नाम-जपकी महत्ता

सप्रेम हरिस्मरण। आपका पत्र मिला। स्थिति लिखी सो ठीक है। सच्ची बात यह है कि डटकर भजन नहीं बनता। भजन बने बिना विषयोंकी आसक्तिरूप अन्त:करणका दोष नष्ट नहीं होता और जबतक विषयासक्ति रहती है, तबतक मन्दिरमें बैठकर ठाकुरजीकी पूजा करनेमें भी विषय ही ठाकुरजी बने रहते हैं; इसलिये वह भगवत्पूजन न होकर प्रकारान्तरसे विषय-सेवन ही होता है। फिर दूकान-कारखाने आदिके काममें तो भगवद‍्‍‍बुद्धि होना बहुत कठिन है। भूलसे कभी-कभी मान लेते हैं—भगवत्-सेवन हो रहा है; परंतु हृदयके भीतर घुसकर देखनेपर पता लगता है—शुद्ध विषय-सेवन ही है। होना चाहिये जगत‍्का विस्मरण होकर एकमात्र भगवान‍्का स्मरण, होता है भगवान‍्का विस्मरण होकर विषयोंका स्मरण। यही हालत है। कलियुग है। वातावरण बहुत अशुद्ध है। सभी क्षेत्रोंमें दम्भ, दूकानदारी, दिखावापन आ गया है। अतएव भजनके सिवा और कोई भी उपाय नजर नहीं आता। मन लगे, न लगे, किसी प्रकार भी यदि चौबीस घंटेमें सब मिलकर १८ घंटे नाम-जप होता रहे तो उसके लिये चेष्टा करनी चाहिये। भक्त लोग तो आठ पहरमें साढ़े सात पहर भजन किया करते थे। श्रीचैतन्यचरितामृतमें कहा है—

साढ़े सात पहर जाय भक्तिर साधने।

चारि दण्ड बिश्राम ताओ नाहें कोना दीने॥

न काम छोड़कर अलग बैठ सकते हैं, बैठनेसे भी क्या होगा? भजनका अभ्यास न होगा तो नींद, आलस्य और प्रमादमें समय बीतेगा! अब जहाँ बड़े-बड़े कामोंके लिये राग-द्वेष होते हैं फिर छोटी-छोटी बातोंके लिये होने लगेंगे। घर बड़ा हो या छोटा—है घर ही, और राग-द्वेष अपने साथ हैं ही। कहीं भी चले जायँ, कितनी ही बड़ी या छोटी-से-छोटी दुनियामें रहें, ये राग-द्वेष अपना काम करते ही रहेंगे। अतएव अभी जिस दुनियामें हैं, इसीमें रहकर नाम-जप बढ़ाना चाहिये। बस, इसके लिये लाज-शरम छोड़कर अभ्यास डालना चाहिये। मुँहसे उच्चारण होता ही रहे। नाम-जप होता रहेगा तो नामके प्रभावसे बाकी बातें आप ही हो जायँगी। न होंगी तो आपत्ति नहीं। यदि भगवान‍्का नाम जपते-जपते मृत्यु हो जायगी तो भी जीवन सफल ही है। अधिक क्या लिखूँ।

सबसे यथायोग्य सप्रेम कहियेगा। भजन जैसा चाहता हूँ, बनता नहीं है। चेष्टा कर रहा हूँ। भगवत्कृपापर भरोसा है। अपनेमें तो कोई बल है नहीं।