मनुष्य-जीवनकी सफलता

भैया! आपकी अवस्था अवश्य ही दु:खद है। विषयासक्तिका यही परिणाम होता है। मनुष्य ऐसा फँस जाता है कि फिर न तो उसका उसमें रहते ही बनता है और न वह निकल ही सकता है।

महाकवि कालिदासने कहा है—

गन्धश्चासौ भुवनविदित:

केतकी स्वर्णवर्णा

पद्मभ्रान्त्या चपलमधुप:

पुष्पमध्ये पपात।

अन्धीभूत: कुसुमरजसा

कण्टकैश्चूर्णपक्ष:

स्थातुं गन्तुं द्वयमपि सखे

नैव शक्तो द्विरेफ:॥

‘मधुलोभी चंचल भ्रमर भ्रमसे कमल समझकर जगत्प्रसिद्ध सुगन्धवाले स्वर्णवर्ण केतकी-पुष्पमें जा पड़ता है, वहाँ केतकीके परागसे उसकी आँखें फूट जाती हैं और काँटोंसे उसकी पाँखें टूट जाती हैं। इससे न तो वह उसमें रह ही सकता है और न कहीं उड़कर जा ही सकता है। सखे! इस प्रकार भ्रमर उभय संकटमें पड़ जाता है।’

यही दशा विषयोंमें सुख समझकर उनमें फँस जानेवालोंकी होती है। मनुष्य-देह मिली थी—रहा-सहा सारा बन्धन काटनेके लिये, परंतु यहाँ आकर वह अपने बन्धनोंकी गाँठोंको और भी बढ़ा लेता तथा उलझा लेता है। बहुत जन्मोंके बाद यह दुर्लभ मनुष्य-शरीर भगवत्कृपासे मिलता है।

कबहुँक करि करुना नर देही।

देत ईस बिनु हेतु सनेही॥

यह शरीर भी अनित्य है। इस शरीरको पाकर जो विषयभोगोंमें न फँसकर भगवान‍्के भजनमें अपना तन-मन लगा देता है, वही भवसागरसे तरकर मनुष्य-जीवनको सफल बनाता है। इस शरीरके कालके गालमें पड़नेसे पहले-पहले ही बड़ी फुर्तीसे यत्न करके भगवान‍्के प्रेमको प्राप्त कर लेना चाहिये। इसीमें बुद्धिमानी है। विषयभोग तो दूसरी योनियोंमें भी प्राप्त होते हैं—मनुष्ययोनि तो केवल भगवत्प्राप्तिके लिये ही है। कितने दु:खकी बात है कि ऐसे शरीरको पाकर भी हमलोग स्वप्नके पदार्थोंकी तरह असत् , बिजलीकी चमककी भाँति चंचल और अनित्य भोगोंकी प्राप्तिमें जीवन खो देते हैं, न मालूम कितना अधर्म करते हैं, कितनोंको सताते और ठगते हैं, कितनोंका दिल दु:खाते हैं, कैसे-कैसे छलछंद रचते हैं, यह हमारी कैसी दुर्दशा है? भागवतमें श्रीभगवान‍्ने स्वयं कहा है—

नृदेहमाद्यं सुलभं सुदुर्लभं

प्लवं सुकल्पं गुरुकर्णधारम्।

मयानुकूलेन नभस्वतेरितं

पुमान् भवाब्धिं न तरेत् स आत्महा॥

‘यह मनुष्य-शरीर सारे मंगलोंका मूल है, शुभ कर्म करनेवाले पुण्यजनोंको यह सुलभतासे मिलता है, और अशुभ कर्म करनेवाले दुर्जनोंके लिये यह अत्यन्त दुर्लभ है ‘संसार-सागरसे पार जानेके लिये यह सुदृढ़ नौका है। परमार्थ-तत्त्वके ज्ञाता गुरुदेव विश्वास करते ही इसके केवट बन जाते हैं और शरण लेते ही मैं स्वयं अनुकूल वायु बनकर इसे लक्ष्यकी ओर बढ़ा ले जाता हूँ। इतनी सुविधा होनेपर भी जो इस शरीरके द्वारा भवसागरसे पार नहीं उतर जाता, वह तो अपने हाथों अपनी हत्या करता है।’

तुम्हारी ही भाँति बहुत लोग फँसावटका अनुभव करते हैं, परंतु सच बात तो यह है कि यह विचार तभीतक रहता है, जबतक कोई खास अड़चन रहती है, जहाँ अड़चन हटी कि फिर वही प्रपंचका मोह!

तुलसीदासजी महाराजने कहा है—

ज्यों जुबती अनुभवति प्रसव

अति दारुन दुख उपजै।

ह्वै अनुकूल बिसारि सूल सठ

पुनि खल पतिहि भजै॥

यही दशा है। भैया! यदि सचमुच तुम दु:खी हो और दु:खसे निकलना चाहते हो तो इसका उपाय है—सीधा उपाय है। वह है भगवान‍्की कृपापर विश्वास करके उनकी शरण होना और जहाँतक बन सके निरन्तर उन्हें स्मरण रखनेकी चेष्टा करना। भगवान‍्ने गीतामें कहा है—

मच्चित्त: सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।

(१८। ५८)

अनन्यचेता: सततं यो मां स्मरति नित्यश:।

तस्याहं सुलभ: पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिन:॥

(८।१४)

अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जना: पर्युपासते।

तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥

(९।२२)

‘मुझमें चित्त लगानेसे तुम मेरी कृपासे सारे संकटोंको अनायास ही पार कर जाओगे। अर्जुन! जो पुरुष अनन्यचित्त होकर नित्य-निरन्तर मेरा स्मरण करता है, उस नित्य मुझमें लगे हुए योगीको बहुत ही सहजमें मैं प्राप्त हो जाता हूँ। जो केवल मुझमें ही प्रेम करनेवाले पुरुष निरन्तर मेरा चिन्तन करते हुए मुझे ही भजते हैं, उन नित्य मुझमें लगे हुए पुरुषोंको, जो लौकिक-पारमार्थिक वस्तु प्राप्त नहीं है, उसकी प्राप्ति मैं स्वयं करवा देता हूँ और जो प्राप्त है, उसकी रक्षा मैं स्वयं करता हूँ।’

भगवान‍्की इस वाणीपर विश्वास करके उनपर निर्भर रहना सीखो और निर्भर चित्तसे उनका स्मरण करो। फिर देखोगे कुछ ही समयमें तुम्हारी स्थिति पलट जायगी। तुम्हारा रूपान्तर हो जायगा और तुम मानव-जीवनकी सफलताकी ओर द्रुतगतिसे दौड़ने लगोगे।