प्रेमके नामपर

आपका कृपापत्र मिला। उत्तर लिखनेमें कुछ देर हो गयी। इधर काम भी ज्यादा रहा और स्वभाव-दोष तो है ही। क्षमा कीजियेगा।

आपने अपने मनकी हालत बताकर मेरी सम्मति पूछी सो इस सम्बन्धमें मैं क्या कहूँ? यदि आपके मनमें पवित्रता है और उधरसे भी कोई विकार नहीं है तो बहुत ही अच्छी है, परन्तु जहाँतक मैं समझ सका हूँ—इस स्पष्टोक्तिके लिये आप क्षमा कीजियेगा—आपलोगोंका प्रेम पवित्र नहीं है। जिस प्रेममें भोग-सुखकी इच्छा है, संयमका अभाव है, कर्तव्यविमुख होकर केवल पास रहने या देखते रहनेकी ही चेष्टा है, जरा भी मानसिक विकार है, स्वार्थ-साधनाका प्रयास है और परस्पर पवित्रता बढ़ानेकी जगह इन्द्रिय-तृप्तिकी सुविधा खोजी जा रही है, वह प्रेम कदापि पवित्र नहीं हो सकता।

प्रेमका प्रधान स्वरूप है, निज-सुखकी इच्छाका सर्वथा त्याग। भोग-प्रधान पाशविक इन्द्रिय-सुखका प्रयास तो पवित्र प्रेमके नामको कलंकित करनेवाला पाप है। प्रेम सदा देता ही रहता है, जरा भी बदला नहीं चाहता। असलमें जिस प्रेमके आधार भगवान् नहीं हैं वह यथार्थ प्रेम नहीं है। प्रेम सदा स्वार्थशून्य है, इन्द्रिय-विकाररहित पवित्र है, भोगेच्छाके लिये उसमें स्थान नहीं। आजके मनुष्यने तो मोहको ही प्रेमका नाम दे रखा है और इसीका फल है महान् मानसिक अशान्ति और दारुण दु:खभोग!

जिनका परस्पर पवित्र प्रेम है, उनको परस्पर पवित्रता, पुण्य और सदाचरणकी उन्नतिमें सहायक होना चाहिये। परस्पर आत्मसंयमका क्रियात्मक अध्ययन करना चाहिये। त्याग और भगवदनुरागकी वृद्धि करनी चाहिये। आपके पत्रसे पता लगता है कि आपलोगोंको ये बातें रुचती ही नहीं। आप तो कल ही नाश हो जानेवाली चमड़ीके रूपपर और काल्पनिक गुणोंपर मोहित हैं। कुछ ही कालमें यदि ये गुण न दिखायी दें तो आपका प्रेम कच्चे सूतके धागेकी तरह टूट जा सकता है। यह भी कोई प्रेम है? प्रेम कभी टूटता ही नहीं। घटता भी नहीं। जितना है उतना ही नहीं रहता—वह तो प्रतिक्षण बढ़ता ही रहता है। उसमें रूप-गुणकी अपेक्षा नहीं है, वह प्रेमस्वरूप अच्युत परमात्माकी पवित्र देन है। आप इस मोहका त्याग कीजिये, इसीमें भलाई है। नहीं तो प्रेमके नामपर कामके कलुषित नरक कुण्डमें जा गिरियेगा। सावधान!