पतित होकर पतितपावनको पुकारो

भाई! तुम इतना घबराते क्यों हो। परमात्माकी असीम दयालुतापर विश्वास करो। हम पतित हैं तो क्या हुआ, वे तो ‘पतितपावन’ हैं। सचमुच पतित बनकर पतितपावनको पुकारो—अशरण होकर अशरण-शरणके शरण हो जाओ। फिर देखो—करोड़ों स्नेहमयी जननी हृदयोंको भी लजा देनेवाला परमात्माका स्नेह-स्रोत उमड़ता दिखलायी देगा और तुम उसके प्रवाहमें बह जाओगे। हालत खराब है तो क्या, लाख वर्षकी अँधेरी कोठरी प्रकाश आते ही प्रकाशित हो जाती है। वह लाख वर्षकी अपेक्षा नहीं करती। इसी प्रकार भगवान‍्के शरण होते ही सारे पाप तुरंत भस्म हो जाते हैं। मनमें दृढ़ता धारणकर भगवान‍्का स्मरण करो और अपनेको सर्वतोभावसे उनके चरणोंपर न्योछावर कर देनेकी चेष्टा करो। उनकी दयालुतापर विश्वास करो और यह दृढ़ धारणा कर लो कि ‘मैं उनका हूँ, उनका अभय हस्त मेरे मस्तकपर सदा ही टिका हुआ है।’ यह भावना जितनी ही बढ़ेगी उतना ही आनन्द बढ़ेगा। नाम-जपमें मन ऊबता है तो जबरदस्ती कड़वी दवाकी भाँति ही उसका नियमपूर्वक सेवन करो। भगवान‍्के बलपर मनमें धीरज रखो। आचरणोंको उज्ज्वल बनानेकी कोशिश करो।