपने चैतन्यांशके द्वारा सर्वव्यापी हूँ, इसलिये विद्वान् लोग मुझको ‘ब्रह्म’ कहते हैं। और मैं इस विश्वप्रपंचका रचयिता नहीं हूँ, इसलिये पण्डितगण मुझको ‘निष्क्रिय’ बतलाते हैं। शिव! वस्तुत: सृष्टि आदि कोई भी कार्य मैं स्वयं नहीं करता। मेरे अंश ही (ब्रह्मा-विष्णु-रुद्र) मायागुणोंके द्वारा सृष्टि-संहारादि कार्य किया करते हैं।’

देवर्षि! भगवान‍्के इस प्रकार कहने और कुछ अन्य उपदेश करनेपर मैंने उनसे पूछा—‘नाथ! आपके इस युगलस्वरूपकी प्राप्ति किस उपायसे हो सकती है, इसे कृपा करके बतलाइये।’ भगवान‍्ने कहा—‘हम दोनोंके शरणापन्न होकर जो गोपीभावसे हमारी उपासना करते हैं, उन्हींको हमारी प्राप्ति होती है, अन्य किसीको नहीं।’

गोपीभावेन देवेश स मामेति न चेतर:।

‘एक सत्य बात और है—वह यह है कि पूरे प्रयत्नोंके साथ इस भावकी प्राप्तिके लिये श्रीराधिकाकी उपासना करनी चाहिये।’

हे रुद्र! यदि आप मुझे वशमें करना चाहते हैं, तो मेरी प्रिया श्रीराधिकाजीकी शरण ग्रहण कीजिये—

आश्रित्य मत्प्रियां रुद्र मां वशीकर्तुमर्हसि।

इस वर्णनसे पता लगा होगा कि भगवान् श्रीराधाकृष्णकी प्राप्ति और उनकी सेवा ही गोपीभावकी साधनाका लक्ष्य है और इसकी प्राप्तिके लिये उपर्युक्त प्रकारसे श्रद्धा-भक्तिपूर्वक तत्पर होकर साधना करनी चाहिये और भगवान् श्रीकृष्णके परम मनोहर मुनिजनमोहन सौन्दर्यसुधामय स्वरूपका तृप्त और निर्निमेष मानस नेत्रोंसे अपने हृदयमें ध्यान करना चाहिये। ध्यान करते-करते जब उनकी कृपासे आपको उनके मधुर रूप-माधुर्यके प्रत्यक्ष दर्शन होंगे तब तो आप निहाल ही हो जाइयेगा। फिर तो आप भी वही चाहियेगा—

माथे पै मुकुट देखि, चन्द्रिका-चटक देखि,

छबिकी लटक देखि, रूपरस पीजिये।

लोचन बिसाल देखि, गरे गुंजमाल देखि,

अधर रसाल देखि, चित्त चाव कीजिये॥

कुंडल हलनि देखि, अलक बलनि देखि,

पलक चलनि देखि सरबस ही दीजिये।

पीताम्बरकी छोर देखि, मुरलीकी घोर देखि,

साँवरेकी ओर देखि देखिबोई कीजिये॥