गोपीभावकी उपासना
आपका कृपापत्र मिला था। उत्तरमें देर हुई, इसके लिये क्षमा करें। आपको गोपीभावकी उपासना प्रिय है सो बड़ी ही अच्छी बात है। परन्तु सावधान रहियेगा, कहीं मनमें कामभावना, इन्द्रियसुखेच्छा न पैदा हो जाय। गोपीभाव ‘सर्वसमर्पण’ का भाव है। इसमें निज-सुखकी इच्छाका सर्वथा त्याग है। गोपीभावमें न तो लहँगा, साड़ी या चोली पहननेकी आवश्यकता है, न पैरोंमें नूपुर और नाकमें नथकी ही। गोपीभावकी प्राप्तिके लिये श्रीगोपीजनोंका ही अनुगमन करना होगा। ध्यान कीजिये—श्रीकृष्ण मचल रहे हैं और माँ यशोदा उन्हें माखन देकर मना रही हैं। श्रीकृष्ण कुंजमें पधार रहे हैं, श्रीमती राधिकाजी उनकी अगवानीकी तैयारीमें लगी हैं। गोपीभावमें खास बात है ‘रसकी अनुभूति।’ ‘श्रीकृष्ण ही मेरे एकमात्र प्राणनाथ हैं। वे ही परम प्रियतम हैं। उनके सिवा मेरे और कुछ भी नहीं हैं।’ इतना कह देनेमें ही रस नहीं मिलता। रसके लिये रसभरा हृदय चाहिये। वाणीसे बाह्य रसका भानमात्र होता है। एक पतिप्राणा पत्नी प्रेमभरे हृदयसे पतिको जब ‘प्राणनाथ’ और ‘प्रियतम’ कहती है, तब उसके हृदयमें यथार्थ ही यह भाव मूर्तिमान् रहता है। इसीसे उसे रसानुभूति होती है। इसीसे वह प्राणनाथके लिये अपने प्राणोंका उत्सर्ग करनेमें नहीं हिचकती या यों कहना चाहिये कि उसके प्राणोंपर असलमें पतिका ही अधिकार होता है। पतिको प्रियतम कहते समय उसके हृदयमें स्वाभाविक ही एक गुदगुदी होती है, आनन्दकी रस-लहरी छलकती है। इसी प्रकार भक्तका हृदय भगवान्को जब सचमुच अपना ‘प्राणनाथ’ और ‘प्रियतम’ मान लेता है, तभी वह गोपीभावकी प्राप्तिके योग्य होता है। और ठीक पत्नीकी भाँति जब भगवान्को पतिरूपमें वरण कर लिया जाता है तभी उन्हें ‘प्रियतम’ ‘प्राणनाथ’ कहा जाता है।