कुछ महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

आपका कृपापत्र मिले बहुत दिन हो गये। महीनों बीत गये। मैं उत्तर नहीं दे सका, इसके लिये क्षमा करेंगे।

आपके प्रश्नोंमेंसे कुछ तो प्रश्न मैंने छोड़ दिये हैं, उनका आंशिक उत्तर आपके दूसरे प्रश्नोंके उत्तरमें आ जायगा। संक्षेपमें पहले आपके तीन प्रश्नोंको ही लिखकर फिर उनका उत्तर लिखता हूँ।

प्रश्न १—एक महात्मा हैं, उनमें मेरी श्रद्धा है। मैंने देखा है, उनके पास स्त्रियाँ भी आजकल बहुत आती हैं। स्त्रियोंमें युवतियाँ भी होती हैं। स्त्रियाँ उनके चरण छूती हैं, चरण-रज लेती हैं, चरण धोकर पीती हैं, मिठाई, फल खिलाकर उच्छिष्ट प्रसाद लेती हैं, चरण दबाती हैं, पंचोपचारसे पूजा करती हैं, इत्र लगाती हैं, आरती उतारती हैं और श्रद्धाके कारण कभी-कभी उन्हें मुकुट-पीताम्बर पहनाकर, श्रीकृष्ण सजाकर, पालनेमें झुलाकर आनन्द लेती हैं। महात्मा निर्विकार रहते हैं। ये सब बातें एकान्तमें होती हैं। स्त्रियाँ भी बड़ी श्रद्धासे यह सब शुद्ध भावसे करती हैं। यह कोई छिपी बात भी नहीं है। परन्तु अश्रद्धालु लोग निन्दा करते हैं। क्या इसमें वास्तवमें कोई दोष है! क्या महात्माओंकी निन्दा करने और श्रद्धालु भले घरोंकी माँ-बहनोंमें दोष देखनेवाले पापके भागी नहीं होते?

२—श्रीकृष्ण महापुरुष थे, सिद्ध महात्मा थे। गोपियाँ परस्त्रियाँ थीं, उन्होंने उनको उपपति-भावसे चाहा था, और श्रीकृष्णने गोपियोंको स्वीकार भी किया था। अगर इसमें श्रीकृष्ण और गोपियोंको दोष नहीं लगा तो एक काम-क्रोधपर विजय पाये हुए महात्मामें और श्रद्धा रखनेवाली स्त्रियोंमें यदि परस्पर शुद्ध भाव रखते हुए गुरु-शिष्याके रूपमें व्यवहार हो तो इसमें क्या दोष है? वे स्त्रियाँ सचमुच उनमें श्रीकृष्णकी ही भावना करती हैं। इसमें क्या कोई आपत्ति है?

३—गीतामें भगवान‍्ने सब धर्मोंका त्याग करके शरण आनेकी बात कही है। इस सब धर्मोंके त्यागका आप क्या अर्थ मानते हैं? धर्मोंका त्याग न? और यदि वही अर्थ है तथा भगवान‍्की भक्तिमें सभी धर्मोंका त्याग आवश्यक है, तो फिर एक लौकिक धर्मकी परवा न करके और लोकनिन्दासे न डरकर गुरु-सेवनमें क्या आपत्ति है? क्या स्त्रियोंको गुरु नहीं करना चाहिये? और यदि करना चाहिये तो क्या उनके लिये दूसरा धर्म है?

यह आपके प्रश्नोंका सार है। आपके इन प्रश्नोंका उत्तर देनेकी मुझमें योग्यता नहीं है, और इन विषयोंमें बहुत मतभेद भी है; परंतु आपकी आज्ञा न टाल सकनेके कारण जो कुछ मुझे ठीक मालूम होता है, वह लिख रहा हूँ। आपको न रुचे तो क्षमा कीजियेगा। उत्तर आपहीतक रहता तब तो इतनी बात नहीं थी। आपने ‘कल्याण’ में प्रकाशित करनेकी आज्ञा दी है, ‘कल्याण’ में प्रकाशित होनेपर उसे लाखों आदमी पढ़ सकते हैं और सबकी रुचि एक-सी होती नहीं कोई अनुकूल समझेंगे, कोई प्रतिकूल। मैं हाथ जोड़कर इसीलिये पहले ही यह स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि मेरा उत्तर किसीपर आक्षेप करनेके लिये नहीं है—जो कुछ मनमें जँचती है, वही लिख रहा हूँ। न मैं किसीका भी जरा भी जी दुखाना चाहता हूँ। तथापि यदि इससे किन्हींको दु:ख हो तो मैं उनसे विनम्रभावसे क्षमा-प्रार्थना करता हूँ।

प्रथम प्रश्नका उत्तर—निन्दा तो निन्दनीय पुरुषकी भी नहीं करनी चाहिये, फिर निर्विकार महात्माओंकी निन्दा तो सर्वथा दोषरूप है, निन्दा करनेमें दूसरोंके दोषोंका चिन्तन और उनकी आलोचना करनी पड़ती है। जैसा चिन्तन और कथन होता है, अन्त:करणमें वैसे ही संस्कार-चित्र अंकित होते जाते हैं, जो भविष्यमें निमित्त बनकर मनुष्यसे वैसा ही कर्म करवा सकते हैं। निन्दामें वाणीका अपव्यय तो होता ही है, वाणी अशुद्ध भी होती है। निन्दा यदि झूठी हो, तब तो वह असत्य भाषणके दोषके साथ ही निर्दोषपर दोषारोपण करनेवाली और उसके चित्तमें द्वेष और दु:ख उत्पन्न करनेवाली होती है। द्वेषका परिणाम वैर, क्रोध और हिंसा होता है। अतएव किसीकी भी किसी प्रकारकी निन्दा बुद्धिमान् पुरुषको नहीं करनी चाहिये! फिर किसी महात्माकी या भले घरोंकी, माँ-बहिनोंकी निन्दा तो अत्यन्त गर्हित है।

परंतु यह विषय विचारणीय अवश्य है। निश्चय ही सच्चे महात्मा पुरुष—चाहे सुन्दरी रमणियोंसे घिरे हुए रहें या भयानक भूत-प्रेतोंसे, उनकी पुष्पोंसे पूजा हो या उनपर जूतियाँ बरसें, उनकी विस्तृत स्तुति हो या अकारण ही गालियोंकी वर्षा हो—सदा निर्विकार ही रहते हैं, उनका इनसे कुछ भी बनता-बिगड़ता नहीं। वे अपनी स्थितिमें अटल, अचल स्थित रहते हैं। ये सब चीजें सम्बन्ध रखती हैं नाम-रूपसे, और वे नाम-रूपके मायिक स्तरको लाँघकर बहुत ऊँचे उठे हुए होते हैं— परमात्मामें! तथापि यह आदर्श कदापि नहीं है। महात्माके निर्विकार रहनेपर भी वे दूसरोंके पतनका हेतु हो सकती हैं। महात्माकी देखा-देखी कोई भी दाम्भिक मनुष्य अपने नीच स्वार्थकी सिद्धिके लिये महात्मा सजकर ऐसा कर सकता है। बूढ़े महात्मा गाँधी युवती स्त्रियोंके कंधोंपर हाथ रखकर शुद्ध भावसे चला करते थे, लोग नकल करने लगे। आखिर महात्मा गाँधीजीने अपनी भूल स्वीकार की। इसीलिये महात्माओंपर भी एक दायित्व माना जाता है कि उन्हें, जबतक उनकी बाह्य संज्ञा लोप न हो गयी हो, वे देहकी सुधि सर्वथा न भूल गये हों, ऐसा कोई काम नहीं करना चाहिये, जिसकी नकल करके लोग पापके भागी हों। लोकालयमें रहनेवाले महात्मा तो जगत‍्के लिये आदर्श होते हैं—वे रास्ता दिखानेवाले होते हैं, अपने पवित्र कर्मों और आदर्श आचरणोंद्वारा! आपने जिन महात्माकी बात लिखी है, मुझे पता नहीं वे कौन और कैसे हैं; परंतु यदि वे पहुँचे हुए महात्मा हैं, तब तो उनके श्रीचरणोंमें मेरी यह विनीत प्रार्थना है कि वे इस विषयपर एक बार पुन: विचार करें और यदि उनके ध्यानमें ठीक जँचे तो वे कम-से-कम महात्माओंके आदर्शकी रक्षाके लिये ही अपने भक्तोंको समझा दें कि उनके पास स्त्रियाँ न आने पावें। उनके भक्त भी हों और बात भी न मानें तो, ऐसे भक्तोंसे तो दूर रहना ही चाहिये। और यदि वे साधक पुरुष हैं तो मैं नम्रताके साथ उन्हें सावधान कर देना चाहता हूँ कि वे गम्भीरतासे विचार करें, अपनी साधनाको यों नष्ट न करें और अपने गहरे पतनके लिये खाई खोदना बंद कर दें। और यदि कोई दम्भी है, तब तो कुछ भी कहना नहीं है; क्योंकि न तो वे मेरी प्रार्थना सुनेंगे और न सुनना उन्हें वस्तुत: इष्ट ही है।

उन भोली बहिनोंके लिये क्या कहा जाय, जो इस प्रकारसे बुरा आदर्श उपस्थित कर रही हैं। वे ऐसा करके स्वयं तो दोष करती ही हैं, उन महात्मापर भी लोकापवादका दोष लगाने और उनके आदर्शको नीचा गिरानेमें कारण बनती हैं। मेरी समझसे तो स्त्रियोंके लिये दो ही पुरुष ऐसे हैं, जिनसे वे ऐसा व्यवहार कर सकती हैं—एक अपना पति, जिसके साथ अग्निकी साक्षीमें विवाह हुआ है, और दूसरे अखिल ब्रह्माण्डोंके एकमात्र स्वामी विश्वात्मा जगत्पति श्रीभगवान्! इन दोके अतिरिक्त किसीसे भी एकान्तमें स्त्रीको नहीं मिलना चाहिये। नहीं तो बहुत भयानक परिणाम होता है। पहले नहीं मालूम होता, शुद्ध व्यवहार ही दीखता है, परंतु आगे चलकर बड़ी बुराइयाँ पैदा हो जाती हैं। प्रकृतिकी रचना ही कुछ ऐसी ही है। शास्त्रकार तो कहते हैं—माँ, बहिन-बेटीके पास भी पुरुषको एकान्तमें नहीं रहना चाहिये। बलवान् इन्द्रियाँ विद्वान‍्के मनमें भी क्षोभ पैदा कर देती हैं—

मात्रा स्वस्रा दुहित्रा वा न विविक्तासनो भवेत्।

बलवानिन्द्रियग्रामो विद्वांसमपि कर्षति॥

(मनु०२।२१५)

अस्तु, और जो लोग श्रीकृष्णका स्वाँग सजकर गोपीभावसे स्त्रियोंसे पूजा कराते हैं, मेरी तुच्छ समझसे वे बड़ी भारी गलती करते हैं। यह सत्य है कि यह सारा जगत् परमात्माकी अभिव्यक्ति है, इसके निमित्तोपादान कारण परमात्मा ही होनेसे यह परमात्मस्वरूप ही है, और इस दृष्टिसे देवता-मनुष्य, पशु-पक्षी, कीट-पतंग—सभीको परमात्मास्वरूप समझना आवश्यक है; परन्तु परमात्माका यह पूर्णरूप नहीं है। यह तो अंशमात्र है। यद्यपि सब कुछ परमात्मा है; किन्तु परमात्मा यह ‘सब कुछ’ ही नहीं है—परमात्मा इस ‘सब कुछ’ से परे अनन्त है। और वह अनन्त परमात्मा श्रीकृष्णका ही स्वरूप है, इससे श्रीकृष्णसे ही सब व्याप्त हैं—यह ठीक ही है।

मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना।

(गीता ९।४)

भगवान् श्रीकृष्णने कहा ही है, ‘मेरी अव्यक्त मूर्तिसे (परमात्मा विभुसे) सारा जगत् व्याप्त है।’ परंतु यही (जगत् ही) श्रीकृष्ण नहीं है। अतएव श्रीकृष्णका स्वाँग रासलीलाके खेलमें चाहे आ सकता है, परन्तु कोई मनुष्य वस्तुत: श्रीकृष्ण बनकर लोगोंसे अपनेको पुजवावे, यह तो बहुत ही अनुचित है, और पूजनेवाले भी बड़ी भूल करते हैं। माना कि स्त्रियाँ श्रद्धालु हैं, भले घरोंकी हैं और शुद्ध भावसे ही ऐसा करती हैं, परंतु यह चीज वास्तवमें आदर्शके विरुद्ध और हानिकारक है। यह भी माना कि महात्मा निर्विकार हैं, परंतु उनका भी आदर्श तो बिगड़ता ही है। और यदि साधक हैं तो इस निर्विकारताका बहुत दिनोंतक टिकना भगवान‍्की असीम कृपासे ही सम्भव है। ऐसी स्थितिमें जो लोग शुद्ध भावसे इस कार्यका प्रतिवाद करते हैं, वे न तो दोष करते हैं और न अनुचित ही करते हैं। मेरी समझसे यदि उनका भाव द्वेषरहित और शुद्ध है तो वे पापके भागी नहीं होते।

द्वितीय प्रश्नका उत्तर—श्रीकृष्ण मेरी समझमें महापुरुष या सिद्ध महात्मा ही नहीं हैं; वे साक्षात् परब्रह्म, पूर्णब्रह्म सनातन पुरुषोत्तम स्वयं भगवान् हैं। उनका शरीर पांचभौतिक—मायिक नहीं है, वे नित्य सच्चिदानन्द-विग्रह हैं। और गोपीजन भी दिव्य शरीरयुक्ता साक्षात् भगवान् श्रीकृष्णकी स्वरूपभूता ह्लादिनी शक्तिकी घनीभूत दिव्य मूर्तियाँ हैं। पद्मपुराणमें श्रीगोपीजनोंके सम्बन्धमें कहा है—

गोप्यस्तु श्रुतयो ज्ञेया ऋषिजा देवकन्यका:।

गोपकन्याश्च राजेन्द्र न मानुष्य: कदाचन॥

‘गोपियोंको श्रुतियाँ, ऋषियोंका अवतार, देवकन्या और गोपकन्या जानना चाहिये। वे मनुष्य कभी नहीं हैं।’

अखिलरससागर राजशिरोमणि जगत्पति श्रीभगवान‍्की प्रेयसी इन महाभाग्यवती दिव्यविग्रहधारिणी गोपियोंमें कुछ तो ‘नित्यसिद्धा’ थीं, जो अनादिकालसे भगवान् श्रीकृष्णके साथ दिव्य लीला-विलास करती हैं। कुछ पूर्वजन्ममें श्रुतियोंकी अधिष्ठात्री देवता थीं, जो ‘श्रुतिपूर्वा’ कहलाती हैं; कुछ दण्डकारण्यके सिद्ध ऋषि थे, जो ‘ऋषिपूर्वा’ के नामसे ख्यात हैं; और कुछ स्वर्गमें रहनेवाली देवकन्याएँ थीं, जो ‘देवीपूर्वा’ कहलाती हैं। पिछले तीनों वर्गकी गोपिकाएँ ‘साधनसिद्धा’ हैं। ‘नित्यसिद्धा’ गोपीजनोंमें श्रीराधाजी मुख्य हैं, और चंद्रावलीजी, ललिताजी, विशाखाजी आदि उन्हींकी कायव्यूहरूपा हैं; ये ‘गोपकन्या’ कहलाती हैं। साधनसिद्धा गोपियाँ पूर्वजन्ममें श्रीकृष्ण-सेवा-लालसासे साधनसम्पन्न होकर इस जन्ममें गोपीगृहोंमें अवतीर्ण हुई थीं और नित्यसिद्धा गोपीजनोंके सत्संग, सहयोग और सेवनसे दिव्यरूपताको पाकर इन्होंने श्रीकृष्णका दिव्य चरण—सेवाधिकार प्राप्त किया था। न तो ये गोपियाँ परस्त्रियाँ थीं, और न अखिल विश्वब्रह्माण्ड-स्वामी, आत्माओंके आत्मा भगवान् श्रीकृष्ण ही पर-पुरुष या उपपति थे। प्रेम-रसास्वादनके लिये—प्रेममार्गके साधनकी अत्युच्च भूमिकाके शिखरपर, महात्माओंको भगवत्कृपासे जो सिद्धिरूपा चरमानुभूति होती है, उसी अतुलनीय दिव्य प्रेमका वितरण करनेके लिये ‘जगत्पति’ ने ‘उपपति’ का और उनकी नित्यसंगिनी नित्यकान्तास्वरूपा शक्तियोंने ‘पर-स्त्री’ का साज सजा था। यह रास—यह गोपी-गोपीनाथका मिलन हमारे मलिन मिलनकी तरह गंदे कामराज्यकी चीज नहीं है, पांचभौतिक देहोंके गंदे काम-विकारका परिणाम नहीं है। यह तो परम अद‍्भुत, परम विलक्षण—जिसकी एक झाँकीके लिये बड़े-बड़े आत्मज्ञानी कैवल्यको प्राप्त महापुरुषगण तरसते रहते हैं—दिव्य लीला है। इसका अनुकरण कोई भी मनुष्य कदापि नहीं कर सकता, चाहे वह कितनी ही ऊँची स्थितिमें हो। इस लीलाका अनुकरण करने जाकर जो पर-स्त्री और पर-पुरुष परस्पर प्रेमका सम्बन्ध जोड़ना चाहते हैं वे तो घोर नरक-यन्त्रणाकी तैयारी करते हैं! सचमुच उनमें सच्चा प्रेम है ही नहीं! वे तो तुच्छ कामके गुलाम हैं, और प्रेमके नामको कलंकित करते हैं! सच्चा प्रेम तो एक श्रीभगवान‍्में ही होता है। प्रेममें प्रेमके सिवा और कोई कामना-वासना रहती ही नहीं। और जगत‍्में परोपकारतकके काममें आत्म-तृप्तिकी एक वासना रहती है। जगत‍्का कोई भी जीव आत्मेन्द्रिय-तृप्तिकी इच्छा बिना—चाहे वह अत्यन्त ही क्षीण हो— किसीसे प्रेम नहीं करता! और जिसमें आत्मेन्द्रिय-तृप्तिकी वासना है, वह प्रेम प्रेम नहीं है। आत्मेन्द्रिय-तृप्तिकी इच्छासे रहित एकनिष्ठ प्रेम तो आत्माओंके आत्मा, हमारे आत्माके भी आत्मा श्रीकृष्णमें ही हो सकता है। जो पर-स्त्री और पर-पुरुष इन्द्रिय-तृप्तिकी इच्छासे—चाहे वह बहुत सूक्ष्म वासनाके रूपमें ही हो प्रेमका स्वाँग सजते हैं, वे वस्तुत: अपना महान् अनिष्ट करते हैं। वासना बढ़कर प्रबल रूप धारण करते देर नहीं लगती। आगमें ईंधन डालनेसे जैसे आग बढ़ती है, वैसे ही भोग्य वस्तुकी प्राप्तिसे भोग तृष्णा बढ़ती है। और उसके परिणाम इस लोक और परलोकमें प्राप्त होते हैं—निन्दा, भय, क्लेश, कष्ट और अनन्त नरक-पीड़ा!

शास्त्र कहते हैं—

यस्त्विह वै अगम्यां स्त्रियं पुरुष: अगम्यं वा पुरुषं योषिदभिगच्छति, तावमुत्र कशया ताडयन्तस्तिग्मय्या शूर्म्या लोहमय्या पुरुषमालिङ्गयति स्त्रियं च पुरुषरूपया शूर्म्या।

‘अर्थात् कोई पुरुष यदि अगम्या स्त्रीमें गमन करता है अथवा कोई स्त्री अगम्य पुरुषसे गमन करती है (अगम्य वही है, जिससे विवाह न हुआ हो) तो उनके मरनेपर यमदूत उनको मारते हुए ले जाते हैं और वहाँ जलती हुई लोहेकी स्त्रीमूर्तिसे पुरुषका और पुरुषमूर्तिसे स्त्रीका आलिंगन कराते हैं। इस नरकका नाम ‘तप्तशूर्मि’ है।’

इसके बाद जब स्थूलदेहमें जन्म होता है तो उन्हें कई जन्मोंतक नाना प्रकारके भयानक रोगोंसे पीड़ित रहना पड़ता है।

अतएव इस मायिक जगत‍्में श्रीकृष्णकी और गोपियोंकी दिव्य लीलाका अनुकरण कदापि नहीं हो सकता, न ऐसा दु:साहस करना ही चाहिये।

हाँ, जिनके अन्त:करण परम विशुद्ध हो गये हैं, इस लोक और परलोकके भोगोंकी तमाम वासना जिनके मनसे मिट चुकी है, जो मुक्तिका भी तिरस्कार कर सकते हैं, ऐसे पुरुषोंमें यदि किन्हीं महापुरुषकी कृपासे श्रीकृष्ण-सेवाकी लालसा जग उठे और भुक्ति-मुक्तिकी सूक्ष्म वासनातकका सर्वथा अभाव होकर शुद्ध प्रेमाभक्ति प्राप्त हो, तब सम्भव है गोपियोंकी भाँति श्रीकृष्ण उन्हें उपपतिके रूपमें प्राप्त हो सकें। अतएव यदि गोपियोंको आदर्श मानकर उनका अनुकरण करना हो तो वह परम पुरुष श्रीकृष्णके लिये करना चाहिये न कि हाड़-मांसके घृणित पुतले, पर-पुरुष या पर-स्त्रीके लिये।

शरीरसे तो अनुकरण कोई भी नहीं कर सकते। परंतु भावसे भी, जिनमें जरा भी निजेन्द्रिय-तृप्तिकी वासना है, जो पवित्र और परम वैराग्यकी स्वच्छ भूमिकापर नहीं पहुँच गये हैं, वे पुरुष या स्त्री यदि श्रीगोपी-गोपीनाथकी लीलाओंका अनुकरण करना चाहेंगे तो उनकी वही दशा होगी, जो सुन्दर फूलोंके हारके भरोसे अत्यन्त विषधर नागको गलेमें पहननेवालोंकी होती है। पांचभौतिक देहधारी स्त्री-पुरुषको श्रीकृष्णकी लीलाकी तुलना अपने कार्योंसे करनी ही नहीं चाहिये।

इससे मेरा कदापि यह कहना नहीं है कि आपने जिनकी बात लिखी है, उन महात्मामें और उनमें श्रद्धा रखनेवाली स्त्रियोंमें परस्पर शुद्ध भाव नहीं है या कोई अनुचित सम्बन्ध है। मैं तो इतनी बातें इसलिये लिख गया हूँ कि आपके दूसरे प्रश्नोंमें कुछ ऐसी बातें पूछी गयी हैं। आजतक श्रीकृष्ण तथा गोपियोंके नामपर गुरु-शिष्याके रूपमें कम अनर्थ नहीं हुआ, और अब भी कम नहीं हो रहा है। यह सत्य है कि वास्तवमें काम-क्रोधपर विजय पाये हुए यथार्थ महात्माको किसी स्त्रीके साथ दूरसे मिलनेमें कोई खतरा नहीं है। परन्तु आदर्श तो बिगड़ता ही है। और एक बात यह भी है कि अमुक पुरुष काम-क्रोधपर विजय पाये हुए ही हैं, इसका भी क्या प्रमाण है। सत्संग, भजन और सद्विचारोंके प्रभावसे दीर्घकालतक काम-क्रोध दबे रहते हैं, क्षीण होकर छिपे रहते हैं—डरे और दुबके हुए चोरोंकी तरह; और कुसंग पाते ही बेतरह भड़क उठते हैं और साधकको दबा लेते हैं—वैसे ही जैसे बहुत दिनोंका भूखा बाघ किसी शिकारको दबोचता है। आज ही मुझे एक पत्र मिला है, जिसमें वयोवृद्धा विदुषी देवीने अपने खूब प्रसिद्धि पाये हुए अप्रतिम विद्वान् संन्यासी पुत्रके पतनका हाल लिखा है। यदि वह संवाद सत्य है तो बड़ी ही भयानक है और संन्यासियोंको स्त्रियोंके साथ मिलने-जुलनेका, उनके सम्पर्कमें आनेका कितना बुरा परिणाम होता है—इसको स्पष्ट सिद्ध करनेवाला है। कुछ समय पहलेकी बात है—एक बहुत बड़े प्रसिद्ध महात्मा किसी समय जिन महाराष्ट्रीय वयोवृद्ध सज्जनको गुरु मानते थे, उनके अन्दर वृद्धावस्थामें बुरी तरह विकार पैदा हो गया था और वे बड़ी बुरी मौतके मुँहसे भगवत्कृपासे ही बच पाये थे। इसलिये—जहाँतक हो सके—गुरु-शिष्याके रूपमें भी पुरुषोंका और स्त्रियोंका चाहे कितना ही पवित्र भाव हो, मिलना-जुलना भयप्रद है और आदर्शका नाशक तो है ही। खास करके सर्वत्यागी संन्यासियोंके लिये तो यह प्रत्यक्ष अधर्म ही है। श्रीचैतन्य महाप्रभुने तो अपने बहुत प्रिय शिष्य छोटे हरिदासको एक वृद्धा भक्त-स्त्रीसे चावल माँग लानेके अपराधमें आश्रमसे निकाल दिया था।

इसके अतिरिक्त स्त्रियोंका किसी भी महात्मामें श्रीकृष्णकी भावना करना तो और भी खतरनाक है। श्रीकृष्णके साथ ही गोपियोंका सम्बन्ध आ जाता है और इस सम्बन्धको लेकर—अज्ञान और विषयाशक्तिवश गिरते देर नहीं लगती। अतएव मेरी समझसे तो यह व्यवहार सर्वथा आपत्तिजनक ही है!

तृतीय प्रश्नका उत्तर—गीतामें कहे हुए भगवान‍्के ‘सर्वधर्मान् परित्यज्य’ (१८। ६६) का अर्थ बहुत प्रकारसे किया जाता है। परन्तु मैं मान लेता हूँ कि इसका अर्थ ‘सब धर्मोंका त्याग’ ही है, और वस्तुत: मैं मानता भी यही हूँ। भगवच्छरणागतिकी एक ऐसी स्थिति होती है, जिसमें भक्त धर्माधर्मके स्तरसे बहुत ऊपर उठ जाते हैं। उनका धर्म ही होता है—धर्माधर्मके ऊपर उठकर केवल श्रीभगवान‍्के हाथका यन्त्र बने रहना। भगवान् जो करावें सो करना, जैसे नचावें वैसे ही नाचना। परन्तु यह स्थिति सहज ही नहीं प्राप्त होती। पूर्ण वैराग्य होनेपर ही इस स्थितिकी ओर साधक चल सकता है। श्रीमद्भागवतमें श्रीभगवान‍्ने कहा है—

तावत् कर्माणि कुर्वीत न निर्विद्येत यावता।

मत्कथाश्रवणादौ वा श्रद्धा यावन्न जायते॥

(११।२०।९)

‘जबतक इस लोक और परलोकके समस्त भोगोंसे वैराग्य न हो जाय और भगवान‍्की लीलाओंके श्रवण-कीर्तन आदिमें ही सर्वार्थसिद्धिका विश्वास न हो जाय, तबतक कर्म करने चाहिये।’ इससे यह सिद्ध है कि पूर्ण वैराग्य तथा भक्तिनिष्ठाकी प्राप्ति हुए बिना जो विधि-निषेध बतलानेवाले शास्त्रोंके शासनका तथा शास्त्रोंके अनुसार कर्तव्यधर्मका त्याग कर देते हैं, वे बड़ी गलती करते हैं, और परिणाममें उन्हें बहुत कष्ट भोगना पड़ता है। यह सत्य है कि सर्वधर्माधर्मसे ऊपर उठकर श्रीभगवान‍्की अहैतुकी भक्ति पाना ही मुख्य कर्तव्य है। भगवान‍्ने स्वयं कहा है—

आज्ञायैवं गुणान् दोषान् मयाऽऽदिष्टानपि स्वकान्।

धर्मान् संत्यज्य य: सर्वान् मां भजेत स सत्तम:॥

(श्रीमद्भा० ११।११।३२)

‘उत्तम (श्रेष्ठ) वही है जो मेरे बतलाये हुए समस्त धर्माचरणरूप गुणों और अधर्माचरणरूप दोषोंको भलीभाँति त्यागकर मुझको ही भजता है।’

परन्तु ऐसी अवस्था सहसा नहीं प्राप्त होती। इसके लिये अर्जुनकी भाँति अनासक्त और निष्काम होनेकी सतत साधना करनी पड़ती है। स्त्री अपने पतिको क्यों पूजती है? शिष्य गुरुकी सेवा क्यों करता है? भगवान‍्को पानेके लिये पति और गुरुको भगवान‍्का प्रतिनिधि या प्रतीक मानकर! पति या गुरुमें भगवान‍्के दर्शन करके उनकी पूजा की जाती है तभीतक, जबतक जगत्पति नहीं मिल जाते। परन्तु जगत्पतिके मिलनेके लिये इनकी पूजा आवश्यक है। जब पूजा सिद्ध हो जाती है, प्रत्यक्ष जगत्पति मिल जाते हैं, तब इनकी पूजाका कोई प्रयोजन नहीं रह जाता। फिर गोपियोंकी भाँति लज्जा, धैर्य, कुल, मान, भय— सबका त्याग कर, धर्माधर्मसे ऊपर उठकर श्रीकृष्णको ही परम प्रियतम घोषित करनेमें आपत्ति नहीं। परन्तु पहले ऐसा नहीं किया जाता। पहले तो उनका प्रतिमापूजन ही होता है। अवश्य ही जो स्त्री भगवान‍्को भूलकर पतिकी या जो शिष्य भगवान‍्की परवा छोड़कर गुरुकी सेवा करते हैं, वे पति या गुरुकी सेवाके फलमें नश्वर वस्तु ही पाते हैं, भगवान‍्को नहीं पाते। इसलिये उनका भी उद्देश्य तो भगवत्प्राप्ति ही होना चाहिये। तथापि छतपर चढ़नेके लिये जैसे सीढ़ियोंकी जरूरत होती है, वैसे ही ‘सर्वधर्मत्याग’ रूपी परम धर्मतक पहुँचनेके लिये धर्मपालनकी आवश्यकता होती है। इसलिये जबतक भोगोंमें पूर्ण वैराग्य नहीं है और जबतक भक्तिमें पूर्ण श्रद्धा नहीं है, तबतक सर्वधर्मत्यागकी कल्पना नहीं की जा सकती।

गुरु-सेवन तो उत्तम है, परन्तु धर्मको मानते हुए—धर्मकी रक्षा करते हुए ही! लोकनिन्दा यदि धर्मसम्मत है, तो लोकनिन्दासे भी डरना ही चाहिये। मेरी समझसे तो स्त्रीको गुरु करनेकी कोई आवश्यकता नहीं है। पति और श्रीभगवान् ही उसके गुरु हैं और गुरु करना नितान्त आवश्यक ही हो तो पतिकी आज्ञासे धर्मसंगत, शास्त्रसम्मत प्रकारसे ही करना चाहिये। आजकल जमाना बहुत खराब है। बहुत सँभलकर फूँक-फूँककर पग धरना चाहिये। चारों ओर गरीब भेड़की खालमें खूँखार भेड़िये भरे हैं। इसीसे ब्रह्मज्ञान और भक्तिके नामपर व्यभिचार और पाप भी बढ़े जा रहे हैं!