पापोंके नाशका उपाय

सप्रेम हरिस्मरण! आपने लिखा कि ‘चेष्टा करनेपर भी पापकी वृत्ति नहीं छूटती—बार-बार पापका भयानक फल भोगनेपर भी वृत्ति न मालूम क्यों पापकी ओर चली जाती है। जिस समय पापवृत्ति होती है, मन काम-क्रोधादिके वशमें होता है, उस समय मानो कोई बात याद रहती ही नहीं। इसका क्या कारण है और इस पाप-प्रवृत्तिसे किस प्रकार पिण्ड छूट सकता है, लिखिये।’

आपका प्रश्न बड़ा सुन्दर है। यद्यपि मैं स्वयं सर्वथा निष्पाप नहीं हूँ। इसलिये आपके प्रश्नका उत्तर देनेका अधिकारी तो नहीं, तथापि मित्रभावसे जो कुछ मनमें आता है, लिखता हूँ। जबतक पापकी कोई स्मृति भी होती है, जबतक पापकी बात सुनने-समझनेमें जरा भी मन खिंचता है और जबतक काम-क्रोधका कुछ भी असर चित्तपर हो जाता है, तबतक बाहरसे कोई पाप कतई न होनेपर भी मनुष्य अपनेको सर्वथा निष्पाप नहीं कह सकता।

अर्जुनने गीतामें भगवान‍्से पूछा था—‘भगवन्! मनुष्य चाहता है कि मैं पाप न करूँ, वह पापसे अपनेको बचानेकी इच्छा करता है, फिर भी उससे पाप हो ही जाते हैं, मानो कोई अंदर बैठा हुआ जबरदस्ती उसे पापमें लगा रहा हो, बताइये, वह अंदरसे पापके लिये तीव्र प्रेरणा करनेवाला कौन है? (३।३६)

भगवान‍्ने हँसकर कहा—‘दूसरा कोई नहीं है, आत्मशक्तिको भूलकर मनुष्य जो रजोगुणरूप आसक्तिसे उत्पन्न कामनाको मनमें स्थान दे देता है, यह काम ही क्रोध बनता है और यही कभी न तृप्त होनेवाला और महापापी बड़ा वैरी है जो अंदर बैठा हुआ पापके लिये तीव्र प्रेरणा करता है। जैसे धूएँसे आग और मैलसे दर्पण ढक जाता है, और जैसे जेरसे गर्भ ढका रहता है वैसे ही इस ‘काम’ से ज्ञान ढका रहता है। यह सदा अतृप्त रहनेवाला काम ही ज्ञानियोंका नित्य शत्रु है। यही इन्द्रिय, मन, बुद्धि सबमें अपना प्रभाव विस्तार करके—सबको अपना निवास-स्थान बनाकर इन्हींके द्वारा ज्ञानपर पर्दा डलवाकर जीवको मोहमें डाले रखता है। इसीसे सारे पाप होते हैं।’ (गीता ३। ३७—४०)

यह ज्ञान-विज्ञानको नाश करनेवाला ‘काम’ रहता है इन्द्रियोंमें, मनमें और बुद्धिमें। इन्द्रियोंमें होकर ही यह मन-बुद्धिमें जाता है। इसलिये सबसे पहले इन्द्रियोंको वशमें करना चाहिये। इन्द्रियाँ यदि कामको अपने अंदरसे निकाल देंगी तो काम जरूर मर जायगा। (गीता ३। ४१)

परंतु कठिनता तो यह है कि हमलोगोंने अपनेको इतना दुर्बल मान रखा है कि मानो इन्द्रियोंको विषयोंसे रोकना हमारे लिये कोई असम्भव व्यापार है। याद रखिये, पाप वहींतक होंगे, इन्द्रियाँ वहींतक बुरे विषयोंको ग्रहण करेंगी, मनमें वहींतक कुविचारोंके संकल्प-विकल्प होंगे, और बुद्धि वहींतक ‘कु’ के लिये अनुमति देगी, जहाँतक आत्मा न जाग उठे। भगवान् कहते हैं—

इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्य: परं मन:।

मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धे: परतस्तु स:॥

एवं बुद्धे: परं बुद‍्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना।

जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम्॥

(गीता ३।४२-४३)

‘इन्द्रियाँ (स्थूल शरीरसे) श्रेष्ठ हैं, इन्द्रियोंसे मन श्रेष्ठ है, मनसे श्रेष्ठ बुद्धि है और जो बुद्धिसे अत्यन्त श्रेष्ठ है, वह आत्मा है। इस प्रकार आत्माको बुद्धिसे परे—सबका स्वामी, परम शक्ति-सम्पन्न और सबसे श्रेष्ठ जानकर बुद्धिको अपने वश करो और बुद्धिके द्वारा मनको और मनके द्वारा इन्द्रियोंको वश करके हे महाबाहो! (बड़े बलवान् वीर!) कामरूपी दुर्जय शत्रुको मार डालो।’

काम शत्रु मारा गया कि पापोंकी जड़ ही कट गयी। और यह करना आपके हाथ है। बिना आत्माकी अनुमतिके पाप नहीं हो सकते। आत्मा अपनेको कमजोर मानकर बुद्धिपर सब छोड़ देता है, बुद्धि मनपर और मन इन्द्रियोंपर निर्भर करने लगता है। इन्द्रियाँ अंधे घोड़ोंकी तरह जब निरंकुश होकर विषयोंकी ओर दौड़ती हैं, तब मनरूपी लगाम, बुद्धिरूपी सारथी और आत्मारूपी रथी शरीररूपी रथके साथ ही उनके साथ खिंचे चले जाते हैं, और पापरूपी महान् गड़हेमें पड़कर या पहाड़से टकराकर बहुत दिनोंके लिये बेकाम हो जाते हैं और पड़े-पड़े नाना प्रकारके दु:ख भोगते हैं। इन सब दु:खोंसे छुटकारा अभी हो सकता है यदि भ्रमवश अपनेको कमजोर मानकर बुद्धि-मन-इन्द्रियोंके वश हुआ आत्मा इस मिथ्या पराधीनताकी बेड़ीको तोड़कर इनका स्वामी बन जाय और इन्हें जरा भी कुमार्गमें न जाने दे। बलपूर्वक रोक दे। आत्मामें वह अजेय शक्ति है। आत्माकी जागृति होनेपर उसकी एक ही हुंकारसे वह काम हो सकता है।

आप यह निश्चय समझिये—आप सर्वशक्तिमान् आत्मा हैं आपमें बड़ा बल है। संसारके किसी भी पाप-तापकी शैतानी शक्तियाँ आपका सामना नहीं कर सकतीं। आप अपने स्वरूपको भूले हुए हैं, इसीसे अकारण दु:ख पा रहे हैं। राजराजेश्वर होते हुए भी गुलामीकी जंजीरमें अपनी ही भूलसे बँध रहे हैं। इस बेड़ीको तोड़ डालिये। फिर पापवृत्ति आपके मनमें आवेगी ही नहीं। आत्मामें नित्य ऐसा निश्चय कीजिये— ‘काम-क्रोध मेरे मनमें नहीं रह सकते, मेरे मनमें प्रवेश नहीं कर सकते। मेरे मनके समीप भी नहीं आ सकते। पाप मेरे समीप आते ही जल जायँगे। मैं शुद्ध हूँ, निष्पाप हूँ, अपार शक्तिशाली हूँ। पापोंकी और पापोंके बाप कामकी ताकत नहीं जो यहाँ आ सके।’ आप विश्वास कीजिये यदि आपका निश्चय पक्‍का होगा तो आप काम-क्रोधसे और पापोंसे सहज ही छूट जायँगे। रोज प्रात:काल और सायंकाल एकान्तमें बैठकर ऐसा निश्चय कीजिये ‘मैं शरीर नहीं हूँ, इन्द्रियाँ नहीं हूँ, मन नहीं हूँ, बुद्धि नहीं हूँ, निर्विकार विशुद्ध आत्मा हूँ। मुझमें काम, क्रोध, लोभ, मोह और उनसे होनेवाले कोई पाप हैं ही नहीं। अब मैं इनको कभी अपने समीप आने नहीं दूँगा, नहीं आने दूँगा। ये मेरे पास आ ही नहीं सकते!’

हो सके तो निम्नलिखित पाँच बातोंपर ध्यान रखिये। आपके पाप सहज ही मिट जायँगे।

१—आत्मशक्तिसे रोज आत्मामें निश्चय कीजिये कि काम-क्रोध और पाप मेरे समीप नहीं आ सकते।

२—रोज ऐसा निश्चय कीजिये कि आत्माके आत्मा सर्वशक्तिमान् सर्वेश्वर परमात्मा नित्य मेरे साथ हैं। उनकी उपस्थितिमें पाप-ताप मेरे समीप आ ही नहीं सकते और परमात्माको नित्य अपने साथ अनुभव कीजिये।

३—भगवान‍्के नामका जाप कीजिये और ऐसा निश्चय कीजिये कि जिसके मुखसे एक बार भी भगवन्नाम आ जाता है, उसके सारे पाप जड़से नष्ट हो जाते हैं। मैं भगवान‍्का नाम लेता हूँ। अत: मुझमें न तो पाप रह सकते हैं और न मेरे समीप ही आ सकते हैं?

४—नित्य स्वाध्याय—सद‍्ग्रन्थोंका अध्ययन कीजिये और आत्मशक्ति-सम्पन्न तथा भगवान‍्के विश्वासी और प्रेमी दैवी-सम्पदावाले पुरुषोंके जीवन-चरित्र पढ़िये और उनके उपदेशोंका मनन कीजिये।

५—किसी भी इन्द्रियसे, मनसे या बुद्धिसे किसी प्रकारसे भी कुसंग जरा भी न कीजिये। इन्द्रिय, मन, बुद्धिको अवकाश ही न दीजिये जिसमें वे सत् को छोड़कर ‘सु’ को त्यागकर कभी ‘असत्’ या ‘कु’ का स्मरण भी कर सकें—कामकी ओर ताक भी सकें।