कुछ तात्त्विक प्रश्नोत्तर
आपका कृपापत्र मिल गया था, पुन: दूसरा पत्र भी मिल गया, उत्तर लिखनेमें बहुत विलम्ब हो गया, इसके लिये क्षमा करें। आपने पत्रके आरम्भमें लिखा कि ‘आपको तत्त्वदर्शी ज्ञानी होनेसे मैं साष्टांग दण्डवत्-प्रणामसहित नम्रतापूर्वक प्रश्न करता हूँ।’ सो प्रश्न करनेमें तो कोई आपत्ति नहीं है, आप इच्छानुसार पूछ सकते हैं और अवकाश मिलनेपर मैं अपनी तुच्छ मतिके अनुसार उत्तर दे भी सकता हूँ। परंतु मैं कुछ तत्त्वदर्शी ज्ञानी पुरुष नहीं हूँ। इसलिये उस दृष्टिसे प्रणामके सर्वथा अयोग्य हूँ। सर्वभूतस्थित भगवान्के नाते आप प्रणाम करते हों तो उसी नाते मैं भी आपको करता हूँ।
शरणागतिका स्वरूप और उसके साधन
आपका पहला प्रश्न है—ईश्वरकी शरणमें जाना कैसे बनता है? इसका उत्तर है कि सब प्रकारसे अपने सर्वस्वको—तन, मन, धन, कामना, वासना, बुद्धि, अहंकार—सबको परमात्मामें अर्पण कर देनेसे शरणागति बनती है। इसके प्रारम्भिक साधन हैं—१—भगवान्के अनुकूल ही सब कार्य (तन, मन, वचनसे) करनेका दृढ़ निश्चय, २—भगवान्के प्रतिकूल समस्त कार्यों और भावोंका (तन, मन, वचनसे) सर्वथा त्याग, ३—भगवान्में ही परम विश्वासकी चेष्टा, ४—भगवान्को ही अपना एकमात्र रक्षक, प्रभु, प्रेमास्पद, गति, आश्रय, ध्येय और लक्ष्य मानना, ५—भगवान्के लिये ही सब कार्य करना, ६—सब कार्योंके होनेमें अपने पुरुषार्थको कुछ भी न मानकर भगवान्की ही शक्तिके द्वारा होते हुए समझना, और ७—सब कुछ भगवान्के अर्पण करनेकी चेष्टा करना। इस प्रकार अभ्यास करते-करते चार भाव हृदयमें प्रकट होते हैं और उन्हींके अनुसार क्रिया होने लगती है। वे चार हैं—१—भगवान्का परम प्रेमके साथ निरन्तर चिन्तन और तज्जन्य परमानन्दका पल-पलमें अनुभव, २—भगवान्के अनुकूल ही सब कार्य करनेका स्वभाव, ३—भगवान्के प्रत्येक विधानमें (सुख-दु:ख, हानि-लाभ सबमें) परमानन्द और ४—सर्वथा निष्कामभाव यानी कामनाका बिलकुल अभाव। इसी अवस्थामें परम शान्ति—शाश्वती शान्ति मिलती है। यह परमोच्च दशा है, इस अवस्थामें उस आधारमें स्थित होकर भगवान् ही लीला करते हैं।
प्रारब्ध और शाश्वती शान्ति
प्रश्नका दूसरा भाग है—तीव्रतर वैराग्य आदिके द्वारा शाश्वती शान्ति मिल जानेपर भी अवश्य होनेवाले प्रारब्ध कर्मके मिटानेकी यदि कोई युक्ति होती तो राजा नल, धर्मावतार युधिष्ठिर और मर्यादापुरुषोत्तम भगवान् श्रीरामचन्द्रजी इत्यादि समर्थ पुरुष राज्यसे भ्रष्ट होकर क्यों वन-वन फिरकर अनन्त दु:ख उठाते। अत: शाश्वती शान्तिवाले ज्ञानीका भी प्रारब्ध कर्म नहीं मिट सकता—ऐसा श्रुति कहती है। तब शाश्वती शान्ति मिलना-न-मिलना एक-सा हो गया। अतएव तत्त्वज्ञानसे यथार्थ शान्ति मिलनेपर भी प्रारब्ध-कर्मद्वारा उस शान्तिमें विघ्न हो जाता है, या प्रारब्ध-कर्मसे उसमें कोई विघ्न नहीं होता? यदि नहीं होता तो फिर ऐसा पुरुष प्रारब्ध कर्म कैसे भोगता है?
इस प्रश्नके उत्तरमें सबसे पहले तो यह बात कहनी है कि—
अवश्यम्भाविभावानां प्रतिकारो भवेद्यदि।
तदा दु:खे न लिप्येरन् नलरामयुधिष्ठिरा:॥
यह श्लोक केवल धर्मकी प्रबलता दिखानेके लिये ही है। वैसे इस श्लोकका सिद्धान्त सर्वथा मानने योग्य नहीं है; क्योंकि इसमें नल और युधिष्ठिरके साथ ही भगवान् श्रीरामका नाम लिया है। यह सिद्धान्त सर्वथा स्मरण रखना चाहिये कि भगवान्का अवतार किसी कर्मफलसे नहीं होता। हमलोगोंके देहधारणमें—जन्ममें जैसे प्रारब्ध कारण है, वैसे भगवान्के जन्ममें नहीं है; वे तो अपनी लीलासे ही जन्म धारण करते हैं। वास्तवमें यह जन्म ही नहीं है। ऐसी बात नहीं है कि वह परम मंगल विग्रह पहले नहीं था, अब माताके उदरमें रज-वीर्यके संयोगसे बन गया। वह तो नित्य है और समयपर अपनी लीलासे ही प्रकट होता है। यह प्राकट्य ही उनका जन्म है। और फिर लीलाके अनन्तर अन्तर्धान हो जाना ही उनका देहावसान कहा जाता है। वस्तुत: वे जन्म-मृत्युसे रहित हैं। काल-कर्मसे अतीत हैं। वे स्वयं कहते हैं—
अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्।
प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्ममायया॥
(गीता ४। ६)
‘मैं सर्वथा अविनाशीस्वरूप और सर्वथा अजन्मा तथा सब ब्रह्माण्डोंका परम ईश्वर होते हुए ही अपनी प्रकृतिके द्वारा अपनी योगमायासे अपनी लीलासे प्रकट होता हूँ।’
जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वत:।
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन॥
(गीता ४। ९)
‘अर्जुन! मेरा जन्म और कर्म दिव्य है और जो पुरुष इस जन्मकर्मके तत्त्वको जान लेता है, वह देहत्यागके अनन्तर दूसरे जन्मको न प्राप्त होकर मुझको ही प्राप्त होता है।’
जिनके जन्म-कर्मके तत्त्वको जान लेनेसे ही अपुनर्भव (मोक्ष) मिल जाता है, उन भगवान्को प्रारब्ध-कर्मवश वनमें बाध्य होकर कष्ट सहन करना पड़ा, यह कहना एक प्रकारसे भूल ही प्रकट करना है। भगवान् श्रीरामचन्द्रका युवराजपदपर प्रतिष्ठित न होकर वनमें जाना उनकी दिव्य लीला ही थी। किसी प्रारब्धका भोग नहीं। रहे नल और युधिष्ठिर, सो यदि ये महानुभाव तत्त्वज्ञानी पुरुष थे तब तो वनमें रहनेपर भी इन्हें वास्तवमें कोई अशान्ति नहीं हुई। और यदि तत्त्वज्ञानी नहीं पहुँचे थे तो यथायोग्य अशान्ति होनेमें कोई आश्चर्य नहीं। इन दोनोंमें भी युधिष्ठिरका दर्जा नलसे ऊँचा प्रतीत होता है। कुछ भी हो, इस श्लोकको प्रमाण मानकर शाश्वती शान्तिमें विघ्न मानना सर्वथा अप्रासंगिक है। इतनी बात अवश्य सत्य है कि प्रारब्ध-कर्मका प्रतिकार नहीं हो सकता। संचितका नाश हो जाता है। क्रियमाण भी अहंभावका अभाव तथा सहज निष्कामभाव होनेके कारण भूजे हुए बीजकी भाँति फल उत्पन्न नहीं कर सकता। परंतु प्रारब्धका नाश भोग हुए बिना नहीं हो सकता। किसी प्रबल नवीन कर्मके तत्काल संचितसे प्रारब्ध बन जानेके कारण फलदानोन्मुख प्रारब्धका प्रवाह रुक सकता है, परंतु मिट नहीं सकता, यह सत्य होनेपर भी तत्त्वज्ञानीकी शाश्वती शान्तिसे इसका क्या सरोकार है! कर्मोंका अस्तित्व ही अज्ञानमें है, अज्ञानका सर्वथा नाश हुए बिना तत्त्वज्ञानकी या शाश्वती शान्तिकी प्राप्ति नहीं होती और शाश्वती शान्तिमें अज्ञान नहीं रहता। अतएव शाश्वती शान्तिको प्राप्त आनन्दमय पुरुषमें एक सम ब्रह्मकी अखण्ड सत्ताके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं रह जाता। ऐसी अवस्थामें शरीरमें होनेवाले भोगोंसे उसकी नित्यैकशान्तिमें कोई बाधा नहीं आती। वह सर्वदा, सर्वथा और सर्वत्र सम होता है। सुख-दु:ख, मानापमान, जीवन-मृत्यु, लाभ-हानि, प्रवृत्ति-निवृत्ति, हर्ष-शोक, शीत-उष्ण, किसी भी द्वन्द्वमें वह विषम नहीं देखता। वह एकमात्र ब्रह्मको ही जानता है, ब्रह्ममें ही रहता है और ब्रह्म ही बन जाता है। ऐसी अवस्थामें न तो जगत्की दृष्टिसे होनेवाला भारी-से-भारी दु:ख उसे विचलित कर सकता है और न जगत्की दृष्टिसे प्रतीत होनेवाला परम सुख ही उसे सुखके विकारसे क्षुब्ध कर सकता है, वह सदा सम, अचल, कूटस्थ, स्वरूप-स्थित रहता है। इसी बातको समझानेके लिये भगवान्ने जहाँ-जहाँपर गीतामें तत्त्वज्ञानी पुरुषोंके लक्षण बतलाये हैं, वहाँ-वहाँ समतापर बड़ा जोर दिया है। इसीको प्रधान लक्षण बतलाया है, देखिये गीता अध्याय २ श्लोक ५६, ५७; अध्याय ५। १८, १९; अध्याय ६। २९, ३०, ३१; अध्याय १२। १३, १७, १८, १९; अध्याय १४। २२, २४, २५ आदि-आदि। शाश्वती शान्तिको प्राप्त पुरुषकी शान्ति वह होती है जो सर्वोच्च है; जो किसी कालमें किसी भी कारणसे घटती नहीं, नष्ट नहीं होती। वह नित्य है, सनातन है, अचल है, आनन्दमयी है, सत् है, सहज है, अकल है और अनिर्वचनीय है। बस, वह परमात्माका स्वरूप ही है। जो शान्ति किसी शारीरिक स्थितिके कारण विचलित होती है, बदलती है या नष्ट होती है, वह यथार्थमें शान्ति ही नहीं है, वह विषय-प्राप्ति-जनित क्षणिक सुख-स्वप्नसे प्राप्त होनेवाली चित्तकी अचंचलता है, जो दूसरे ही क्षण नवीन कामनाके जाग्रत् होते ही नष्ट हो जाती है। भक्तकी दृष्टिसे कहा जाय तो भी यही बात है। भक्त सुख और दु:ख दोनोंमें अपने भगवान्की मूर्ति देखता है, वह अपने भगवान्को कभी बिना पहचाने नहीं रहता। ‘वज्रादपि कठोर’ और ‘कुसुमसे भी कोमल’ दोनोंमें ही वह अपने प्रियतमको निरख-निरखकर उसकी विचित्र लीलाओंको देख-देखकर नित्य निरतिशय आनन्दमें निमग्न रहता है, उसकी उस आनन्दमयी शान्तिको नष्ट करनेकी किसमें सामर्थ्य है? भगवान् कहते हैं—
यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं तत:।
यस्मिन्स्थितो न दु:खेन गुरुणापि विचाल्यते॥
(गीता ६।२२)
‘उस परम लाभके प्राप्त हो जानेपर उससे अधिक अन्य कोई भी लाभ नहीं जँचता और उस अवस्थामें स्थित पुरुष बड़े भारी दु:खसे भी चलायमान नहीं होता।’ क्योंकि वह सर्वत्र सर्वदा अपने हरिको ही देखता है। भगवान् कहते हैं—
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥
(गीता ६।३०)
‘जो मुझको सर्वत्र देखता है और सबको मुझमें देखता है, उससे मैं कभी अदृश्य नहीं होता और वह मुझसे कभी अदृश्य नहीं होता।’ ऐसी अवस्थामें यही सिद्धान्त मानना चाहिये कि तत्त्वज्ञानी—शाश्वती शान्तिको प्राप्त पुरुषके लिये कोई कर्म रहता ही नहीं। प्रारब्धसे शरीर रहता है परंतु उसमें अहंता और कर्ता-भोक्ता भाववाले किसी धर्मीका अभाव होनेसे क्रियामात्र होती है। वस्तुत: उसको भोगता नहीं। उसके कर्मोंके सारे बन्धन टूट जाते हैं। कर्मोंका समस्त बोझ उसके सिरसे उतर जाता है। प्रारब्धके शेष हो जानेपर शरीर भी छूट जाता है।
क्या ज्ञानी इन्द्रियोंके वशमें हो सकता है?
अब एक प्रश्न आपका यह है कि गीता अध्याय २। ६० में जो यह कहा गया है कि प्रमथनकारिणी इन्द्रियाँ विपश्चित् पुरुषके मनको भी बलात् हर लेती हैं। वह विपश्चित् पुरुष शाश्वती शान्तिको प्राप्त पुरुष है या अन्य? इसका उत्तर एक तरहसे ऊपर आ चुका है, थोड़े शब्दोंमें यह पुन: समझ लीजिये कि शाश्वती शान्तिको प्राप्त पुरुष ब्रह्ममें— भगवान्के स्वरूपमें नित्य एकत्वरूपसे अचल रहता है। वह चलायमान होता ही नहीं। यहाँ विपश्चित् शब्दसे बुद्धिमान् पुरुष समझना चाहिये। जो बहुत बड़ा बुद्धिमान् तो है परन्तु भगवत्प्राप्त नहीं है, उसकी बुद्धि यदि मनके अधीन हुई रहे तो उसके मनको इन्द्रियाँ जबरदस्ती खींच लेती हैं।