काम-क्रोधादि शत्रुओंका सदुपयोग

आपका कृपापत्र मिला। आपने लिखा कि मेरा मन श्रीकृष्णके भजनके लिये छटपटाता रहता है, परंतु भजन होता नहीं तथा काम-क्रोधादि छ: शत्रुओंका चेष्टा करनेपर भी नाश नहीं होता। सो ठीक है। श्रीकृष्ण-भजनके लिये मनका छटपटाना श्रीकृष्णका भजन ही है। वह मनुष्य वास्तवमें भाग्यवान् है जिसका मन भजनके लिये व्याकुल है। संसारमें सभी लोग छटपटाते हैं—कोई धनके लिये, कोई पुत्रके लिये, कोई मान-यशके लिये, तो कोई शरीरके आरामके लिये। आप यदि श्रीकृष्ण-भजनके लिये छटपटाते रहते हैं तो निश्चय मानिये, आपपर श्रीकृष्णकी बड़ी कृपा है। आपकी यह छटपटाहट श्रीकृष्णकी प्राप्ति करानेवाली है।

रही काम-क्रोधादि छ: शत्रुओंकी बात, सो असलमें ये बड़े शत्रु हैं। मनुष्य बाहरके शत्रुओंका तो नाश करना चाहता है, परंतु इन भीतरी शत्रुओंको अंदर बसाये रखता है। वरं बाहरी शत्रुओंका नाश करने जाकर इन भीतरी शत्रुओंके बलको और भी बढ़ा देता है। भगवत्कृपासे ही इनका नाश होता है। परंतु भक्तलोग इनके नाशकी बात नहीं सोचते। वे तो इन्हें भक्तिसुधासे सींचकर मधुर, हितकर और अनुकूल अनुचर बना लेते हैं। आप भी भक्तोंके पवित्र भावोंका अनुसरण करके इन काम-क्रोधादिको भगवत्सेवामें लगानेकी चेष्टा कीजिये।

काम—आत्मतृप्तिमूलक कामनाका नाम ही ‘काम’ है। मनुष्य किसी भी वस्तुकी कामना करे, उसका लक्ष्य होता है सुख ही। विभिन्न जीवोंके कामनाके पदार्थ चाहे भिन्न-भिन्न हों, परंतु सभी चाहते हैं आनन्द—और आनन्द भी ऐसा कि जो सदा एक-सा बना रहे! परंतु अज्ञानवश उसे खोजते हैं विनाशी असत् वस्तुओंमें। इसीसे उन्हें सुख-आनन्दके बदले बार-बार दु:ख मिलता है। परमानन्दस्वरूप तो श्रीभगवान् ही हैं। उन्हींकी प्राप्तिसे नित्य अविनाशी परमानन्दकी प्राप्ति है। अतएव कामको परमानन्दस्वरूप श्रीकृष्णकी प्राप्तिमें लगाना चाहिये। श्रीकृष्ण-प्राप्ति ही आत्मतृप्तिकी अवधि है। स्थूलरूपसे कामका प्रधान आधार है नारीके प्रति पुरुषका और पुरुषके प्रति नारीका विकारयुक्त आकर्षण। यह आकर्षण होता है स्मरण, चिन्तन, दर्शन, भाषण और संग आदिसे। काम-रिपुपर जय पानेकी इच्छा करनेवाले नर-नारियोंको पर-स्त्री और पर-पुरुषके चिन्तन-दर्शनादिसे यथासाध्य बचकर रहना चाहिये। और दर्शनादिके समय परस्पर मातृभाव तथा पितृभावकी भावना दृढ़ करनी चाहिये। कामजयी कृष्णानुरागी संतोंके द्वारा श्रीकृष्णके रूप, गुण, माहात्म्यकी रहस्यमयी चर्चा सुननेपर श्रीकृष्णके प्रति आकर्षण होता है और श्रीकृष्ण ही ‘काम’ के लक्ष्य बन जाते हैं। इससे कामका शत्रुपन सहज ही नष्ट हो जाता।

क्रोध—किसीके मनमें किसी वस्तुकी कामना है। वह कामना पूरी नहीं हो पाती, इससे वह दु:खी रहता है। इसी बीचमें जब किसीसे कोई बात सुनकर या जानकर उसे यह पता लगता है कि अमुक व्यक्तिके कारण मेरा मनोरथ सिद्ध नहीं हो रहा है, अथवा कोई उसे जब गाली देता है अथवा मनके प्रतिकूल कुछ करता-कहता है, तब एक प्रकारका कम्पन पैदा होता है; वह कम्पन चित्तपर आघात करता है, चित्तके द्वारा तत्काल वह बुद्धिके सामने आता है, बुद्धि निर्णय करती है कि यह हमारे अनुकूल नहीं है। बस, उसी क्षण उसके विपरीत दूसरा कम्पन उत्पन्न होता है। इन दोनों कम्पनोंमें परस्पर संघर्ष होनेसे ताप पैदा होता है। यही ताप जब बढ़ जाता है, तब स्नायुसमुदाय उत्तेजित हो उठते हैं और चित्तमें एक ज्वालामयी वृत्ति उत्पन्न होती है। इसी वृत्तिका नाम क्रोध है। असलमें काम ही प्रतिहत होकर क्रोधके रूपमें परिणत हो जाता है। क्रोधके समय मनुष्य अत्यन्त मूढ़ हो जाता है। उसके चित्तकी स्वाभाविक पवित्रता, स्थिरता, सुखानुभूति, शान्ति और विचारशीलता नष्ट हो जाती है। चित्त कुपित हो जाता है, जिससे सारा शरीर जलने लगता है। नसें तन जाती हैं, आँखें लाल हो जाती हैं, वायुका वेग बढ़ जानेसे चेहरा विकृत हो जाता है, लंबी साँस चलने लगती है, हाथ और पैर अस्वाभाविक रूपसे उछलने लगते हैं। इस प्रकार जब शरीरकी अग्नि विकृत होकर बढ़ जाती है तब वाणीपर उसका विशेष प्रभाव पड़ता है; क्योंकि वाक्-इन्द्रियका कार्य अग्निसे ही होता है। अतएव मुखसे अस्वाभाविक और बेमेल वाक्योंके साथ ही निर्लज्जभावसे गाली-गलौजकी वर्षा होने लगती है। उस समय मनुष्य परिणाम-ज्ञानसे शून्य हो जाता है, उसकी हिताहित सोचनेवाली विवेकशक्ति नष्ट हो जाती है। शरीर और मन दोनों ही अपनी स्वाभाविकताको खोकर अपने ही हाथों वर्षोंके कमाये हुए साधन-धनको नष्ट कर डालते हैं। प्यारे मित्रोंमें द्वेष, बन्धुओंमें वैर और स्वजनोंमें शत्रुता हो जाती है। पिता-पुत्र और पति-पत्नीके दिल फट जाते हैं। कहीं-कहीं तो आत्महत्यातककी नौबत आ जाती है। इस प्रकार क्रोधरूपी शत्रु मनुष्यका सर्वनाश कर डालता है। क्रोधी आदमी असलमें भगवान‍्का भक्त नहीं हो सकता। ज्ञानके लिये तो उसके अन्त:करणमें जगह ही नहीं होती। इस भीषण शत्रु क्रोधका दमन किये बिना मनुष्यका कल्याण नहीं है। इसका दमन होता है इन चार उपायोंसे—१. प्रत्येक प्रतिकूल घटनाको भगवान‍्का मंगल-विधान समझकर उसे परिणाममें कल्याणकारी मानना और उसमें अनुकूल बुद्धि करना, २. भोगोंमें वैराग्यकी भावना करना, ३.सहनशीलताको बढ़ाना और ४. क्रोधके समय चुप रहना।

क्रोधको अनुकूल और हितकर बनानेके लिये उसको भगवान‍्की सेवामें लगानेका अभ्यास करना चाहिये। क्रोधका प्रयोग जब केवल भगवद‍्द्वेषी भावोंपर किया जाता है तब उसके द्वारा भगवान‍्की सेवा ही होती है। भगवान‍्के प्रति द्वेषके भाव जहाँ मिलें वहीं क्रोध हो, उन्हें हम सह न सकें। यदि वे हमारे अपने ही मनके अंदर हों तो हम वैसे ही अपने मनका नाश करनेको भी तैयार हो जायँ, जैसे जहरीला घाव होनेपर मनुष्य अपने प्यारे अंगोंको भी कटवा डालनेके लिये तैयार हो जाता है। गोसाईंजी महाराजने कहा है—

जरउ सो संपति सदन सुखु सुहृद मातु पितु भाइ।

सनमुख होत जो राम पद करै न सहस सहाइ॥

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जाके प्रिय न राम बैदेही।

तजिये ताहि कोटि बैरी सम

जद्यपि परम सनेही॥

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जरि जाउ सो जीवन जानकिनाथ

जिऐ जगमें तुम्हरो बिनु ह्वै।

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हिय फाटहु, फूटउ नयन, जरउ सो तन केहि काम।

द्रवइ, स्रवइ, पुलकइ नहीं तुलसी सुमिरत राम॥

भगवान‍्की सेवामें भगवत्-प्रतिकूलताको स्थान नहीं है। यह समझकर जहाँ-जहाँपर भगवत्-प्रतिकूलता हो, फिर चाहे वह अपने ही मनमें क्यों न हो वहीं क्रोधका प्रयोग करके उसे तुरंत हटाना और उसका नाश करना चाहिये। यही क्रोधका सदुपयोग है।

लोभ—लोभ भी बहुत बड़ा शत्रु है। संतोंने लोभको ‘पापका बाप’ बतलाया है। अर्थात् लोभसे ही पाप पैदा होते हैं, कामनामें बाधा आनेपर जैसे क्रोध पैदा होता है, वैसे ही कामनाकी पूर्ति होनेपर लोभ उत्पन्न होता है। ज्यों-ज्यों मनचाही वस्तु मिलती है त्यों-ही-त्यों और भी अधिक पानेकी जो अबाध—अमर्याद लालसा होती है, उसे लोभ कहते हैं। लोभसे मनुष्यकी बुद्धि मारी जाती है, उससे विवेककी आँखें मुँद जाती हैं और वह विषयलोलुपताके वश होकर न्याय-अन्याय तथा धर्माधर्मका विवेक भूलकर मनमाना आचरण करने लगता है। इस लोभको मधुर, हितकर और अनुकूल बनानेका उपाय यह है कि इसका प्रयोग भजन, ध्यान, नाम-जप, सत्संग भगवत्कथा आदिमें ही किया जाय। अर्थात् धन, मान, कीर्ति, भोग, आराम आदिसे लोलुपता हटाकर भगवान‍्के ध्यान, उनकी सेवा, उनके नामका जप, उनके तत्त्वज्ञ प्रेमी भक्तोंके संग, उनकी लीला, कथा आदिके सुनने-पढ़ने आदिका लोभ हो। ऐसा करनेसे लोभ शत्रु न होकर मित्र बन जाता है।

मोह—किसी भी विषयका जब अत्यधिक लोभ जाग्रत् हो जाता है तब बुद्धि उसमें इतनी फँस जाती है कि दूसरे किसी भी विषयका मनुष्यको ध्यान नहीं रहता, चाहे वह कितना ही आवश्यक और उपयोगी क्यों न हो। जैसे किसी व्यभिचारी मनुष्यका मन किसी स्त्रीमें या किसी स्त्रीका किसी पुरुषमें लग जाता है तो फिर उसे नींद, भूखतकका पता नहीं लगता। धन-दौलत, विलास-वैभव, भोग-आराम सबसे वह बेसुध हो जाता है। वह निरन्तर अपने उस मनोरथके चिन्तनमें ही डूबा रहता है। यह मोह जब सांसारिक पदार्थोंमें न रहकर भगवान‍्की रूपमाधुरीमें हो जाता है, भगवान‍्की रूपमाधुरीपर मुग्ध होकर जब वह पागलकी तरह सब कुछ भूलकर उसीमें फँसा रहता है, तब मोहका सदुपयोग होता है।

मद—मद कहते हैं नशेको। धन, मान, पद, बड़प्पन, विद्या, बल, रूप और चातुरी आदिके कारण मनुष्यके मनमें एक ऐसी उल्लासमयी अन्धवृत्ति उत्पन्न होती है, जो विवेकका हरण करके उसे उन्मत्त-सा बना देती है। इसीका नाम ‘मद’ है। मदोन्मत्त मनुष्य किसीकी परवा नहीं करता। यही मद जब भगवच्चरणके प्रेम, भगवन्नाम-गुण-कीर्तन और भगवान‍्के ध्यानमें प्रयुक्त हो जाता है, तब मनुष्य दिन-रात उसी पवित्र नशेमें चूर रहता है। जहाँ सांसारिक पदार्थोंका नशा नरकोंमें ले जाता है, वहाँ भगवत्प्रेम तथा भगवद‍्ध्यानका नशा साधकको नित्य परमानन्दमय भगवत्स्वरूपकी प्राप्ति करा देता है। श्रीमद्भागवतमें ऐसे उन्मत्त भक्तोंको तीनों लोकोंके पवित्र करनेवाला बतलाया है। ‘मद्भक्तियुक्तो भुवनं पुनाति।’ अतएव सब कुछ भूलकर भगवान् श्रीकृष्णके रूप, गुण, नाम आदिके चिन्तन और कीर्तनके आवेशमें डूबे रहना ही मदको अनुकूल और हितकारी बनाना है।

मत्सर—दूसरोंकी उन्नतिको न सह सकना मत्सर कहलाता है; इसीको डाह कहते हैं। संसारमें लोगोंकी उन्नति होती ही है और मत्सरताकी वृत्ति रखनेवाला मनुष्य उन्हें देख-सुनकर नित्य जलता रहता है तथा अपनी नीच भावनासे निरन्तर उनका पतन चाहता है। परिणामस्वरूप वह नाना प्रकारके अनर्थ करके अन्तमें नरकगामी हो जाता है। इस मत्सरताका सदुपयोग होता है इसे सात्त्विक बनाकर भजनमें ईर्ष्या करनेसे। किसी साधककी साधनाको देखकर मनमें यह दृढ़ निश्चय करना कि ‘मैं इनसे भी ऊँची साधना करके शीघ्र-से-शीघ्र भगवान‍्को प्राप्त करूँगा’ और तदनुसार तत्पर होकर दृढ़ताके साथ साधनामें लग जाना—यह सात्त्विक मत्सरताका स्वरूप है। इसमें किसीके पतनकी कामना नहीं होती। इससे केवल भजन-साधनमें उत्साह होता है। इससे मत्सरता भी हितकारिणी बन जाती है।

आप अपने इन काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर शत्रुओंको भगवान‍्में लगाकर इन्हें अपने अनुकूल बनानेकी चेष्टा कीजिये। भगवान‍्में और उनकी कृपाशक्तिमें विश्वास करके प्रयोग शुरू कीजिये। आपका विश्वास सच्चा होगा तो भगवत्कृपासे शीघ्र ही आप उत्तम फल प्रत्यक्ष देखेंगे।