कुछ प्रश्नोत्तर

आपके प्रश्नोंका संक्षेपमें निम्नलिखित उत्तर है। याद आनेके लिये प्रश्नोंको भी संक्षेपमें लिख रहा हूँ।

प्र०—मनमें नाना प्रकारकी तरंगें उठती रहें और राम-नामका जप किया जाय तो उसका फल होगा या नहीं?

उ०—यह कर्मका नियम है कि कोई भी कर्म फल उत्पन्न किये बिना नहीं रहता। फिर राम-नाम तो किसी भाँति लिया जाय, लाभदायक ही है। इसलिये फल अवश्य होगा। मनकी एकाग्रताके साथ नाम-जप हो, तब तो कहना ही क्या है।

प्र०—साढ़े तीन करोड़ राम-मन्त्रके जपसे मोक्षकी प्राप्ति होती है, यह क्या ठीक है?

उ०—विश्वास, भाव तथा महत्त्वके पूर्ण ज्ञानका उदय होनेपर तो एक ही नामसे मोक्ष प्राप्त हो सकता है, इसके अतिरिक्त कलिसन्तरण उपनिषद्‍‍में ‘हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे। हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे॥’ इस सोलह नामके मन्त्रके साढ़े तीन करोड़ जपसे (मृत्युके अनन्तर) मुक्ति हो जानेकी बात लिखी है इसमें कोई विधि नहीं है। बस, इतना मन्त्रजप हो जाना चाहिये। साढ़े तीन करोड़ मन्त्रोंके छप्पन करोड़ नाम होते हैं।

प्र०—क्या पापी मनुष्यकी भी काशीमें मरनेसे मुक्ति हो जाती है?

उ०—काशीमें मरण होनेसे पुनर्जन्म न होनेकी बात शास्त्रसिद्ध और महात्माओंके द्वारा अनुभूत है। अत: इसपर विश्वास करना चाहिये। अन्तकालमें जिस प्रकारकी स्थिति पुनर्जन्म न होनेके लिये आवश्यक है, श्रीशिवजी महाराज कृपापूर्वक काशीमें मरनेवालेकी वह स्थिति तारक-मन्त्रके दानसे स्वयं कर देते हैं। पाप बहुत अधिक होनेकी स्थितिमें एक नियमित अवधितक वह जीव सूक्ष्मशरीरसे भैरवी यातनाका भोग करके अन्तमें मुक्त हो जाता है, पुनर्जन्म किसीका नहीं होता। जिसके पाप बहुत कम होते हैं वही तत्काल मुक्त हो जाता है। मैं तो इसपर विश्वास करता हूँ। अविश्वासका कोई कारण भी नहीं है। भगवान् श्रीशंकरके प्रभावसे काशीका यह स्थानमाहात्म्य है।

प्र०—जीवनमें निरन्तर भजन करनेवाला अन्तमें मति खराब हो जानेसे नीचे गिर जाता है और उसका भजन व्यर्थ चला जाता है तथा हमेशा पाप करनेवाला अन्त समयमें शुद्धबुद्धि होनेके कारण मोक्षको प्राप्त हो जाता है—इसमें क्या रहस्य है?

उ०—यह सत्य है कि अन्तिम श्वासमें जैसी मति होती है, उसीके अनुसार गति होती है; परन्तु अन्तिम क्षणमें होनेवाली मति अपने-आप अचानक ही नहीं हो जाती, उसके लिये कारण होना चाहिये। वह कारण है—जीवनभर किये हुए अच्छे-बुरे अपने कर्म। जिसने जीवनभर भजन किया है, उसकी मति अन्तमें भजनमें होगी; और जिसने पाप किया है, उसकी पापमें होगी। अधिकांशमें ऐसा ही होता है। कहीं-कहीं इसके विपरीत भी होता है, भगवत्कृपासे, अकस्मात् किसी महात्मा पुरुषके दर्शन और अनुग्रहसे, भगवन्नाम और गुणोंके स्मरणसे या किसी वरदान आदिसे पाप करनेवालेकी बुद्धि शुद्ध हो सकती है। परन्तु उसमें भी पूर्वकृत कर्म ही कारण होता है। ‘पुन्य पुंज बिनु मिलहिं न संता’ के सिद्धान्तके अनुसार संत-दर्शनमें पूर्वपुण्य ही कारण होते हैं; भगवन्नाम-गुणोंका स्मरण भी पूर्वाभ्याससे ही होगा और वरदान भी किसी कर्मका फल होगा। इसी प्रकार अन्तिम समयमें फल-दानोन्मुख अशुभ प्रारब्धके कारण कुसंगतिके प्रभावसे, विषाद-क्रोध और शोकादिसे या शापादिसे ‘मति’ बिगड़ जाती है; परन्तु इनमें भी कर्म ही कारण है। अतएव वर्तमानमें सदा शुभ कर्म करने चाहिये और वे भी भगवान‍्का चिन्तन करते हुए। फिर मति बिगड़नेका कोई डर नहीं है। भगवान् कहते हैं—

तस्मात् सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।

मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्॥

(गीता ८।७)

[अन्तकालमें जैसी मति होती है, वैसी ही गति होती है और अन्तकालमें प्राय: वैसी ही मति होती है, जैसे कर्म मनसे जीवनभर आते हैं।] इसलिये अर्जुन! तुम सब समय निरन्तर मेरा स्मरण करो और युद्ध भी करो। इस प्रकार मन-बुद्धि मुझमें अर्पण हो जानेसे अन्तमें तुम नि:सन्देह मुझको ही प्राप्त होओगे। मृत्यु जब भी आवेगी; तभी तुम उसे मेरा स्मरण करते हुए मिलोगे। मतलब यह कि हर समय भगवान‍्के स्मरणका अभ्यास करना चाहिये। फिर अन्तकालमें भगवत्कृपासे मति शुद्ध ही रहेगी।

प्र०—गीतामें भगवान‍्ने कहा है, सब कुछ मुझसे ही होता है और सब जगह मैं ही हूँ। फिर मनुष्य दोषका भागी क्यों होता है? अच्छा-बुरा कर्म तो भगवान् पर ही निर्भर ठहरा।

उ०—यह सत्य है कि जैसे बिजलीका करेंट पॉवर-हाउससे आता है वैसे ही कर्म करनेकी शक्ति, प्रेरणा, कर्मसम्पादन कार्य आदि सब भगवान‍्की शक्तिसे ही होते हैं और भगवान् भी सब जगह सदा व्याप्त ही हैं। परंतु मनुष्यको भगवान‍्ने कर्मका अधिकार देकर कर्म करनेके नियम बता दिये हैं। जैसे Arm Act (शस्त्र-कानून)-के अनुसार सरकार किसीको बन्दूक, राइफल, पिस्तौल आदिके लाइसेंस देती है और स्वाभाविक ही कानूनके अनुसार उसके उपयोग करनेकी अनुमति भी देती है, वैसे ही मनुष्ययोनिको भगवान‍्ने कर्म करनेका लाइसेंस दे दिया है और उसके लिये नियम भी बना दिये हैं। लाइसेंसके अनुसार बन्दूक आदिका नियमानुकूल व्यवहार करनेवाले पुरुषकी भाँति जो मनुष्य भगवान‍्के नियमानुसार कर्म करता है, वह पुरस्कारका पात्र होता है। नियमानुसार होनेवाले कर्मोंका नाम ही ‘शुभ कर्म’ है, शुभ कर्मका फल सुख होता है; और जो नियमविरुद्ध (अशुभ) कर्म करता है, वह दोषका भागी होता है और उसे दण्ड मिलता है। पापका फल दु:ख है ही और भगवान् चाहे तब उसको पशु, पक्षी आदि भोगयोनियोंमें गिराकर उसका कर्म करनेका लाइसेंस छीन लेते हैं। इसलिये सब कुछ भगवान‍्के द्वारा होनेपर भी मनुष्यको कर्म करनेका अधिकार प्राप्त होनेके कारण, वह यदि अधिकारका दुरुपयोग करके पाप-कर्म करता है तो दोषका भागी अवश्य होता है। भगवान् सर्वत्र व्याप्त हैं, इसीसे वे अच्छे-बुरे कर्मोंको देख सकते हैं। यहाँकी सरकारको तो कोई धोखा भी दे सकता है, अपने कानून विरोधी कार्यको छिपा भी सकता है। सर्वव्यापी भगवान‍्के सामने कोई कर्म छिप नहीं सकता। इसके सिवा जैसे आकाश सर्वत्र व्याप्त है और वह जैसे अच्छे-बुरे किसीसे भी लिप्त नहीं होता, वैसे ही भगवान् भी सर्वत्र व्याप्त हैं और सर्वथा सबसे निर्लिप्त हैं।

प्र०—मनुष्यके मनमें जो पाप-पुण्यकी स्फुरणाएँ होती हैं, उनसे पाप-पुण्य होता है या नहीं?

उ०—यह तो कहा ही जा चुका है कि कोई भी कर्म निष्फल नहीं होता। परंतु कलियुगमें भगवान‍्ने जीवोंपर दया करके ऐसा विधान कर दिया है कि यदि मनमें पापवासना उठकर नष्ट हो जाय—उसकी क्रिया बिलकुल न हो—तो उस पापसे माफी मिल जायगी। और पुण्यभावना—शुभ स्फुरणा होगी तो उसका फल पुण्य अवश्य प्राप्त होगा। इसलिये अशुभ स्फुरणाओंको रोककर सदा शुभ भावनाएँ करनी चाहिये। अशुभ भावना होनेपर उससे आगे होनेवाली क्रियासे बच रहना भी बहुत कठिन है। इसलिये भी शुभ भावना ही करनी चाहिये।

प्र०—एक मनुष्य परोपकारमें रत है। एक दिन वह अपने घरसे निकला ही था कि सामने एक मकानमें आग लग जानेसे उसे एक स्त्री जलती हुई दिखायी दी। वह उसे बचानेके लिये दौड़ा। रास्तेमें एक दो सालका बच्चा उसके पैरके नीचे दबकर मर गया और जबतक वह वहाँ पहुँचा, तबतक वह स्त्री जल गयी। उस मनुष्यको पाप होगा या पुण्य?

उ०—पाप-पुण्यका क्या हिसाब है, यह तो नियन्ता श्रीभगवान् ही जानें। परंतु अनुमान और युक्तिसे यही पता है कि भावके अनुसार ही कर्मका फल हुआ करता है। यदि कोई मनुष्य निष्काम सेवा-बुद्धिसे परोपकार करता है, तब तो उसका अनिष्ट फल हो नहीं सकता। कहीं भूल हो जाती है तो वह क्षम्य होती है। क्योंकि वह अपनी सेवाका कोई भी मूल्य अथवा बदला ग्रहण नहीं करता। सकामभावपूर्वक परोपकारबुद्धिसे सेवा करनेपर ऐसा कहा जा सकता है कि वह स्त्रीको बचानेके लिये दौड़ा, यह उसका पुण्यकर्म है। स्त्री न बच सकी, यह दूसरी बात है। कर्मका बाह्यत: अनुकूल ही फल हो, यह कोई आवश्यक बात नहीं है। उसका कर्तव्य तो वहीं पूरा हो जाता है, जहाँ वह अपनी समझसे पूरी कोशिश कर लेता है। फल तो उसके हाथमें है ही नहीं। परंतु दौड़नेमें उसने अगर असावधानी की और उसकी गलतीसे बच्चा मर गया तो उसका उसे पाप भी होगा। यदि उसकी असावधानी नहीं है और बच्चा ही खेलता या दौड़ता हुआ उसकी फेटमें आ गया तो वह दोषी नहीं है। आप देखते ही हैं मोटरके नीचे कोई राही आ गया। यदि मोटर-ड्राइवरकी असावधानीसे ऐसा हुआ तो वह दोषी है, नहीं तो नहीं। यही अनुमान उसमें भी लगाया जा सकता है!

प्र०—एक साधु जंगलमें भगवद्भजन कर रहा था। उसे संयोगवश एक-दो दिनसे भोजन मिल जाता था। किसी गृहस्थने उसके लिये नियमित भोजनका प्रबन्ध कर दिया। इससे उसकी इन्द्रियाँ चेतन हो गयीं। भोजनसे आलस्य आने लगा और ध्यान छूट गया। अब उस भोजन देनेवालेको पाप होगा या पुण्य?

उ०—पाप-पुण्यकी जाँच-पड़ताल और पूरा निर्णय भगवान् ही कर सकते हैं। अनुमानसे यहाँ भी वही बात है। निष्कामसेवाभावसे भोजनकी व्यवस्था हुई तो कोई भी दोष नहीं है। सकामभावसे होनेपर भी मनमें यदि कोई बुरी भावना नहीं है तो भोजनकी व्यवस्था करनेवालेको पाप नहीं हो सकता। भूखेको अन्न देना सर्वथा पुण्य है। हाँ, भोजन होना चाहिये पात्रके अनुसार। साधु-महात्माओंको उनके आश्रमधर्म तथा साधनाके अनुकूल ही भोजन देना चाहिये। ऐसी चीजें नहीं देनी चाहिये, जिनसे आलस्य, प्रमाद आदि तामसी वृत्तियाँ बढ़ें। हाँ, कोई साधु स्वयं चाहें और अपने पास वह वस्तु हो एवं निर्दोष हो तो साधुको देनी ही चाहिये; उससे यदि कोई हानि होगी तो उसके जिम्मेवार वे साधु होंगे, देनेवाले गृहस्थ नहीं। परंतु यह भी याद रखना चाहिये कि अपने पास देनेको है और भजन करनेवाले साधुओंको अन्नकी आवश्यकता है, वहाँ यदि हम इस युक्तिको काममें लावें कि भोजनकी व्यवस्था कर देंगे तो आलस्य-प्रमाद होगा, साधुजीकी समाधि टूट जायगी, इसलिये इनको भोजन नहीं देना चाहिये, तो यह भी पाप है। शरीरकी स्थितिसे ही भजन होगा। शरीर-रक्षाके लिये अन्नकी आवश्यकता है, त्यागी पुरुष स्वयं कमाते नहीं। उनका भार तो गृहस्थोंपर ही धर्मत: है। गृहस्थ यदि किसी युक्तिवादसे उनको देना बन्द कर दें तो वे धर्मच्युत होते हैं। हाँ, साधुकी साधुता बिगड़नेकी नीयतसे उसके सामने भोगोंका ढेर लगा देना तो पाप ही है।

प्र०—गीतापाठ, तीर्थयात्रा आदि पुण्यकर्म बेचे जा सकते हैं या नहीं?

उ०—बेचे जा सकते हैं क्या, लोग बेचते ही हैं। गीतापाठ तथा तीर्थयात्रा करके बदलेमें धन, मान, पूजा, प्रतिष्ठा चाहना और इसी निमित्तसे मिलें तो उन्हें ग्रहण करना बेचना नहीं तो और क्या है? हाँ, सौदा करके दाम ठहराकर बेचना दूसरी बात है। वैसी बिक्री भी हो सकती है और वह जायज ही होती है।

प्र०—ब्राह्मणके द्वारा दक्षिणा आदि देकर कराये हुए जप, अनुष्ठान आदिका फल करवानेवालेको होता है या नहीं?

उ०—उचित दक्षिणा, सत्कार आदिके द्वारा ब्राह्मणको प्रसन्न करनेपर और ब्राह्मणके द्वारा जपके नियमानुसार शुद्ध और नियमपूर्वक सांगोपांग जप होनेपर करानेवालेको शुभ फल अवश्य होता है। सकामभावसे किये जानेवाले कार्यमें विधिकी बड़ी आवश्यकता है। दक्षिणाकी कमी, करानेवालेके द्वारा ब्राह्मणका अपमान और जपमें असावधानी, नियमोंका त्याग, अशुद्ध उच्चारण आदि होनेपर उग्र देवता हों तो कुफल भी हो सकता है।