पराभक्ति साधन नहीं है
ज्ञान और भक्तिके विषयमें आपका जैसा विचार है, वह बहुत ठीक है। ज्ञानकी साधना तो गौणी भक्ति है। इस भक्तिसे सम्पन्न पुरुषको ही श्रीमद्भगवद्गीतामें ‘जिज्ञासु भक्त’ कहा है। जिसे भगवान्की पराभक्ति प्राप्त है, वह तो ज्ञानी ही होता है। पराभक्ति स्वयं साध्य है। जिस प्रकार लोकमें एक महान् ऐश्वर्यशाली सम्राट् अपने प्रेमीको उसकी इच्छा न होनेपर भी, स्वभावत: ही अपना गूढ़-से-गूढ़ रहस्य बता देता है, उसी प्रकार श्रीभगवान् अपने प्रेमी भक्तको भी स्वभावत: ही अपना परम ज्ञान दे देते हैं। इस प्रकार ज्ञान-दानमें यद्यपि उसका प्रेम ही कारण होता है तथापि अपनी ओरसे उसके लिये उनकी तनिक भी प्रवृत्ति न होनेके कारण उसके प्रेमको ज्ञानका साधन कदापि नहीं कह सकते। उसका प्रधान लक्ष्य तो अपने प्रियतमसे प्रेम ही करना है। उसके लिये उसका तत्त्वज्ञान तो एक अन्यथा सिद्ध पुरस्कारमात्र होता है। इस प्रकार प्राप्त हुए तत्त्वज्ञानका वह प्रेमी अपने प्रेमके सामने कुछ भी मूल्य नहीं करता, और बलात् प्राप्त हुए इस ब्रह्मानन्दकी उपेक्षा करके वह नित्य प्रेमानन्दमें ही निमग्न रहता है। इसीसे कहा है—‘मुक्ति निरादरि भगति लुभाने’।
न किंचित् साधवो धीरा भक्ता ह्येकान्तिनो मम।
वाञ्छन्त्यपि मया दत्तं कैवल्यमपुनर्भवम्॥
इसके सिवा एक बात और है। किसी भी सच्चे साधकको इस बहसमें ही नहीं पड़ना चाहिये कि कौन साधन बड़ा है और कौन छोटा। उसकी प्रवृत्ति जिस ओर हो उसीमें उसे श्रद्धापूर्वक लगे रहना चाहिये। कालान्तरमें उसीके द्वारा उसे सब साधनोंका रहस्य मालूम हो जायगा। आपका उद्देश्य यदि श्रीरघुनाथजीके चरणोंमें अनन्य प्रेम प्राप्त करना है तो आप इस पचड़ेमें न पड़कर उनका प्रेम प्राप्त करनेका ही प्रयत्न करें। आपकी इच्छा न होनेपर भी वे आपको अपना सर्वस्व समर्पण कर देंगे। यदि आप इस आवश्यक कर्तव्यको भूलकर व्यर्थके खण्डन-मण्डनमें पड़ जायँगे तो न तो आपको प्रेम ही मिलेगा और न ज्ञान ही। अधिकारी भेदसे सभी साधन अपनी-अपनी जगह प्रधान होते हैं। इसलिये किसीको भी ऊँचा-नीचा नहीं कहा जा सकता।
आशा है, मेरी इस प्रार्थनापर ध्यान देकर आप श्रीराम कृपाकी प्राप्तिका ही प्रयत्न करेंगे और इस प्रकारके वाद-विवादोंसे दूर रहेंगे।