निज-दोष देखनेवाले भाग्यवान् हैं
संसारमें ऐसा कौन है जो सर्वथा निर्दोष हो। त्रिगुणमय संसारमें तम भी रहेगा ही। जिसको अपने दोष दीखते हैं—भयंकररूपमें दीखते हैं, जो दोषोंके कारण दु:खी रहता है, जिसके हृदयमें दोष चुभते हैं, चाहता है एक भी न रहे, प्रयत्न भी करता है, परन्तु सर्वथा नाश नहीं कर सकता, वह तो बड़ा भाग्यवान् है। संसारमें ऐसे लोग भी हैं जो अपने दोषोंको या तो देखते ही नहीं और देखते हैं तो ‘गुण’ रूपमें तथा दूसरोंके दोष उनको राई-से भी पहाड़-जैसे लगते हैं।
‘आप पापको नगर बसावत सहि न सकत पर खेरो।’
‘श्रीभगवान्का स्मरण आप करते ही हैं; उनका स्मरण ऐसी आग है जो सारे दोषोंको जला देती है और क्या उपाय है अपने पास।’
भगवान्की दया
आप इतना संकोच क्यों करते हैं। आप सच मानिये, मुझे न तो आपका मेरे पास रहना कभी भार मालूम होता है, न आप जाते हैं तब रोकनेका ही मन होता है।
स्वप्नमें या जाग्रत् में श्रीभगवान् प्रेरणाद्वारा आकर्षित करते हैं सो बहुत ही अच्छी बात है। विघ्न भी भगवान्की दयासे ही आते हैं। बीच-बीचमें विघ्न न आवे तो शायद शिथिलता आ जाय। जैसे रात्रि दूसरे दिनके ताजा प्रभातका सुख देनेके लिये आती है, वैसे ही विघ्न भी साधनमें उत्साह पैदा करनेके लिये ही आते हैं। श्रीभगवान् तो सब कुछ देखते ही हैं। देखते क्या हैं—उन्हींके इंगितसे सब कुछ होता है; फिर अमंगलकी क्या सम्भावना है? मंगलमयका इंगित मंगलमय ही होगा। अभी कुछ वियुक्त रहनेकी इच्छा है तो रहिये। मनसे तो शायद आप वियुक्त हो सकेंगे नहीं। शरीर तो वियोग-संयोगरूप है ही। जो प्रभु-इच्छा है उसीमें सन्तुष्ट रहना चाहिये। ‘गोविन्द नाम आधार’ सबको ही है। कोई मानते हैं, कोई नहीं।
उस छबिमें लगन लगा लीजै,
गोविन्द नाम आधार रहे।