कोई किसीका नहीं है
पत्र मिला। आपने लिखा कि ‘क्या कारण है कि एक जीव अच्छे श्रीमान्के घरमें जन्म लेकर, जिसको कुछ भी तकलीफ नहीं, असमयमें ही कालके गालमें चला जाता है। बालक आया था सोने-सा शरीर लेकर। ग्यारह महीने अपनी लीलाएँ दिखायीं, मुझे मुग्ध किया, मातृस्नेहमें डाला। फिर प्रभुने वियोग दिला दिया। इसका उत्तर यह है कि प्रत्येक जीव अपने-अपने कर्मके अनुसार जगत्में जन्म लेता है और उस जन्मका प्रारब्ध पूरा होते ही कर्मवश ही चला जाता है। इसमें प्राय: किसीका कोई वश नहीं चलता। असलमें यहाँ न कोई किसीका पुत्र है—न माता-पिता है। ये सब तो नाटकके स्टेजपर खेलनेके स्वाँगकी भाँति हैं। श्रीमद्भागवतमें राजा चित्रकेतुकी कथा आती है। राजा चित्रकेतुके एकमात्र शिशु राजकुमारकी मृत्यु होनेपर उन्हें बड़ा दु:ख हुआ। वे पुत्र-शोकके मारे रोते-कल्पते हुए चेतनाहीन-से हो गये। तब महर्षि अंगिरा और देवर्षि नारदजी उनके पास आये, उन्होंने समझाते हुए राजासे कहा—‘तुम जिस बालकके लिये इतना शोक कर रहे हो, बतलाओ तो वह इस जन्म और इससे पहलेके जन्मोंमें वस्तुत: तुम्हारा कौन था और तुम उसके कौन थे और अगले जन्मोंमें उसके साथ तुम्हारा क्या सम्बन्ध रहेगा? जैसे जलके बेगसे धूलके कण कभी परस्पर मिल जाते हैं और कभी बिछुड़ जाते हैं, वैसे ही कालके प्रवाहमें जीवोंका मिलना-बिछुड़ना होता रहता है। हम, तुम और हमलोगोंके साथ इस जगत्में जितने भी शरीरधारी जीव हैं, वे सब इस जन्मके पहले इस रूपमें नहीं थे और मरनेके बाद भी नहीं रहेंगे। इसीसे सिद्ध है कि इस समय भी उनका वस्तुत: अस्तित्व नहीं है। सत्य वस्तु कभी बदलती भी नहीं है! ऐसे एक भगवान् ही हैं। वे ही सारे प्राणियोंके स्वामी हैं। उनमें न जन्मका विकार है न मृत्युका। वे सदा इच्छा-अपेक्षारहित हैं। उन्हींके द्वारा यह प्राणियोंकी रचना, पालन और संहारका खेल होता रहता है। असलमें अनित्य होनेके कारण ये शरीर असत्य हैं और इसी कारण विभिन्न अभिमानी भी असत्य हैं। त्रिकालाबाधित सत्य तो एकमात्र परमात्मा ही हैं। इसलिये शोक नहीं करना चाहिये।’
इसपर भी जब राजाका शोक पूरी तरहसे दूर नहीं हुआ तब नारदजीने राजकुमारके जीवात्माको बुलाकर उसे समझाया, तब जीवात्माने कहा—‘नारदजी महाराज! मैं अपने कर्मोंके अनुसार देवता, मनुष्य, पशु, पक्षी आदि योनियोंमें पता नहीं कितने जन्मोंसे भटक रहा हूँ! उनमेंसे ये लोग किस जन्ममें मेरे माँ-बाप हुए। अलग-अलग जन्मोंमें अलग-अलग सम्बन्ध हो जाते हैं। इस जन्ममें जो मित्र है, वही दूसरे जन्ममें शत्रु हो सकता है, इस जन्मका पुत्र अगले जन्ममें पिता हो सकता है। इसी तरह सब परस्पर भाई-बन्धु, शत्रु-मित्र, प्रेमी-द्वेषी, मध्यस्थ-उदासीन बनते रहते हैं। जैसे सोना आदि खरीद-बिक्रीकी चीजें एक व्यापारीसे दूसरे व्यापारीके हाथोंमें आती-जाती रहती हैं, वैसे ही जीव भी कर्मवश भिन्न-भिन्न योनियोंमें उत्पन्न होता रहता है।.....जबतक जिसका जिस वस्तुसे सम्बन्ध रहता है तभीतक उसकी उसमें ममता रहती है। जीव गर्भमें आकर जबतक जिस शरीरमें रहता है तभीतक उसको अपना शरीर मानता है। वास्तवमें जो जीव अविनाशी, नित्य, जन्मादिरहित, सर्वाश्रय और स्वयंप्रकाश है .....उसका न कोई प्रिय है, न अप्रिय है, न अपना है, न पराया है। ये राजा-रानी इसके लिये क्यों शोक कर रहे हैं?’
इसपर राजा चित्रकेतुको विवेक हो गया। अतएव जीव वास्तवमें अपना नहीं है। जीवोंमें कर्मवश आना-जाना लगा रहता है। भोग पूरे होते ही उसे चले जाना पड़ता है। संयोग-वियोगमें कर्म ही प्रधान कारण है। प्रभु तो निरपेक्ष नियन्ता मात्र हैं।